Spirit of a Fighter339 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 339

7 min read November 5, 2026

मैंने उसकी आँखों में देखा। आम तौर पर ऐसा सवाल आया तो मैं टाल देता। पर आज नहीं। शायद लैब की खालीपन में सच बोलना आसान था।

"मैंने सोचा," मैंने कहा, "अगर आज पकड़ा गया, तो मेरी माँ को कौन खाना देगा।"

मीरा कुछ देर मुझे देखती रही। उसकी पकड़ प्लेट पर ढीली पड़ गई।

"मेरे पापा को भी कोई खाना देने वाला नहीं है," उसने धीरे से कहा।

उसने आगे कुछ नहीं कहा। न मैंने। लैब में बस पंखे की धीमी आवाज़ थी, और बाहर किसी पक्षी की। उस चुप्पी में कुछ था जो शब्दों से बड़ा था। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मीरा के घर में भी कोई किसी का हाथ पकड़कर नहीं बैठा।

मीरा ने पलटकर प्लेट उठाई और उसे लैंप की रोशनी में ले गई। उसने बूँदों को घुमाया, झुककर देखा, फिर एक बार फिर।

उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"वीर," उसकी आवाज़ फटी।

मैं बेंच से उठ खड़ा हुआ।

"क्या हुआ?"

"इसमें सिर्फ़ ज़हर नहीं है," उसने काँपती आवाज़ में कहा। "इसमें वो चीज़ भी है जो मेरे पापा की दवा में है।"

वो मेरी तरफ़ पलटी, और उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने कभी नहीं देखा।

"यानी जो पापा को बचाने के लिए दवा देता है," उसने कहा, "उसी में मारने वाली चीज़ मिला रहा है।"

॥

मीरा ने प्लेट मेज़ पर रखी। उसके हाथ ऐसे काँप रहे थे कि प्लेट काँच पर खड़खड़ा गई। मैंने उसे पकड़ना चाहा, पर वो पीछे हट गई।

"धीरे," मैंने कहा। "साँस ले।"

"मैं ले रही हूँ।" उसकी आवाज़ निकली ही नहीं। वो कुर्सी खींचकर बैठी और अपनी दोनों हथेलियाँ मेज़ पर टिका दीं, जैसे किसी ने उसे बीच से दबा दिया हो।

"मीरा, तूने कहा कि दवा में भी वही चीज़ है। पक्का?"

"मैं पक्का नहीं कहूँगी," वो बोली, और उसकी आवाज़ में अब भी वो काँप बची थी। "पर जो चीज़ मुझे इस बोतल में दिख रही है — वो मेरे पापा की दवा में भी है। उसी की गंध, उसी का रंग। बस यहाँ ज़्यादा है, और वहाँ… बहुत कम।"

"कितनी कम?"

वो उठी, दीवार पर टँगा एक पुराना चार्ट देखने लगी, फिर पलटी।

"इतनी कम कि कोई जाँच करे तो कहेगा — ये तो दवा है, ज़हर नहीं।" उसने अपनी उँगली उठाई। "पर रोज़, बूँद-बूँद, महीनों तक — तो शरीर अंदर से खाली हो जाता है। पहले पैर। फिर कमर। फिर साँस।"

मेरे पेट में एक ठंडी गोली सी लुढ़क गई।

"तेरे पापा," मैंने धीरे से कहा। "सालों से।"

"सालों से," उसने दोहराया, और मुझे लगा वो खुद को ही सुना रही है। "और मैं रोज़ उनके हाथ में वो गिलास पकड़ाती रही। खुद। अपने हाथों से।"

वो फिर कुर्सी पर गिरी। इस बार उसने चेहरा अपनी हथेलियों में छुपा लिया।

"मैं डॉक्टर बनने पढ़ रही हूँ," उसकी आवाज़ हाथों के पीछे से आई, दबी हुई, टूटी। "आयुर्वेद में सालों से सिर खपा रही हूँ। जड़ी-बूटी पहचानती हूँ, मात्रा जानती हूँ, मिलावट पकड़ सकती हूँ — और मेरे ही घर में, मेरे ही पापा के गिलास में, हर रोज़ ज़हर जा रहा था। और मैं…"

वो रुकी। उसकी साँस अटकी।

"और मैं मूर्ख पढ़ाई करती रही।"

लैब में सन्नाटा था। पंखा घूम रहा था, पर मुझे उसकी आवाज़ नहीं सुनाई दे रही थी। मुझे बस मीरा की साँस सुनाई दे रही थी, जो बीच-बीच में टूट रही थी।

मैं उसके पास गया। कुर्सी के सहारे बैठ गया। कुछ कहना चाहा, पर शब्द मुँह में आकर मर गए। ऐसे मौके पर माँ हमेशा कहती है — "बोलने से बेहतर है बैठ जाना।" मैं बस बैठा रहा।

फिर मैंने धीरे से उसका कंधा थाम लिया।

वो सहमी, फिर ढीली पड़ गई। उसका कंधा मेरे हाथ के नीचे छोटा लगा। ऐसी लड़की जो पूरे अखाड़े से बहस कर ले, उसका कंधा इतना छोटा कैसे हो सकता है — ये बात मेरे दिमाग़ में आई और चली गई।

हम कितनी देर ऐसे बैठे, पता नहीं। फिर मीरा ने हाथ नीचे किए। उसकी आँखें लाल थीं, नाक लाल, पर उसने पोंछा नहीं, जैसे उसे फ़र्क़ ही न पड़ता हो।

"अब रोना नहीं," वो बोली। आवाज़ में वो धार लौट रही थी जो मैं जानता था। "अब सबूत।"

"कैसे?"

उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ जम गया। वो उठी, अपना बैग खोला, और उसमें से एक मोटी कॉपी निकाली।

"एक बोतल और एक जाँच काफ़ी नहीं है," उसने कहा। "वकील कहेगा — ये बोतल कहीं और से आई। भैरव कहेगा — मैं तो दवा देता हूँ, बच्ची को कुछ पता ही नहीं, ये लड़का तो मेरा दुश्मन है, इसने फँसाया है।"

"तो?"

"तो हमें उसकी अलमारी के काग़ज़ चाहिए।" उसने कॉपी की तरफ़ इशारा किया। "जिसमें हर मौत का हिसाब है। किसको कितना दिया, कब दिया, कितने पैसे आए। भैरव इतना शातिर है कि वो बीस साल बिना हिसाब रखे नहीं रह सकता। वो ज़रूर लिखता होगा।"

मैंने सिर हिलाया। "वो काग़ज़ हरनाम के पास हैं."

मीरा ने कॉपी बंद कर दी। उसका चेहरा अब साफ़ था, आँसुओं का निशान भी नहीं।

"तो हरनाम को तोड़ना होगा," उसने कहा।

"हरनाम?"

"वो डरा हुआ आदमी है," मीरा बोली। "जो मरने से डरता है वो पैसे के लिए नहीं, जान के लिए भैरव के साथ है। अगर हम उसे यकीन दिला दें कि भैरव उसे भी नहीं छोड़ेगा — तो वो बोल पड़ेगा।"

मैं कुछ देर सोचता रहा।

"वो रोता है," मैंने धीरे से कहा। "कुएँ के पास। टिंकू ने देखा।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, और उसके होठों पर एक पतली सी लकीर आई — मुस्कान नहीं, उससे कुछ पहले की चीज़।

"तो वो डर के मारे रोता है," वो बोली। "या शर्म के मारे। फ़र्क़ है दोनों में।"

वो अपनी कुर्सी खींचकर मेरे करीब आई।

"वीर, ये जो बोतल है — इसे मैं अपने पास रखूँगी। तेरे पास नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि अगर भैरव के आदमी तुझे पकड़ें, तो तेरे पास होने से हम पकड़े जाएँगे," उसने कहा। "और क्योंकि मैं लड़की हूँ — वो मेरी तलाशी लेने में ज़्यादा देर करेगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने ये बात ऐसे कही जैसे चाय में चीनी माँग रही हो।

"तू ये इतनी आसानी से कैसे कह देती है?"

"क्या?"

"कि वो तेरी तलाशी लेगा।"

वो एक पल चुप रही। फिर बोली, "मैंने सोच लिया है। सोचने में डर ज़्यादा लगता है, बोलने में कम।"

फिर उसने बोतल को अपने रूमाल में लपेटा, उसे बैग के सबसे नीचे रखा, ऊपर किताबें डालीं, और बैग का मुँह खींच दिया।

"अब सुन," वो बोली। "कल सुबह हरनाम जहाँ मिले वहाँ नहीं जाना। उसे ऐसी जगह बुलाना है जहाँ वो अपने को अकेला समझे, पर अकेला न हो।"

"कहाँ?"

वो सोचने लगी — माथे पर एक लकीर पड़ी, जो उसके माथे पर अब पक्की हो गई थी, जैसे घर की दीवार पर कोई निशान।

"मेरे पापा से मिल," उसने कहा। "अभी। आज रात।"

मैं चौंका।

"तेरे पापा से? वो… वो मुझसे बात करेंगे?"

"वो तुझसे नहीं, उस आदमी से बात करेंगे जो उन्हें बचा सकता है," उसने कहा, और फिर आवाज़ नरम करके जोड़ा। "और शायद थोड़ी देर के लिए उस लड़के से भी, जो उनकी बेटी के साथ खड़ा था उस दिन।"

मेरे पेट में एक झटका लगा। ये बात उसने मुझे ताने में नहीं कही थी। मुझे लगा वो मुझे कुछ दे रही है।

"तेरे पापा के घर? इतनी रात?"

"अब जो होगा, सब रात में ही होगा," उसने कहा, और बैग कंधे पर टाँग लिया। "चल।"

मीरा का घर पहले मुझे बड़ा लगता था। आज रात वो भी छोटा लगा, जैसे अंदर से खाली हो गया हो। गेट पर चपरासी नहीं था। दालान में बस एक बल्ब जल रहा था, और उसी पीली रोशनी में रणवीर सिंह की कुर्सी दिख रही थी।

वो जाग रहे थे। कमरे में एक पुरानी घड़ी की टिक-टिक गूँज रही थी, और मुझे लगा जाने कितने साल से ये घड़ी इसी कमरे में टिक-टिक करती आ रही है, जबकि बाहर वाली टूटी पड़ी है।

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