Spirit of a Fighter32 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 32

7 min read November 5, 2026

मैंने बर्तन को थोड़ा ऊपर किया। "मुझे इजाज़त चाहिए ही नहीं, मैडम। मुझे बस मिट्टी की गंध अच्छी लगती है।"

वो एक पल चुप रही। फिर हँस पड़ी। ऐसी हँसी जो अचानक फूट पड़े, बिना तैयारी के। और उसके चेहरे पर जो हमेशा एक तनी हुई डोर बँधी रहती थी, वो ढीली हो गई।

"पागल हो," उसने कहा। और फिर उसने मेरे कंधे के पास देखा, जहाँ दीवार पर काई जमी थी। "सच में? गंध?"

"यहाँ की मिट्टी और बाकी जगह की मिट्टी में फ़र्क है," मैंने कहा, और मुझे खुद हैरानी हुई कि मैंने इतना कह दिया। "ये लाल मिट्टी है, पर इसके नीचे एक और परत है। पुरानी। उसमें मिट्टी का तेल नहीं, पसीने की गंध है। बहुत सालों का पसीना।"

मीरा ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ अजीब कहा हो। पर उसने मज़ाक नहीं उड़ाया। वो गंभीर हो गई।

"वीर।" उसकी आवाज़ बदल गई थी। "तुम्हें कभी ऐसा लगा कि अखाड़े का पानी किसी और का पानी है?"

मेरा हाथ बर्तन पर कस गया। वो क्या जानती है? क्या उसे पता है? क्या उसने अपनी आँखों से कुछ देखा है? मैंने उसकी आँखों में देखा — उसमें शक था, डर था, और कुछ ऐसा जो कहना चाहती थी पर कह नहीं पा रही थी।

"मैडम, आप—"

"अरे!"

आवाज़ गेट से आई। लुट्टन। वो अपना पेट पकड़े हुए खड़ा था — अभी भी बीमार, चेहरा पीला, आँखें धँसी हुईं। पर उसकी आवाज़ में वही पुरानी चीख थी।

"ये बाहर वाला यहाँ क्या कर रहा है?" वो लड़खड़ाते हुए आया और मेरा कंधा पकड़कर धकेला। चाय का बर्तन हिला, और गरम चाय की कुछ बूँदें मेरे हाथ पर गिरीं।

"भैरव सर को पता चला तो हड्डी-हड्डी अलग कर देंगे," उसने मेरे कान के पास कहा। उसकी साँस में वो गंध थी — कड़वी, बासी, अंदर से आती हुई। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। वो गंध मैं पहचानता था। वो भैरव की बोतल की गंध थी।

लुट्टन खुद ज़हर पी रहा था। और उसे पता भी नहीं था।

मैंने सिर झुका लिया। कुछ नहीं कहा। यही मेरी ताकत थी — जब कोई धक्का दे, तो चुप रहना। क्योंकि जो चुप रहता है, वो देखता है। और जो देखता है, वो जानता है।

"लुट्टन।"

मीरा की आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई चाकू मेज़ पर रख दे। "ये मेरा काम है। तू अपना देख।"

लुट्टन रुका। उसने मीरा की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। उसके होंठ हिले, जैसे कुछ कहना चाहता था। पर फिर उसने मुँह फेर लिया और अंदर चला गया। कुछ कदम जाकर वो पीछे मुड़ा और मुझे घूरा — ऐसी नज़र से जैसे कोई हिसाब लिख रहा हो। फिर गेट के अंधेरे में गायब हो गया।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो तेज़ी अब भी थी, पर कुछ और भी था। शायद शर्म। या शायद वो भी जान गई थी कि मैंने कुछ देखा है जो नहीं कहा।

"तुम चुप क्यों रहे?" उसने पूछा। "उसने तुम्हें धक्का दिया। तुमने एक बात नहीं कही।"

"कहने से क्या होता, मैडम?" मैंने कंधा सहलाया। "जो धक्का देता है, वो अपनी ताकत दिखाता है। जो चुप रहता है, वो अपनी ताकत बचाता है।"

वो मेरी तरफ़ देखती रही। लंबे समय तक। और मैंने पहली बार देखा कि उसकी आँखों में जो हमेशा एक पत्थर जैसी सख्ती रहती थी, उसमें एक दरार पड़ गई थी।

"कल इसी वक़्त," उसने धीरे से कहा। "नहर के उस मोड़ पर। जहाँ बबूल का पेड़ है। मुझे तुमसे कुछ पूछना है।"

"क्या?"

"वो जो तुमने अभी कहा — पसीने की गंध।" उसने अपना बैग कंधे पर ठीक किया। "मुझे भी कुछ सूंघना है। और मुझे लगता है कि तुम ही बता सकते हो कि वो क्या है।"

वो पलटी और गेट की तरफ़ चली गई। पर कुछ कदम जाकर रुकी, बिना पलटे कहा, "और वीर — चाय ठंडी हो रही है।"

मैं हँसा। पहली बार, कई दिनों में, मेरे अंदर से एक हँसी निकली। और जब वो गेट के अंदर गई, मैंने अपना कंधा सहलाया और चुपचाप मुस्कुराया।

क्योंकि लुट्टन के हाथ की गंध मेरे कपड़े पर लग गई थी। और मुझे पता चल गया था — लुट्टन बीमार नहीं है। लुट्टन ज़हर पी रहा है। अपने आप नहीं। कोई उसे पिला रहा है। और वो आदमी उसके अपने आका के सिवा कौन होगा?

अंदर जाकर मैंने मुंशीजी को चाय दी। वो मेज़ पर बैठे थे, सामने फ़ाइलों का ढेर, चश्मा नाक पर टिका हुआ। उन्होंने बर्तन हाथ में लिया, एक घूँट पिया, और आँखें बंद कर लीं।

"अरे वाह," वो बोले। "टिंकू का हाथ है? गुड़ और अदरक का तोड़ है। पहचान लिया।"

"हाँ, मुंशीजी।"

"बैठ जा।" उन्होंने बगल की कुर्सी की तरफ़ इशारा किया। "तू वही है न जिसने लुट्टन को पछाड़ा? वीर?"

"जी।"

"तो बैठ।" उन्होंने फ़ाइल बंद की। "भैरव सर ने तेरे बारे में पूछा था आज सुबह। कहा — 'वो लड़का कहाँ से आया?' मैंने कहा, 'मालिक, गाँव का है, मज़दूर है।' तो उन्होंने कहा—" मुंशीजी ने चाय की तरफ़ देखा। "उन्होंने कहा, 'मज़दूर नहीं। ये वो है जो मिट्टी सूंघता है।'"

मेरे पेट में ठंडी सुई चुभी।

"मिट्टी सूंघता है?" मैंने पूछा, आवाज़ सामान्य रखने की कोशिश करते हुए।

"मुझे क्या पता," मुंशीजी ने कहा। "मैं तो हिसाब रखता हूँ, बातें नहीं।" उन्होंने एक और घूँट लिया और फ़ाइल खोली। उनकी उँगली पन्नों पर चलने लगी। उनका चेहरा जैसे काग़ज़ की तरह पीला था। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं। और उनकी साँस में भी वो कड़वाहट थी।

मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मुंशीजी भी। भैरव इन्हें भी पिला रहा है।

"मुंशीजी," मैंने धीरे से कहा। "ये फ़ाइलें कहाँ जाती हैं? जब पूरी हो जाएँ, तो?"

"भैरव सर की अलमारी में," उन्होंने बिना देखे कहा। "हर साल की फ़ाइल। मौत का रिकॉर्ड, जीत का हिसाब, खर्चा। सब।"

"और उसमें पहलवानों के नाम भी?"

"नाम, गाँव, मौत की वजह, तारीख़।" उन्होंने एक पन्ना उलटा। "मैंने खुद लिखी हैं। बीस साल में… कितने?" उनकी उँगली रुकी। "बहुत सारी।"

वो चुप हो गए। उनकी आँखें पन्ने पर टिकी रहीं, पर वो पढ़ नहीं रहे थे। वो कुछ और देख रहे थे — शायद अपना चेहरा, उसी हिसाब की किताब में।

"तू जा," उन्होंने अचानक कहा। "चाय अच्छी थी। कहना टिंकू से, कल फिर भेजे।"

मैं उठा। दरवाज़े तक गया। फिर रुका।

"मुंशीजी।"

"हूँ?"

"आपकी साँस में जो गंध है।" मैंने पलटकर देखा। "वो अखाड़े के पानी में भी है।"

उनका हाथ रुक गया। उन्होंने धीरे से फ़ाइल बंद की, चश्मा उतारा, और मुझे देखा। उनकी आँखों में डर था — बहुत पुराना डर। ऐसा डर जिसे वो रोज़ सुबह पहनकर अंदर आते थे।

"तू क्या कह रहा है, बेटा?"

"जो कह रहा हूँ, वो आप जानते हैं।"

वो कुछ देर चुप बैठे। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "मैं बीस साल से इस कुर्सी पर बैठा हूँ। और बीस साल से मैं जानता हूँ कि मैं गलत जगह बैठा हूँ। पर निकलने की हिम्मत नहीं हुई।" उन्होंने चश्मा मेज़ पर रखा। "अब निकलूँ, तो क्या होगा? मेरी बीवी, मेरे बच्चे — सब इसी अखाड़े के पैसे पर चलते हैं।"

"तो कोई रास्ता होगा, मुंशीजी।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। लंबे समय तक। फिर उन्होंने धीरे से, इतने धीरे कि मुश्किल से सुनाई दिया, कहा, "हरनाम के पास जो कॉपी है — हरे रंग का कवर। वो अलमारी की नहीं है। वो उसकी अपनी है। वो उसने खुद लिखी है, ताकि अगर कभी झगड़ा हो, तो सबूत उसके पास रहे।" उन्होंने चाय का आख़िरी घूँट लिया। "अगर वो कॉपी किसी और के हाथ लग जाए, तो बीस साल का हिसाब एक दिन में खुल जाएगा।"

मैंने मुंशीजी को देखा। वो फिर से अपनी फ़ाइल में लग गए थे, जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर उनकी उँगलियाँ अब धीरे चल रही थीं। किसी फ़ैसले के बाद की तरह।

बाहर निकला तो सूरज सिर पर था। मैंने अपना बर्तन खाली किया और दीवार के सहारे खड़ा हो गया।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho