Spirit of a Fighter35 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 35

7 min read November 5, 2026

"हाँ," मैंने कहा। "पर ये बात माँ को मत बताना।"

"क्यों?"

"क्योंकि माँ अभी तैयार नहीं है। और जब तैयार होगी, तब खुद बताएगी।"

गुड़िया हँसी और मेरा हाथ पकड़ लिया।

घर के मोड़ पर पहुँचकर मैंने देखा — दरवाज़े पर गुड़िया खड़ी थी। नहीं, रुको। गुड़िया मेरे साथ थी। तो दरवाज़े पर कौन खड़ा था?

मैंने आँखें मलीं। दरवाज़े पर कोई नहीं था। दरवाज़ा खुला था, और उसके सामने ज़मीन पर काग़ज़ पड़े थे।

गुड़िया ने मेरा हाथ छोड़ा और दौड़कर आगे गई। फिर वो रुकी। फिर उसने एक काग़ज़ उठाया और उसे देखकर वहीं खड़ी हो गई।

"गुड़िया?"

वो नहीं बोली। मैं दौड़कर उसके पास गया। और जो मैंने देखा, मेरे हाथ काँपने लगे।

ज़मीन पर उसकी स्कूल की कॉपी पड़ी थी। वो कॉपी जिस पर वो रोज़ रात अपना होमवर्क लिखती थी, जिसके पन्नों पर उसकी गोल-गोल लिखाई थी, जिसे वो स्कूल ले जाती थी — वो कॉपी अब फटी हुई पड़ी थी। पन्ने बिखरे हुए थे। और उन पन्नों के बीच, सफ़ेद दीवार पर, कोयले से बड़े-बड़े अक्षरों में कुछ लिखा था।

गुड़िया की आँखें भर आई थीं। उसके हाथ में एक पन्ना था जिस पर कोयले से लिखा था।

"तेरे भैया को बता देना," मैंने पढ़ा, और मेरी आवाज़ धीमी हो गई, "अगली बार लालटेन नहीं, आग होगी।"

गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ काँप रहे थे।

"भैया," उसने धीरे से कहा, "मेरी कॉपी…"

मैंने उसे अपनी बांहों में ले लिया। वो मेरे सीने से चिपक गई और सिसकने लगी। उसकी कॉपी — उसकी स्कूल की कॉपी — जिसे वो सबसे ज़्यादा प्यार करती थी, जिसके पन्नों पर उसने अपना पूरा दिन लिखा था, अब फटी पड़ी थी। और ये सिर्फ़ कॉपी नहीं थी। ये धमकी थी। सीधी हमारे घर की दहलीज़ पर।

किसी ने हमारे घर में घुसकर ये किया था। जब हम नहर पर थे। जब माँ चक्की पर थीं या बाज़ार गई थीं। किसी ने दरवाज़ा खोला, कॉपी फाड़ी, दीवार पर लिखा, और चला गया। जैसे वो जानता हो कि हम कब घर पर नहीं होंगे।

माँ बाहर आईं। उन्होंने दीवार पर लिखा देखा, गुड़िया को रोते देखा, और मेरे चेहरे को देखा। उनके हाथ में आटे की लोई थी। उन्होंने उसे मेज़ पर रखा, और बिना कुछ बोले दरवाज़े के पास आकर खड़ी हो गईं। उनकी आँखें सूखी थीं, पर उनका जबड़ा कसा हुआ था।

"माँ," मैंने कहा, "ये हरनाम का काम है। या भैरव का।"

"मुझे पता है," उन्होंने कहा।

"हमें पुलिस के पास जाना चाहिए।"

माँ ने मेरी तरफ़ मुड़कर देखा, और उनकी आँखों में वो बात थी जो सिर्फ़ बीस साल के डर से आती है।

"पुलिस?" उन्होंने कहा। "बेटा, भैरव के पास पुलिस में आदमी हैं। तेरे पापा ने भी पुलिस में शिकायत दी थी। दी थी न?" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और फिर क्या हुआ? तेरे पापा कुएँ में मिले, और काग़ज़ पर लिखा था — संतुलन बिगड़कर गिरे।"

मैं चुप हो गया।

गुड़िया ने सिसकना बंद किया और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, पर उसमें वो ज़िद थी जो तेरे पापा की थी।

"भैया," उसने कहा, "मैं डर गई थी। पर अब नहीं डर रही।"

"गुड़िया—"

"अगर वो मेरी कॉपी फाड़कर सोचते हैं कि हम रुक जाएँगे, तो वो गलत हैं।" उसने अपनी आवाज़ साफ़ की। "मेरी अगली कॉपी पर मैं यही लिखूँगी — जो लड़ता है, वही जीतता है।"

माँ ने गुड़िया की तरफ़ देखा। फिर वो धीरे से मुस्कुराईं — वो मुस्कान जो दुख के ऊपर से आती है। और फिर उन्होंने गुड़िया को अपने सीने से लगा लिया।

रात को मैंने वो घड़ी जेब से निकाली। उसे मेज़ पर रखा। टूटा काँच, रुकी सुइयाँ। और मैंने सोचा — ये घड़ी कब चलेगी? क्या मैं उस दिन तक ज़िंदा रहूँगा?

मैंने घड़ी उठाई और अपने कान के पास लगाई। सुनाई दिया — टिक टिक। नहीं, वो मेरा दिल था। घड़ी तो रुकी हुई थी।

पर तभी मुझे कुछ और सुनाई दिया। बाहर से। बहुत धीमी आवाज़। जैसे कोई गा रहा हो। वही सुर। पर इस बार वो कुएँ से नहीं आ रहा था।

वो आ रहा था — हमारे घर की खिड़की के नीचे से।

मैं चारपाई से उठा और खिड़की की तरफ़ बढ़ा। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था। मैंने पर्दा हटाया और बाहर झाँका।

आँगन खाली था। दीवार पर कोयले वाला लिखा अभी भी था, अंधेरे में चमकता हुआ। और उस लिखे के ठीक नीचे, ज़मीन पर, कुछ पड़ा था।

एक छोटी सी लालटेन। बुझी हुई।

और उसके साथ एक काग़ज़। मैंने खिड़की खोली, नीचे झुका, और उसे उठाया।

काग़ज़ पर कोयले से लिखा था, वही हाथ, वही अक्षर — "कुएँ का दरवाज़ा मत खोलना। अब भी वक़्त है।"

मैंने काग़ज़ मुठ्ठी में कस लिया। मेरी साँस ऊपर-नीचे चल रही थी। और फिर मैंने वो किया जो मुझे पहले करना चाहिए था।

मैंने वो लालटेन उठाई, उसे जलाया, और सीधा अखाड़े की तरफ़ चल दिया।

पर मैं दस कदम भी नहीं गया था कि सामने से एक परछाई आई। मैंने लालटेन ऊपर की और उसे देखा।

कालू काका थे। उनके हाथ में भी लालटेन थी, और उनकी दाढ़ी में वो हल्की सी मुस्कान थी जो सिर्फ़ उनके पास है।

"जानता था," उन्होंने कहा। "तू आज रुकने वाला नहीं है।"

"कालू काका, किसी ने मेरे घर—"

"मुझे पता है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "मैंने देखा। शाम को हरनाम का आदमी आया था। दो मिनट में गया। मैं उसे रोक नहीं सका, पर मैं उसे पहचानता हूँ।" वो मेरे करीब आए। "और सुन, एक बात। आज रात कुआँ खुलेगा।"

"क्या मतलब?"

"मतलब, जो नीचे है, वो ऊपर आना चाहता है।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "बीस साल से वो नीचे बंद है। और आज उसने तेरा नाम लिया है।"

मैंने लालटेन कसकर पकड़ी। "कौन है वो, कालू काका?"

कालू ने अपना सिर हिलाया। "कल रात तूने पूछा था कि दरवाज़े के पीछे कौन है। मैंने कहा था — रघुवीर नहीं।" उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "आज मैं उसका नाम नहीं बताऊँगा। पर इतना बताऊँगा — वो तेरे पापा का दोस्त था। और उसने भैरव को वो पानी बनाना सिखाया था।"

मेरे हाथ से लालटेन फिसलने लगी। मैंने उसे कस लिया।

"तो वो भी भैरव के साथ था?"

कालू ने एक लंबी साँस ली, और फिर बोले, "हाँ, था। पर जब उसे पता चला कि ये पानी लोगों की जान ले रहा है, तो उसने मना कर दिया। और भैरव ने उसे…" उन्होंने कुएँ की तरफ़ देखा। "उसे वहीं रख दिया। जहाँ वो आज तक है।"

हवा चल रही थी। नीम की पत्तियाँ खड़खड़ा रही थीं। और दूर, अखाड़े की तरफ़, मुझे वो सुर फिर सुनाई दिया। पर इस बार वो गा नहीं रहा था।

वो कह रहा था, बहुत साफ़ शब्दों में — "वीर सिंह। मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ।"

कालू काका ने मेरी आँखों में देखा और धीरे से कहा, "अब तू बड़ा हो गया, बेटा। अब तुझे खुद फ़ैसला करना है — कुआँ खोलेगा या नहीं।"

मैंने थैली सीने से लगाई, घड़ी जेब में कसी, और लालटेन उठाकर आगे बढ़ा।

"खुलेगा," मैंने कहा। "आज रात।"

॥

"खुलेगा," मैंने कहा। "आज रात।"

कालू काका ने मेरी आँखों में देखा। उनकी दाढ़ी काँपी, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस अपनी लालटेन उठाई और मेरे साथ चल दिए।

रास्ते में कोई नहीं बोला। नीम के पेड़ों से पत्ते गिर रहे थे, और हवा में वो गंध थी जो मैंने पहले कभी नहीं सूँघी थी। गीली मिट्टी की गंध, पर उसमें कुछ जला हुआ भी था। जैसे कोई पुरानी रस्सी जल रही हो।

अखाड़े की दीवार पास आई। लाल मिट्टी, ऊँची, चुप। मैंने लालटेन नीचे रखी और दीवार पर हाथ रखा। मिट्टी ठंडी थी।

"कालू काका," मैंने धीरे से कहा। "अगर वो नीचे से ऊपर आया, तो क्या होगा?"

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