Spirit of a Fighter – Chapter 34
उसने आज सफ़ेद कुर्ता पहना था। कंधे पर वही किताबों का बैग। हाथ में एक छोटी सी शीशी — काँच की, जिसमें पानी था। वो मुझे देखते ही बिना हेलो, बिना कुछ, सीधे बात पर आ गई।
"मैंने भैरव के कमरे से पानी का नमूना लिया था। बोतल से नहीं — उस कमरे में एक मटका रखा है, जिसमें वो रोज़ पानी भरता है। मैंने उसमें से शीशी में भर लिया।"
मैं उसके पास गया। दूर गुड़िया पेड़ के दूसरी तरफ़ बैठ गई थी, मेरी तरफ़ पीठ करके — जैसे वो जानती हो कि बड़ों की बात है, पर कान खड़े थे।
"और फिर?" मैंने पूछा।
"फिर मैंने उसे शहर के लैब में जाँच करवाया।" मीरा ने शीशी उठाई। "एक दोस्त है, वो वहाँ काम करता है। उसने बिना नाम लिए जाँच की। वीर, इसमें एक चीज़ मिली है जो ताकत देती है — दम बढ़ाती है, दर्द कम करती है। पर ये शरीर के अंदर की उम्र खा जाती है। धीरे-धीरे। पहले दम, फिर दर्द, फिर बीमारी। और फिर कुछ नहीं।"
उसने शीशी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "जिसने ये पीया, वो ठीक नहीं हो सकता। बस रुक सकता है।"
मैंने शीशी नहीं ली। मैंने सिर्फ़ सूँघा। और वो गंध मेरे नाक में घुस गई — गुड़ जैसी मिठास, ऊपर से। और उसके नीचे वो कड़वाहट, जो गले में जाकर अटक जाती है। वही गंध। वही जो मैंने भैरव के गिलास में सूँघी थी। वही जो लुट्टन की साँस में थी। वही जो मुंशीजी की साँस में थी।
मेरा सिर घूमने लगा। मैंने आँखें बंद कर लीं।
"वीर?" मीरा की आवाज़ दूर से आई। "तुम ठीक हो?"
मैंने आँखें खोलीं। "मैडम," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मुझे अजीब लगी, "ये जाँच ज़रूरी नहीं थी।"
वो चौंकी। "क्या मतलब?"
"मतलब, मुझे पता था।" मैंने शीशी की तरफ़ देखा। "मैं गंध से पहचान लेता हूँ।"
मीरा ने शीशी नीचे की। उसकी आँखें मुझ पर टिक गईं, और उसमें वो नज़र थी जो किसी चीज़ को तौल रही हो।
"गंध से?" उसने दोहराया। "कैसे?"
मैंने गला साफ़ किया। ये बात मैंने कभी किसी को नहीं बताई थी। बचपन में एक बार बताई थी — गाँव के बच्चों ने मुझे "कुत्ता" कहकर चिढ़ाया था, और फिर मैंने कसम खा ली थी कि कभी नहीं बताऊँगा। पर अब मैं बोल रहा था, और ऐसा लग रहा था जैसे कोई पुरानी गाँठ खुल रही हो।
"मुझे बचपन से गंध ज़्यादा आती है। सबकी नहीं — कुछ चीज़ों की। जैसे मिट्टी की। जैसे पसीने की। जैसे…" मैंने शीशी की तरफ़ देखा, "उस पानी में गुड़ जैसी मिठास है, पर पीछे से कड़वी हो जाती है। जो इसे पीता है, उसकी साँस में यही गंध आ जाती है। मेरे पापा ने यही पिया था।"
मीरा कुछ देर चुप रही। फिर उसने शीशी अपने बैग में रखी और धीरे से बोली, "मेरे पिता बीस साल से व्हीलचेयर पर हैं। डॉक्टर कहते हैं कोई बीमारी नहीं। कहते हैं शरीर ठीक है, बस पैर सून्न हैं — जैसे किसी ने अंदर से तार काट दिया हो।" वो मेरी तरफ़ देखने लगी। "मुझे शक है…"
"शक नहीं, मैडम," मैंने कहा। "सच है।"
वो रुक गई। उसके होंठ खुले रह गए, जैसे कुछ कहना चाह रहे हों और शब्द न मिल रहे हों।
"तुम्हें कैसे पता?" उसने पूछा, और उसकी आवाज़ अब वैसी तेज़ नहीं थी। वो धीमी थी। डरी हुई।
"क्योंकि मेरे दो पापा हैं," मैंने कहा। "एक जिसने मुझे गोद लिया — जगदीश। और एक जिसने मुझे जन्म दिया — रघुवीर। दोनों ने यही पानी पिया। और दोनों…" मैंने गला साफ़ किया। "दोनों अब नहीं हैं।"
पानी की आवाज़ आ रही थी। नहर धीरे बह रही थी। गुड़िया ने पेड़ के पीछे से झाँका, और मैंने उसे देखा — उसकी आँखें बड़ी थीं। वो सब सुन रही थी।
मीरा ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक चीज़ निकाली।
यह एपिसोड का वो पल था जिसे मैं आज तक भूल नहीं पाया।
उसके हाथ में एक घड़ी थी। छोटी, चाँदी जैसी, पर टूटी हुई। काँच फटा था, और सुइयाँ जहाँ थीं, वहीं रुकी हुई थीं। उसने उसे अपनी हथेली पर रखा और देखा, जैसे कोई चीज़ को आख़िरी बार देख रहा हो।
"ये मेरे पिता की है," उसने कहा। "जिस दिन वो गिरे, उस दिन ये रुक गई। उस सुबह उन्होंने इसे पहनी थी। और फिर वो कभी नहीं चली।" उसने उँगली घड़ी के फटे काँच पर फेरी। "मैंने इसे ठीक करवाने की बहुत कोशिश की। शहर में बहुत दुकानें हैं। पर मैंने एक भी नहीं करवाई।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि मैंने सोच लिया था — जिस दिन सच खुलेगा, उस दिन मैं इसे चलाऊँगी।" उसने घड़ी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "तुम रखो।"
मैंने हाथ नहीं बढ़ाया। "ये तुम्हारे पापा की है।"
"और अब तुम्हारी है," उसने कहा, और मेरी उँगलियों में घड़ी रख दी। "मेरे पास रखने की हिम्मत नहीं है। रोज़ रात उठकर मैं इसे देखती हूँ और सोचती हूँ — क्या मैं ऐसा कुछ कर रही हूँ जिससे ये फिर चलेगी? और जवाब मिलता है — नहीं। अभी नहीं।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर तुम कर सकते हो। तुम वो हो जो मिट्टी की गंध पहचानता है। तुम रखो। और मुझे वादा करो — जिस दिन सच खुलेगा, तुम ये घड़ी मुझे लौटा दोगे। चलती हुई।"
घड़ी मेरी हथेली में ठंडी थी। उसका वज़न कुछ ज़्यादा लगा — जैसे वो सिर्फ़ घड़ी न हो, बीस साल का इंतज़ार हो।
"वादा," मैंने कहा।
और फिर मैंने उसे सीने से लगा लिया। ऐसे लगाया जैसे कोई बच्चा अपनी सबसे प्यारी चीज़ लुका रहा हो। मेरी आँखें भर आई थीं, पर मैंने मुँह नहीं फेरा। अब छुपाने की ज़रूरत नहीं थी।
मीरा ने दूसरी तरफ़ देखा। शायद वो भी अपनी आँखें छुपा रही थी। फिर उसने आवाज़ संभाली और कहा, "अब प्लान।"
"प्लान?"
"हाँ। हमें सबूत चाहिए। पक्के। ऐसे जो पंचायत के सामने रख सकें। मैं लैब की रिपोर्ट लाऊँगी — लिखित, मुहर लगी। और तुम अखाड़े के अंदर से कुछ लाओ। उस हरी कॉपी का पता करो जो मुंशीजी ने बताई। हरनाम की कॉपी।"
"टिंकू उसी के पीछे लगा है," मैंने कहा। "आज शाम वो हरनाम के घर मिठाई पहुँचाने गया है।"
"अच्छा।" उसने अपना बैग उठाया। "तो अब हम दो नहीं, तीन हैं।" वो रुकी और मेरी तरफ़ देखा। "और वीर, एक बात। अगली बार जब भैरव तुम्हें पानी दे, तो पीना मत। चाहे कुछ भी हो जाए।"
"मैंने पहले ही मना कर दिया था," मैंने कहा। "सबके सामने।"
वो चौंकी। "सबके सामने? तुम पागल हो?"
"तो क्या करता? मैं सूँघता हूँ, पर झूठ नहीं बोल सकता। जो पानी ज़हर है, वो ज़हर है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ वो नज़र से देखा जो पहले कभी नहीं देखी थी। गुस्से की नहीं। कुछ और। जैसे वो मुझे पहली बार देख रही हो। असली में देख रही हो।
"तुम अजीब हो," उसने कहा। "गाँव का मज़दूर, अखाड़े के बाहर खड़ा, और भैरव सिंह को उसके सामने झूठा कह देता है।"
"मैडम, मैं झूठा नहीं कहा। मैंने कहा — ये ज़हर है।"
वो हँसी। पहली बार। छोटी सी हँसी, जैसे बारिश की पहली बूँद। और फिर उसने अपना बैग कंधे पर टिकाया और कहा, "ठीक है। कल इसी वक़्त। यहीं। रिपोर्ट लेकर आऊँगी।"
वो मुड़ी, फिर रुकी और बिना पलटे बोली, "और वीर, मुझे 'मैडम' मत कहो। मीरा काफ़ी है।"
वो चली गई। मैं वहीं खड़ा रहा, हाथ में टूटी घड़ी, और मेरे सीने में कुछ ऐसा धड़क रहा था जो पहलवानी की मेहनत से नहीं आता।
गुड़िया पेड़ के पीछे से निकली। उसकी आँखें अभी भी बड़ी थीं।
"भैया," उसने कहा, "वो दीदी रो रही थीं?"
"नहीं," मैंने कहा। "वो लड़ रही थीं।"
गुड़िया ने घड़ी देखी। "ये क्या है?"
"अब ये हमारी है," मैंने कहा, और उसे अपनी जेब में रख लिया। "और एक दिन ये चलेगी।"
घर लौटते वक़्त रास्ते में गुड़िया मेरे साथ-साथ चल रही थी, और वो बार-बार मेरी तरफ़ देख रही थी। फिर उसने धीरे से कहा, "भैया, वो दीदी अच्छी हैं।"
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