Spirit of a Fighter340 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 340

7 min read November 5, 2026

"अंदर आ जाओ," रणवीर सिंह ने कहा, बिना पलटे।

हम अंदर गए। मीरा उनके पास बैठ गई, और मैं दरवाज़े के पास ही खड़ा रहा। मुझे नहीं पता था कि हाथ कहाँ रखूँ।

"बैठ," रणवीर सिंह ने कहा।

मैं बैठ गया।

मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस बैग से वो रूमाल निकाला, खोला, और शीशी उनके सामने मेज़ पर रख दी।

रणवीर सिंह ने शीशी देखी। फिर देर तक देखी। फिर उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

"मैं जानता था," उन्होंने धीरे से कहा।

मीरा का हाथ रुक गया।

"आप जानते थे?"

"नहीं," वो बोले। "मतलब… मुझे शक था। पर सबूत नहीं था। और बीस साल से मैं खुद को यही समझाता रहा कि मैं बीमार हूँ, बस। आदमी बूढ़ा होता है, पैर जवाब दे देते हैं। यही सोचकर सो जाता था।"

उन्होंने आँखें खोलीं, और उनमें वो पानी था जो मैंने उनकी आँखों में एक बार ही देखा था।

"सच्चाई जानना," उन्होंने कहा, "और भी मुश्किल है।"

"पापा—"

"मैंने तुम्हारी माँ को खोया," उन्होंने मीरा की तरफ़ देखकर कहा। "उस दिन भी मैं यही सोचता रहा कि ईश्वर की मर्ज़ी है।" उनकी आवाज़ रुकी। "और मैंने अपने पैर खोए, और यही सोचता रहा कि कुश्ती का असर है।"

"पापा, अब बात साफ़ हो गई," मीरा ने कहा। "हम आपको ठीक करवा सकते हैं। रुक जाएगा। आयुर्वेद में—"

"मैं ठीक नहीं होऊँगा, बेटा," उन्होंने कहा। बिना तरस खाए, बिना डर के, जैसे मौसम बता रहे हों। "पर मैं ज़िंदा रह सकता हूँ। और इस आदमी को रोक सकता हूँ। बस यही काफ़ी है।"

वो मेरी तरफ़ पलटे।

"तुझे हरनाम चाहिए," उन्होंने कहा। ये सवाल नहीं था।

मैंने सिर हिलाया।

"हरनाम मेरे पास आता था," रणवीर सिंह बोले। "जब मैं अखाड़े का मालिक था। उस वक़्त वो सिर्फ़ हिसाब रखता था, काग़ज़ लिखता था। अच्छा आदमी था। घर-गृहस्थी वाला।"

"फिर क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।

"फिर उसका बेटा बीमार पड़ा।" रणवीर सिंह ने अपनी उँगली कुर्सी की बाँह पर धीरे से थपथपाई। "इलाज के पैसे नहीं थे। भैरव ने पैसे दिए। बहुत पैसे दिए, एक साथ। और हरनाम उस दिन से उसका हो गया।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

"और उसका बेटा?" मैंने पूछा।

"बच गया," रणवीर सिंह ने कहा। "आज शहर में है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "इसीलिए हरनाम डरता है। वो जानता है कि भैरव जिसे नीचे गिराता है, उसे उठने नहीं देता। वो अपने बेटे के लिए डरता है।"

"तो उसे तोड़ा कैसे जाए?" मीरा ने पूछा। "वो सच बोलेगा ही नहीं।"

"वो सच बोलेगा," रणवीर सिंह ने कहा, "जिस दिन उसे लगेगा कि भैरव उसके बेटे तक पहुँच गया है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी तरफ़ देखा। दोनों के दिमाग़ में एक ही बात आई।

"गोलू," मैंने धीरे से कहा।

"कौन गोलू?" रणवीर सिंह ने पूछा।

"लुट्टन की बेटी," मीरा ने कहा। "दो साल से शहर में, हरनाम के नाम वाले घर में रहती है।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "वो भैरव ने वहाँ रखवाई है, पापा।"

रणवीर सिंह ने आँखें बंद कर लीं। फिर खोलीं।

"तो हरनाम को यही बताना है," उन्होंने कहा। "कि भैरव उसकी बेटी को हरनाम के घर में इसलिए नहीं रखवा रहा कि वो बच्ची पढ़े। वो उसे इसलिए रखवा रहा है ताकि हरनाम कभी मुँह न खोले।"

"ये सच है?" मैंने पूछा।

"मुझे पक्का नहीं पता," रणवीर सिंह ने कहा। "पर सच होने से फ़र्क़ नहीं पड़ता। हरनाम को यकीन होना चाहिए कि ये सच है।"

मीरा ने धीरे से कहा, "और अगर ये सच नहीं हुआ, तो?"

रणवीर सिंह ने उसकी तरफ़ देखा, और उनकी आवाज़ में वो गरज लौटी जो अब भी उनके अंदर बची थी।

"तो हमने एक डरे हुए आदमी से झूठ बोला," उन्होंने कहा। "पर अगर उस झूठ से सच बाहर निकले, तो ये झूठ भी सही है।"

वो मेरी तरफ़ पलटे।

"वीर सिंह, कल सुबह तू हरनाम को कुएँ के पास ले जाना।"

"कुएँ के पास?"

"वहीं जहाँ वो रोता है," रणवीर सिंह ने कहा। "आदमी वहीं सच बोलता है जहाँ वो पहले टूट चुका है।"

वो कुर्सी से आगे झुके, और मुझे लगा जैसे कोई पुराना पहलवान मुझे दाँव बता रहा हो।

"और वीर, एक बात सुन।" उनकी आवाज़ धीमी हुई। "हरनाम के सामने मीरा का नाम मत लेना। उसे लगेगा कि हम उसे फँसा रहे हैं। तू बस ये कहना कि गोलू की जान ख़तरे में है, और वो तेरी बात मानेगा।"

"और अगर वो माने ही नहीं?"

"तो उसे कुएँ के अंदर झाँकने दे," रणवीर सिंह ने कहा, और उनका चेहरा कठोर हो गया। "जो आदमी कुएँ में गिरे हुए आदमी की आवाज़ सुन लेता है, वो दुनिया की कोई भी आवाज़ नहीं भूलता।"

मैं उठा। मीरा भी उठी।

"तू रुक," रणवीर सिंह ने मीरा से कहा। "मुझे तुझसे दो बातें करनी हैं।"

मीरा मेरी तरफ़ देखने लगी। मैंने कहा, "मैं गेट पर हूँ।"

दालान में आकर मैं सीढ़ी पर बैठ गया। रात ठंडी थी। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे। मेरी जेब में मीरा की दी हुई वो टूटी घड़ी थी, और मैंने उसे बाहर निकालकर हथेली पर रख लिया। घड़ी नहीं चल रही थी। पर मुझे लगा उसमें कुछ हलचल है, जैसे अंदर कोई बंदा साँस रोककर बैठा हो।

दस मिनट बाद मीरा बाहर आई। उसकी आँखें फिर लाल थीं, पर वो रो नहीं रही थी।

"क्या हुआ?" मैंने पूछा।

"पापा ने कहा कि वो मुझसे एक वादा लेंगे," वो बोली, और उसकी आवाज़ में कुछ भारीपन था। "कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं अकेले अखाड़े में नहीं जाऊँगी।"

"ये तो ठीक है।"

"और ये भी कहा कि जिस दिन सब सच खुलेगा, उस दिन मैं उन्हें उस कुर्सी से खड़ा करके ले जाऊँगी।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "अपने हाथों से।"

मैं कुछ नहीं बोला। मैंने सोचा — क्या आदमी इतना टूटकर भी इतना बड़ा वादा कर सकता है?

मीरा ने अपनी आँखें पोंछीं और फिर वो अंदर चली गई। मैं दालान से निकला। रास्ते में मुझे लगा कि आज रात की हवा में कुछ है जो मीरा के घर से आ रहा है — औषधि की गंध, पुराने काग़ज़ों की गंध, और उस घड़ी की गंध जो नहीं चल रही थी।

घर पहुँचा तो माँ जाग रही थीं। आँगन में बैठी थीं, और उनके हाथ में वो पुरानी चक्की थी, हालाँकि रात में चक्की नहीं चलती।

"क्या बात है?" मैंने पूछा, पास बैठकर।

"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "बस हाथ बेचैन थे।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा। सूखा, ठंडा, पर मज़बूत।

"माँ, कल सुबह हरनाम से मिलूँगा," मैंने कहा। "कुएँ के पास।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने मेरे हाथ पर अपना दूसरा हाथ रख दिया।

"कुएँ के पास आदमी सच बोलता है," वो बोलीं। "पर मेरी एक बात मान।"

"क्या?"

"हरनाम के सामने झुककर मत बोलना।" उन्होंने मेरे हाथ को हल्का दबाया। "जो आदमी घबराकर झुकता है, वो दूसरे आदमी को भी डरा देता है। तू सीधा खड़ा होकर बात करना।"

"और अगर वो न माने?"

"तो उसे कुएँ के अंदर झाँकने दे," माँ ने कहा, और मुझे चौंका दिया — जैसे उन्होंने रणवीर सिंह की बात सुनी हो। "रामदीन की आवाज़ सुनकर कोई झूठ नहीं बोल सकता।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके माथे पर हल्दी का टीका रात में भी चमक रहा था।

"तू सो जा," वो बोलीं। "कल लड़ाई है।"

सुबह मैं जल्दी उठा। पानी डाला, मुँह धोया। गुड़िया खीर लेकर आई — आज उसने खीर में काजू डाले थे, और मुझे पता था कि उसके काजू कहाँ से आए हैं।

"कहाँ जा रहे हो?" उसने पूछा।

"किसी से मिलने।"

"अकेले?"

"कालू काका साथ होंगे।"

वो अपनी कॉपी उठा लाई। "मैं भी चलूँगी।"

"नहीं।"

"भैया, तुमने वादा किया था—"

"गुड़िया।" मैंने उसका कंधा थामा। "आज जो होने वाला है, वो किसी को दिखाने वाला नहीं है। आज कोई लड़ाई नहीं है। आज एक आदमी से बात है।"

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