Spirit of a Fighter – Chapter 33
हरे रंग की कॉपी। हरनाम के पास।
और आज शाम टिंकू हरनाम के घर मिठाई पहुँचाने जा रहा है।
रात को माँ ने थाली परसी। दाल, रोटी, और आम का अचार। मैंने एक कौर उठाया और वहीं रुक गया।
नमक कम था।
माँ चक्की के पास बैठी थीं, कमर सहलाते हुए। गुड़िया कॉपी पर सिर झुकाए बैठी थी। और मैंने चम्मच रख दिया।
"माँ।"
"हूँ।"
"तू रोज़ नमक कम क्यों डालती है?"
माँ का हाथ रुक गया। कमरे में सिर्फ़ गुड़िया की पेंसिल की आवाज़ रह गई। फिर वो भी रुक गई।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। चूल्हे की रोशनी उनके चेहरे पर थी। और उनकी आँखों में वो गीलापन, जो मैंने पहले भी कई बार देखा था पर कभी नाम नहीं दिया था।
"क्योंकि तेरे पापा जब ज़िंदा थे, तब भी मैं नमक कम डालती थी," उन्होंने कहा।
मैं चुप रहा।
"रघुवीर कहते थे — 'सरसू, तेरे हाथ में ज़ायका है, पर नमक तू कंजूसी से डालती है।'" माँ ने चक्की का हत्था छोड़ा। "मैं हँसकर टाल देती थी। पर सच ये था कि घर में नमक भी कम था। पैसे नहीं थे। और मुझे शर्म आती थी कि थाली में कमी दिखे। तो मैं कह देती थी — 'जान-बूझकर कम डालती हूँ, ज़्यादा नमक सेहत के लिए ठीक नहीं।'"
उन्होंने आँचल से आँखें पोंछीं, बिना रोए।
"वो मान जाते थे। हर बार मान जाते थे।" माँ की आवाज़ टूटी, पर सिर्फ़ एक पल के लिए। फिर वो सँभल गईं। "और जब वो मरे, तो मैंने नमक कम डालना बंद नहीं किया। क्योंकि ज़िंदगी में जो कमी हो, बेटा, वो खाने में नहीं दिखनी चाहिए। लोग थाली देखते हैं, बटुआ नहीं।"
मैंने अपना सिर नीचे कर लिया। मेरे हाथ काँप रहे थे। गुड़िया ने अपनी कॉपी बंद कर दी थी और वो भी चुप बैठी थी।
"और ये सब मैंने तुझसे छुपाया," माँ ने कहा। "ये मेरी गलती थी। तुझे पता होना चाहिए था कि तेरा बाप कैसा आदमी था — भूखा, पर ईमानदार। कमज़ोर, पर सच बोलने वाला।" उन्होंने मेरी थाली की तरफ़ देखा। "अब खा। और अगली बार अगर कम लगे, तो बोल देना। अब हमें छुपाने की ज़रूरत नहीं।"
मैंने सिर हिलाया। गला भरा हुआ था, तो कुछ बोल नहीं सका। मैंने रोटी उठाई और खाने लगा। और मुझे पहली बार अहसास हुआ कि दाल में नमक क्यों कम था — ये नमक की कमी नहीं थी। ये एक औरत का बीस साल पुराना हिसाब था, जो वो हर रोज़ चुकाती थी।
खाना खत्म करके जब मैं उठा, तो माँ ने कहा, "कल तू नहर पर मिलने जाएगा। मैं जानती हूँ।"
मैं रुका।
"जा," उन्होंने कहा। "पर एक बात याद रख।" उन्होंने थाली उठाई और मेरी तरफ़ देखा। "वो लड़की अखाड़े की बेटी है। और अखाड़ा किसी को मुफ़्त नहीं छोड़ता। जो इसमें एक बार आ गया, उसे ये अपना हिस्सा बना लेता है — खून का या पसीने का। तेरे पापा ने अपना खून दिया।" उन्होंने थाली बर्तन वाली जगह पर रखी। "तू क्या देगा, सोच लेना।"
वो अंदर चली गईं। गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से मुस्कुराई। फिर वो उठी और मेरे पास आकर बोली, "भैया, कल मैं भी चलूँगी। दीवार के बाहर तक। तुम अंदर जाओ, मैं बाहर रहूँगी। और अगर तुम डेढ़ घंटे में न निकले, तो मैं सुक्खी बुआ को बुला लाऊँगी।"
"गुड़िया—"
"मेरी शर्त है," उसने कहा, और अपनी चोटी झटककर अंदर चली गई। इस घर की औरतें बात करने का ढंग जानती हैं। वो शर्त नहीं रखतीं। वो फ़ैसला सुना देती हैं।
रात को मैं लेटा, तो नींद नहीं आई। थैली सिरहाने थी, और उस छोटे काग़ज़ के टुकड़े पर लिखे "रघु" अक्षर मेरी आँखों के सामने तैर रहे थे।
फिर मुझे वो बात याद आई जो कालू काका ने कही थी — "अगर नींद में कोई आवाज़ आए, तो मत उठना।" और पिछली रात आवाज़ आई थी। और आज थैली की गाँठ खुली थी।
मैंने करवट बदली और धीरे से फुसफुसाया, खुद से, "मैं तेरा नाम नहीं पूछूँगा।"
कमरे में सन्नाटा था। माँ की साँसें अंदर के कमरे से आ रही थीं। गुड़िया की चूड़ी की हल्की खनक। और बाहर झींगुर।
फिर, बहुत धीमी आवाज़ में, जैसे हवा दीवार से रगड़ खा रही हो, मुझे कुछ सुनाई दिया। शब्द नहीं। सिर्फ़ एक सुर। जैसे कोई गा रहा हो, पर बहुत दूर से।
मैंने आँखें खोलीं। खिड़की के बाहर अंधेरा था। और उस अंधेरे में, अखाड़े की तरफ़, एक लालटेन जल रही थी। छोटी-सी रोशनी, जो धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी — कुएँ की तरफ़।
कोई कुएँ पर जा रहा था। रात के इस वक़्त।
मैं उठ बैठा। मेरी साँस रुक गई। लालटेन कुएँ के मुँह पर रुकी, फिर नीचे की तरफ़ झुकी — जैसे कोई नीचे देख रहा हो। और फिर वो रोशनी गायब हो गई।
जैसे किसी ने लालटेन बुझा दी हो। या नीचे उतर गया हो।
मैंने थैली उठाई और अपने सीने से लगा ली। मेरी उँगलियों में लाल मिट्टी चुभ रही थी और मेरे कानों में वो सुर अब भी गूँज रहा था — जो अब धीमा नहीं था। अब वो साफ़ था। और वो एक ही बात कह रहा था, बार-बार, जैसे कोई दीवार के पीछे से मुट्ठी मार रहा हो।
"अब आया। अब आया। अब आया।"
॥
"अब आया। अब आया।"
मैंने थैली सीने से लगाई और सीधा दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। मेरे पैर नंगे थे और ज़मीन ठंडी थी, पर मुझे ठंड नहीं लग रही थी। लग रही थी आग। कानों में वो सुर, सीने में वो थैली, और आँखों में वो लालटेन जो कुएँ के मुँह पर झुककर गायब हो गई थी।
दरवाज़े की कुंडी मैंने धीरे से उठाई। पर तभी पीछे से माँ की आवाज़ आई।
"खड़ा रह।"
वो अंधेरे में दरवाज़े के पास खड़ी थीं। मुझे पता ही नहीं चला कब आईं। उनके हाथ में लालटेन नहीं थी। सिर्फ़ उनकी आवाज़ थी, जो अंधेरे को चीर रही थी।
"माँ, कुएँ पर कोई—"
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "बीस साल से जानती हूँ।"
मैं रुक गया। मेरा हाथ कुंडी पर जम गया।
"तो आपने मुझे अब तक क्यों नहीं बताया?"
माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर वो धीरे से बोलीं, "क्योंकि जो नीचे जाता है, वो अकेला नहीं लौटता। और मैं तुझे खोना नहीं चाहती थी।" उनकी आवाज़ में वो काँप था जो सिर्फ़ माँ की आवाज़ में होता है। "पर अब देख रही हूँ, तू तो जाएगा ही। तेरे पापा की तरह ज़िद्दी है।"
मैंने कुंडी छोड़ दी और उनकी तरफ़ मुड़ा। अंधेरे में उनका चेहरा ठीक से नहीं दिख रहा था, पर उनके हाथ जुड़े हुए थे — जैसे कोई दुआ माँग रही हों।
"आज मत जा," उन्होंने कहा। "सुबह जा। सुबह सब कुछ साफ़ दिखता है। रात में इंसान अपनी आँखों से ज़्यादा अपने डर से देखता है।"
मैंने सिर हिलाया। और सच कहूँ तो मैं खुद भी नहीं जाना चाहता था। उस सुर ने मेरी हिम्मत हिला दी थी। मैं लौटकर चारपाई पर बैठा और सुबह होने तक जागता रहा।
सुबह जब मैं उठा, तो आँगन में गुड़िया बाल संवार रही थी और माँ चक्की पर थीं। चक्की की आवाज़ आज अलग लग रही थी। जैसे वो मुझसे कुछ कह रही हो — "भाग मत, रुक।"
मैंने मुँह धोया और दाल की गंध में खड़ा रह गया। माँ ने आज नमक ठीक डाला था। ये पहला दिन था जब दाल पूरी थी। और मुझे लगा जैसे घर ने मुझे छुट्टी दे दी हो — अब तू जा, अब हमें छुपाने की ज़रूरत नहीं।
गुड़िया ने मेरी थाली में रोटी रखी और धीरे से बोली, "भैया, आज नहर पर जाना है न?"
"हाँ।"
"मैं भी चलूँगी। दीवार के बाहर तक। जैसा तय हुआ था।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "ठीक है।"
नहर का मोड़ दोपहर में सुनसान हो जाता है। खेतों में काम करने वाले लोग घर लौट जाते हैं, और सिर्फ़ पानी की आवाज़ बचती है। बबूल का पेड़ वहीं था — पुराना, टेढ़ा, और उसकी छाया में मीरा खड़ी थी।
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