Spirit of a Fighter – Chapter 36
"पता नहीं, बेटा।" उन्होंने लालटेन ऊपर उठाई। "बीस साल में मैंने किसी को नीचे जाते देखा है, पर लौटते नहीं देखा।"
मैंने कुएँ का ढक्कन पकड़ा। लोहा ठंडा था और उस पर जंग की परत मेरी हथेली से चिपक गई।
"तो आज कोई नया रिकॉर्ड बनेगा," मैंने कहा, और ढक्कन खींच लिया।
अंदर से हवा आई — बंद, भारी, जैसे किसी ने सालों की साँस एक साथ छोड़ दी हो। और उस हवा में वो गंध थी। मैं जानता था ये गंध। ये वही थी जो मेरे पापा की पुरानी धोती से आती थी — जो माँ ने अलमारी के नीचे रखी हुई है, आज तक धोई नहीं।
मेरी नाक में जलन हुई। मैंने आँखें मूँद लीं।
"तू ठीक है?" कालू काका ने पूछा।
"हाँ।" मैंने आँखें खोलीं। "बस… मेरे पापा की गंध आ रही है।"
कालू काका चुप हो गए। फिर बोले, "तेरे पापा ने भी यहीं से शुरू किया था।"
मैंने लालटेन उठाई और सीढ़ी पर पैर रखा। पहली सीढ़ी। दूसरी। मेरी साँसें गिनी जा रही थीं। तीसरी पर पैर रखा तो नीचे से आवाज़ आई —
"आ गया।"
मैं रुक गया। मेरा दिल धड़का। पर ये आवाज़ पहले जैसी नहीं थी। इसमें वो गाना नहीं था। इसमें थकान थी। जैसे कोई बहुत दिनों से बोल नहीं रहा हो और पहली बार बोल रहा हो।
"कौन हो तुम?" मैंने नीचे देखते हुए कहा।
"नीचे आ। आँखों से देख।"
कालू काका मेरे ऊपर रुके रहे। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उन्होंने सिर हिलाया — जैसे कह रहे हों, अब तो आ गए हो।
मैं उतरता गया। लालटेन की रोशनी में जंग लगा दरवाज़ा दिखा। वही ताला, वही ताज़ा तेल। मैंने ताले को छुआ। ठंडा था।
"कुंजी कहाँ है?" मैंने कालू काका से पूछा।
"मत खोल।" आवाज़ अंदर से आई, बहुत करीब से। "ताला नहीं, बातें खोल। पहले मेरी बात सुन।"
"मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ।"
"देख लेगा। पर पहले ये सुन — भैरव ने मुझे यहाँ बंद किया है, पर मैं अकेला नहीं हूँ। इस दरवाज़े के पीछे सिर्फ़ मेरी हड्डियाँ नहीं हैं। यहाँ वो सब है जो भैरव ने मिटाया। नाम, हिसाब, बोतलें। सब।"
मेरा हाथ ताले पर था। मैंने उसे वहीं रोका।
"तुम मुझे कैसे जानते हो?"
अंदर से हँसी आई। सूखी, टूटी हँसी। "तेरे पापा रघुवीर मेरे दोस्त थे। और तू… तू उसका बेटा है। मैंने तुझे सुबह-सुबह अखाड़े के बाहर खड़े देखा है। तू वही गंध सूँघता है जो रघुवीर सूँघता था। उसने मुझे बताया था कि उसका बेटा पैदा होते ही सबसे पहले दूध की गंध पहचान गया था।"
मेरे हाथ से लालटेन फिसलने लगी। कालू काका ने पकड़ लिया।
"मेरे पापा ने… तुम्हें बताया था?"
"बताया था। कि उसका बेटा अलग है। कि वो गंध से सच पकड़ता है।" आवाज़ भारी हो गई। "और मैंने उसी दिन कहा था — रघुवीर, इसे अखाड़े से दूर रख। भैरव को इसकी नाक की खबर मत होने दे।"
मैंने आँखें बंद कर लीं। मेरा गला सूख रहा था।
"भैरव को पता चल गया," मैंने कहा।
"पता चल गया," आवाज़ ने कहा। "और अब वो तुझे बर्दाश्त नहीं करेगा।"
कालू काका ने मेरा कंधा पकड़ा। "बेटा, अब नीचे मत जा। आज रात इतना काफ़ी है। उसने बोल दिया, यही बड़ी बात है।"
मैंने सीढ़ी पर खड़े-खड़े सोचा। दरवाज़ा सामने था। जंग लगा, ताला लगा, और उसके पीछे एक आदमी जिसने मेरे पापा को जाना था।
"तुम्हारा नाम क्या है?" मैंने पूछा।
चुप्पी। लंबी चुप्पी। फिर बोला — "नाम भूल जा। नाम से क्या होगा। बस इतना याद रख — भैरव का ज़हर बनाने वाला मैं हूँ। और भैरव को रोकने वाला भी मैं ही होता, अगर मैंने ये ज़िंदगी नहीं गँवाई होती।"
मैं सीढ़ी से ऊपर चढ़ आया। ढक्कन खुला छोड़ दिया। रात की ठंडी हवा मेरे चेहरे पर लगी और मैंने गहरी साँस ली।
"कालू काका," मैंने कहा। "कल सुबह भैरव मुझे अखाड़े में उतारेगा।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "कैसे पता?"
"क्योंकि वो जानता है कि मैं उसका ज़हर पहचान गया हूँ। और जो पहचान ले, उसे वो मिट्टी में हराकर सबके सामने सबक सिखाता है।"
कालू काका ने लंबी साँस ली। फिर उन्होंने मेरी आँखों में देखा और कहा, "तो सुन। मैंने आज रात अखाड़े की मिट्टी में पुरानी परत बिछा दी है। वो परत जिसे तेरे पापा ने छुआ था। भैरव कल तुझे जीतने नहीं देगा — वो मिट्टी में कुछ मिला देगा जिससे पैर फिसल जाएँ। पर तू अपनी मिट्टी से दाँव उठाना। जहाँ पैर नरम लगे, वहीं दाँव लगाना।"
"तुमने ये कब किया?"
"जब तू घर गया था।" उन्होंने मुस्कुराकर कहा। "मैं बूढ़ा हूँ, पर इतना काम अभी भी कर सकता हूँ।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी हथेली खुरदरी थी, मिट्टी से भरी हुई।
"थैंक्यू, कालू काका।"
"थैंक्यू मत बोल। जीतकर आ।" वो पलटे और अपनी लालटेन लेकर चल दिए। कुछ कदम जाकर रुके और बिना पलटे बोले, "और बेटा, सुबह जल्दी आना। जो देर से आता है, उसके हाथ काँपते हैं।"
घर पहुँचा तो आँगन में माँ बैठी थीं। चक्की नहीं चल रही थी। वो बस बैठी थीं, हाथ में हल्दी का टीका लगाए, और आँखें दरवाज़े पर।
"कुआँ खोला?" उन्होंने पूछा।
"खोला।"
"कुछ मिला?"
"बातें मिलीं, माँ।" मैं उनके पास बैठ गया। "वो आदमी ज़िंदा है। उसने मुझसे कहा कि भैरव को ज़हर बनाना उसने ही सिखाया था।"
माँ ने कुछ नहीं कहा। बस अपलक मेरी तरफ़ देखती रहीं।
"और माँ," मैंने धीरे से कहा, "उसने बताया कि पापा जानते थे मेरी नाक के बारे में। उन्होंने कहा था — इसे अखाड़े से दूर रखो।"
माँ की आँखें भर आईं। उन्होंने अपना आँचल मुँह पर रखा।
"तेरे पापा ने मुझसे भी यही कहा था," वो फुसफुसाईं। "पर तू रोज़ सुबह भाग जाता था। क्या करती? पैर बाँध देती?"
मैं उनके पैरों पर सिर रखकर बैठ गया। थोड़ी देर कुछ नहीं बोला।
"माँ," फिर कहा, "कल सुबह भैरव मुझे अखाड़े में उतार रहा है।"
माँ का हाथ मेरे बालों पर रुक गया।
"क्या बोला?"
"वो जानता है कि मैं उसका पानी पहचान गया हूँ। कल वो मुझे सबके सामने मिट्टी में उतारेगा। हार गया तो अखाड़ा हमेशा के लिए बंद।"
माँ ने मेरा सिर उठाया। उनकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ साफ़ थी।
"कब?"
"सुबह।"
वो उठीं। चक्की की तरफ़ गईं और आटा निकालने लगीं।
"अब क्या कर रही हो?" मैंने पूछा।
"रोटी बना रही हूँ। पहलवान खाली पेट नहीं उतरता।"
मैं हँसा। हँसी में काँपन था।
"माँ, मैं डर रहा हूँ।"
वो रुकीं। आटा हाथ में लिए मेरी तरफ़ मुड़ीं। उन्होंने परात रख दी और मेरे पास आकर बैठ गईं। मेरा सिर अपनी गोद में रख लिया। उनकी साड़ी में चक्की की गंध थी — आटा, पसीना, और हल्दी।
"भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा," वो बोलीं। "तेरे पापा डरकर रुके थे। उन्होंने सोचा, चुप रहूँगा तो बच जाऊँगा। वो बचे नहीं।" उनका हाथ मेरे माथे पर चला। "तू डर के साथ लड़। डर को साथ लेकर उतर। जो डर को भगाकर उतरता है, वो घमंड में उतरता है। और घमंडी पहलवान को मिट्टी भी नहीं बख्शती।"
मैंने आँखें बंद कर लीं। माँ की गोद में, चक्की की गंध में, मुझे नींद आने लगी।
तभी दरवाज़े पर खड़खड़ाहट हुई। मैं उठा। माँ ने आँचल से आँखें पोंछीं।
गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी थी। उसके हाथ में एक नई कॉपी थी, और उसकी आँखों में आग।
"भैया," वो सीधे मेरे पास आई। "मैंने सुना। कल तू अखाड़े में उतरेगा?"
"किसने बताया?"
"मैं दीवार के पीछे सोई थी, सब सुन लिया।" उसने कॉपी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "देख, नई कॉपी। और उस पर मैंने पहले पन्ने पर लिख दिया है — जो लड़ता है, वही जीतता है।"
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