Spirit of a Fighter31 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 31

7 min read November 5, 2026

"वीर।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "अगर तू उस दरवाज़े के पास जाए, तो मेरी बात याद रखना। जो आवाज़ आए, वो तुझे बुलाएगी। पर तू सिर्फ़ अपना नाम सुनना, और अपना काम करना। और अगर वो तुझसे कहे कि वो तेरा कोई अपना है — तो उससे पूछना, 'तुम्हारा नाम क्या है?' अगर वो नाम न बता पाए, तो जान लेना कि वो झूठ बोल रहा है।"

"तुम्हें कैसे पता, माँ?"

उन्होंने मेरा हाथ छोड़ा और फिर से चूल्हे की तरफ़ देखा।

"क्योंकि मैंने भी एक बार वो आवाज़ सुनी थी," उन्होंने कहा। "तेरे पापा के जाने के बाद। रात में। मैं कुएँ तक गई थी। मुझे बुलाया गया था।" उन्होंने आँच में लकड़ी डाली और आग भड़क उठी। "मैंने पूछा था — 'तुम कौन हो?' और उसने जवाब नहीं दिया। बस गाना बंद हो गया। और उस रात के बाद मैंने वो आवाज़ कभी नहीं सुनी। जैसे उसे पता चल गया कि मैं जान गई हूँ।"

घर में सन्नाटा छा गया। बाहर से झींगुरों की आवाज़ आ रही थी, और दूर कहीं कुत्ता भौंक रहा था।

मैंने रोटी खाई। इस बार नमक की कमी महसूस नहीं हुई।

रात को मैं सोने जा ही रहा था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। धीमी, तीन बार — ठक, ठक, ठक। माँ सो चुकी थीं, गुड़िया भी। मैंने किवाड़ खोला।

बाहर कालू काका खड़े थे। चाँदनी में उनका कुबड़ा शरीर और भी छोटा लग रहा था, और उनके हाथ में वो लाल मिट्टी की थैली थी — गुड़िया की थैली, जो मैंने कुएँ में गिरा दी थी। उस पर लगी मिट्टी अभी भी ताज़ी थी, और उसकी रस्सी में कुछ उलझा हुआ था — माँ की फोटो की टुकड़ी, जो अब भीगी हुई थी।

"ये तेरी बहन की है?" उन्होंने पूछा, और उनकी आवाज़ में वो धीमापन नहीं था, एक झिझक थी।

"हाँ।"

"इसे मेरे पास मत छोड़ना।" उन्होंने थैली मेरे हाथ में रखी, और उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं। "भैरव की आँखें इस मिट्टी को भी पहचानती हैं। वो रंग जानता है।"

"आपको ये कहाँ मिली?"

कालू काका ने पीछे देखा — अंधेरे में, जैसे कोई सुन रहा हो — और फिर मेरे करीब आकर फुसफुसाए।

"मैंने आज शाम कुएँ के पास जाकर देखा। तू जानता है क्या मिला? ढक्कन खुला था। और उसके चारों तरफ़ पैरों के निशान थे — बड़े, भारी, जूतों वाले। भैरव कभी कुएँ पर नहीं आता, वीर। कभी नहीं।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "तो आज ऊपर कौन था?"

"आपको अंदाज़ा है?"

वो कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "दो आदमी हैं जो भैरव के इतने करीब हैं कि उसके बिना भी उसका काम कर सकें। एक लुट्टन है — पर लुट्टन आज बीमार है, तूने ही उसे पछाड़ा है, वो उठ नहीं सकता। और दूसरा…" वो रुके। "दूसरा हरनाम है। ठेकेदार। वो जूते पहनता है — अंग्रेज़ी जूते, चमड़े के। और उसके पैर भारी हैं।"

मेरा पेट कड़ा हो गया। "हरनाम? पर वो तो सिर्फ़ हिसाब रखता है।"

"हिसाब रखने वाला ही सबसे ज़्यादा जानता है," कालू काका ने कहा। "और सबसे ज़्यादा जानने वाला ही सबसे ज़्यादा डरता है। शायद आज वो खुद देखने आया था कि कुएँ में क्या है।"

उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा — वो हाथ जो मिट्टी से सूखा हुआ था, पर आज उसमें कुछ और था।

"वीर।" उनकी आवाज़ धीमी थी। "आज रात कुआँ मत खोलना। ना आज, ना कल। जब तक मैं तुझे न बुलाऊँ।"

"पर वो आवाज़—"

"वो आवाज़ बीस साल से गा रही है," उन्होंने कहा। "दो दिन और गा लेगी। पर अगर भैरव को पता चल गया कि तूने दरवाज़ा देख लिया है, तो वो तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेगा — दरवाज़े के पीछे वाले की तरह।" उन्होंने हाथ हटाया। "और एक बात। आज भैरव ने पूरे गाँव में पूछवाया है कि रात कुएँ पर कौन था। सुक्खी बुआ से पूछवाया। और सुक्खी बुआ ने क्या कहा, पता है?"

"क्या?"

"उसने कहा — 'अरे मैंने तो सुना है कि वीर सिंह रात को अखाड़े की तरफ़ जाता है।'" कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "सुक्खी बुआ को कुछ नहीं पता। पर भैरव उसकी बात सुनकर खुश हुआ होगा। अब उसकी नज़र तुझ पर है — पहले से ज़्यादा।"

वो पलटे और अंधेरे में चले गए। कुछ कदम दूर जाकर रुके और बिना पलटे कहा, "तेरे हाथ में जो थैली है — उसे अपने सिरहाने रखकर सोना। आज रात। और अगर नींद में कोई आवाज़ आए, तो मत उठना। बस थैली पकड़े रहना।"

"क्यों?"

"क्योंकि मिट्टी जानती है कि किसे बचाना है," उन्होंने कहा, और अंधेरे में गायब हो गए।

मैं किवाड़ बंद करके अंदर आया। थैली मेरे हाथ में थी — गीली, भारी, और उसमें से लाल मिट्टी की गंध आ रही थी, जो अखाड़े की मिट्टी से अलग थी। ये ज़्यादा पुरानी थी। ज़्यादा गहरी। जैसे किसी कब्र से निकली हो।

मैंने उसे सिरहाने रखा और लेट गया।

आँखें बंद कीं, तो कुएँ का चेहरा दिखा — जंग लगा दरवाज़ा, तेल लगा ताला, और उसके पीछे से आती वो आवाज़। और फिर वो भारी कदम, जो ऊपर से आ रहे थे, और रुक गए थे — कुएँ के मुँह पर, ठीक मेरे सिर के ऊपर।

मैंने करवट बदली। थैली मेरी उँगलियों में थी, और उसकी मिट्टी की गंध धीरे-धीरे मेरी साँस में भर रही थी।

नींद आई, तो सपने में वो आवाज़ आई। पर आज वो गा नहीं रही थी। आज वो बोल रही थी।

और वो एक ही बात बार-बार कह रही थी — "वीर। मेरा नाम मत पूछना। मेरा नाम मत पूछना। मेरा नाम मत पूछना।"

मैं उठा, तो पसीने से भीगा हुआ था। बाहर अभी भी रात थी। और थैली मेरे हाथ में थी — पर उसकी गाँठ खुली हुई थी।

॥

थैली की गाँठ खुली थी। मैंने उसे उलटा किया, तो लाल मिट्टी मेरी हथेली पर गिरी — और उसके साथ एक छोटी-सी पुरानी चीज़। काग़ज़ का टुकड़ा। इतना छोटा कि मेरे अंगूठे से बड़ा नहीं। उस पर किसी ने स्याही से कुछ लिखा था, पर स्याही पानी से फैल गई थी। सिर्फ़ दो अक्षर बचे थे — "रघु"। बस इतना। माँ की फोटो की टुकड़ी तो थैली में थी ही, पर ये काग़ज़ उससे भी पुराना लग रहा था। कुएँ की मिट्टी में दबा हुआ, बीस साल से।

मैंने उसे सीने से लगाया। सुबह की पहली किरण खिड़की से आ रही थी, और माँ की चक्की की आवाज़ भी। पर आज मैं चक्की के पास नहीं गया। आज मेरे हाथ में चाय का बर्तन था।

मुंशीजी के लिए गुड़-अदरक वाली चाय। टिंकू ने सुबह-सुबह मुझे दुकान पर बुलाकर ये काम सौंपा था — "भाई, आज मैं हरनाम के यहाँ जा रहा हूँ, मिठाई पहुँचाने। तू चाय पहुँचा दे। बहाना चाहिए न दोनों तरफ़।" और उसने मेरे हाथ में एक टिन का बर्तन पकड़ा दिया था, ऊपर से मोटा कपड़ा बाँधकर, ताकि चाय ठंडी न हो।

अखाड़े के बाहर, जहाँ दीवार खत्म होकर खुला मैदान शुरू होता है, मैं खड़ा था। बर्तन दोनों हाथों से पकड़े। सामने गेट। अंदर से किसी के गरजने की आवाज़ आ रही थी — भैरव। वो किसी को डाँट रहा था।

तभी एक कार आई और मेरे ठीक सामने रुकी। धूल उड़ी, और मैंने अपनी आँखें सिकोड़ लीं।

मीरा उतरी। कंधे पर वही किताबों का बैग, हाथ में एक छोटा डिब्बा। उसने मुझे देखा और रुक गई। एक पल के लिए लगा कि वो नज़र चुराकर गेट की तरफ़ बढ़ जाएगी। पर नहीं। वो सीधी मेरी तरफ़ आई।

"तुम यहाँ क्यों खड़े रहते हो?"

"चाय लाया हूँ। मुंशीजी के लिए।"

"चाय लाने के लिए तुम सुबह-सुबह दीवार से चिपके खड़े हो? सीधे अंदर क्यों नहीं जाते?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

वो मेरे चेहरे को देखती रही। फिर उसकी नज़र मेरे बर्तन पर गई, फिर मेरे हाथों पर — जिन पर चक्की के छाले थे, और कोहनी पर वो हल्दी वाला पट्टा। उसका भौंह सिकुड़ा।

"तुम यहाँ खड़े रहते हो क्योंकि तुम्हें अंदर आने की इजाज़त नहीं?"

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