Spirit of a Fighter341 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 341

7 min read November 5, 2026

"तो मैं फिर भी चलूँगी," वो बोली, ठुड्डी ऊपर करके। "क्योंकि तुम अकेले झूठ बोल लेते हो, भैया।"

मुझे हँसी आई — पहली बार दो दिन में। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।

"तेरे आगे कोई नहीं जीत सकता," मैंने कहा। "पर आज तू घर पर रह। माँ अकेली हैं।"

वो कुछ सोचने लगी, फिर बोली, "माँ अकेली नहीं हैं। मैं हूँ ना।" और अपनी कॉपी लेकर अंदर चली गई।

कालू काका नीम के पेड़ के नीचे मिले। उनके हाथ में लालटेन थी, हालाँकि सुबह हो गई थी।

"लालटेन?" मैंने पूछा।

"कुएँ में रोशनी चाहिए," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ वैसी ही धीमी थी, जैसे पुरानी किताब का पन्ना पलट रहे हों। "हरनाम को नीचे झाँकने देना है ना?"

मैंने सिर हिलाया। हम चले। रास्ते में कालू काका एक बार रुके और मेरी तरफ़ देखा।

"वीर," वो बोले। "जब हरनाम टूटे, तो उसे डाँटना मत।"

"क्यों?"

"क्योंकि वो अपने बेटे के लिए टूटा था," कालू काका ने कहा। "और आज वो अपने बेटे के लिए ही टूटेगा भी।"

कुएँ के पास हरनाम पहले से खड़ा था। उसके हाथ में वो हरी कवर वाली कॉपी नहीं थी — आज उसके हाथ खाली थे, और मुझे लगा उसके खाली हाथ उसकी कॉपी से ज़्यादा डरावने लग रहे हैं।

"तू बुलाया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ सूखी थी।

"हाँ।"

"क्या बात है?"

"गोलू।"

हरनाम का चेहरा एक पल में बदल गया। उसने आगे कदम बढ़ाया, फिर रुक गया, जैसे उसके पैरों ने दिमाग़ से पहले सोच लिया हो।

"गोलू का क्या?" उसकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें एक काँप था।

"वो शहर में है," मैंने कहा। "तेरे नाम वाले घर में। भैरव ने रखवाई है।"

"मुझे पता है।"

"ये भी पता है कि क्यों रखवाई है?"

हरनाम कुछ नहीं बोला। उसने अपनी गर्दन एक तरफ़ घुमाई, जैसे कोई तार खिंच रहा हो।

"वो मेरी बेटी है," उसने कहा। "पढ़ने गई है। भैरव ने इलाज किया, पैसे दिए।"

"भैरव ने इलाज इसलिए किया," मैंने कहा, "ताकि तू उसकी कॉपी में वही लिखता रहे जो वो बोले।"

"तू झूठ बोल रहा है।"

"मैं झूठ नहीं बोलता," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मुझे अजीब लगी — ठंडी, साफ़। "मैं गंध से पहचानता हूँ। और मैंने तेरी गंध में डर पहचाना है, हरनाम। तू डरता है कि भैरव गोलू तक पहुँच जाएगा। और सच यह है — भैरव उस तक पहुँच ही नहीं रहा, वो पहुँच चुका है।"

हरनाम का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"झूठ," उसने फुसफुसाया।

"तो चल, कुएँ के पास," मैंने कहा, और मैंने कुएँ की तरफ़ इशारा किया। "वहाँ एक आदमी है जो बीस साल से भैरव की वजह से बंद है। वो तुझे बताएगा कि भैरव क्या करता है उन लोगों के साथ जो उसके काम के बाद भी खड़े रहते हैं।"

"मैं नहीं—"

"डरता है?" मैंने कहा। "मैं जानता हूँ। पर आज तेरी बेटी की बात है। एक बार झाँक ले।"

हरनाम की साँस फूलने लगी। वो कुएँ की तरफ़ बढ़ा। कालू काका ने लालटेन जलाई, और फिर उसने पत्थर सरकाया। ढक्कन खुलते ही वो गंध फिर उठी — गीली मिट्टी, जंग, और कुछ और भी।

हरनाम नीचे झुका। उसने झाँका।

"हरनाम," नीचे से आवाज़ आई। धीमी, थकी, पर साफ़। "हरनाम, मैं तुझे पहचानता हूँ। तू वही है जो अखाड़े का हिसाब रखता था। जो हर मौत को बीमारी लिखता था।"

हरनाम पीछे हटा। उसका हाथ लालटेन पर लगा और लालटेन डगमगाई। कालू काका ने उसे थाम लिया।

"वो… वो रामदीन है?" हरनाम की आवाज़ टूट रही थी। "रामदीन ज़िंदा है?"

"बीस साल से," मैंने कहा। "नीचे। तेरी कॉपी की तरह बंद।"

हरनाम घुटनों पर बैठ गया। उसने अपना सिर पकड़ लिया।

"हरनाम," रामदीन की आवाज़ फिर आई। "तूने कभी सोचा कि तेरे हाथ से लिखी हर रिपोर्ट में एक आदमी मरा है? तेरा बेटा बचा, हरनाम। पर उन ग्यारह के बेटे नहीं बचे।"

"बस कर," हरनाम फुसफुसाया। "बस कर।"

मैं उसके पास बैठ गया।

"तू सच बोलेगा," मैंने कहा। "नहीं तो भैरव जो चाहेगा, तेरे हाथ से लिखवाता रहेगा। और एक दिन गोलू के नाम भी कुछ लिखवा देगा। और तू रोते हुए उसे भी बीमारी कह देगा।"

हरनाम ने अपना चेहरा हाथों से निकाला। उसकी आँखों में पानी था, और उसकी उँगलियों में मिट्टी।

"क्या करना है?" उसने कहा।

"तेरी कॉपी," मैंने कहा। "हरी कवर वाली। जिसमें बीस साल का हिसाब है।"

"वो मेरे पास नहीं है।"

"क्या मतलब?"

"मैंने उसे छुपा दिया है," हरनाम ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ठोस आया। "भैरव ने मुझे दो दिन पहले बुलाया था। कहा था — 'हरनाम, अब तेरी कॉपी मेरे पास रख।' मैंने मना नहीं किया। पर अलमारी से निकालकर मैंने उसे नहीं दिया।"

"तो कहाँ है?"

"मेरी बहन के घर," उसने कहा। "गाँव के बाहर, नहर के पार। उसके पास रखी है।"

मीरा की बात याद आई। मीरा ने कहा था — "हरनाम को तोड़ना होगा।" और हरनाम टूट गया था। पर ये टूटना ऐसा नहीं था जैसा मैंने सोचा था। इस टूटन में एक आदमी खड़ा हो रहा था।

"तू मेरे साथ चलेगा?" मैंने पूछा।

हरनाम ने एक बार कुएँ की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।

"एक बात पूछूँ?" उसने कहा।

"पूछ।"

"तूने मुझे आज सच बोलने क्यों कहा? तू जानता है मैं भैरव का आदमी हूँ। तू जानता है मैंने तेरे खिलाफ़ भी काग़ज़ भरे हैं।"

मैंने उसकी आँखों में देखा।

"क्योंकि तेरा बेटा बच गया था," मैंने कहा। "और आज तेरी बेटी को भी कोई बचाना चाहिए।"

हरनाम ने लंबी साँस ली। फिर वो उठा, अपनी धोती झाड़ी, और बोला, "चल।"

हम तीनों — मैं, कालू काका और हरनाम — नहर के पार चले। हरनाम की बहन का घर बड़ा था, पक्का, और सामने आम का पेड़ था। हरनाम ने दरवाज़ा खटखटाया। उसकी बहन आई — मोटी, फूली हुई, और उसकी आँखों में वही डर था जो हरनाम की आँखों में सुबह था।

"भैया?"

"कॉपी ला," हरनाम ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब कोई काँप नहीं थी। "जो मैंने तुझे दी थी।"

बहन कुछ देर उसे देखती रही। फिर अंदर गई और एक पुरानी पीली कॉपी लेकर आई। उसे हरनाम के हाथ में दिया।

हरनाम ने कॉपी मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

"ले," उसने कहा। "जो करना है कर। पर एक बात कहूँ।"

"कह।"

"इसमें जो लिखा है," उसने कहा, "वो सिर्फ़ भैरव का नहीं है। उन काग़ज़ों में मेरे हाथ भी हैं। मैंने लिखा। मैंने मौतों को बीमारी बनाया। और मैं जानता हूँ कि मेरा क्या होगा।"

मैंने कॉपी ली। वो भारी थी, और उसका भार काग़ज़ का नहीं था।

"मैं तुझे बचाऊँगा नहीं," मैंने कहा। "तूने जो किया, वो तूने किया। पर अगर तू गवाही दे, तो तेरा बेटा नहीं जलेगा।"

हरनाम ने आँखें बंद कर लीं। जब खोलीं, तो उनमें वो आदमी नहीं था जो सुबह मिला था।

"मैं गवाही दूँगा," उसने कहा। "सबके सामने। पंचायत में।"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा और उनके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो मैंने पहली बार देखी — जैसे दूर की किताब का कोई पन्ना अचानक सामने खुल गया हो।

हम लौट रहे थे, और मेरे हाथ में कॉपी थी। मैंने सोचा — ये कॉपी भैरव का पूरा जाल है। और मुझे ये सीधे मीरा के हाथ में देनी है।

पर जब मैं नहर के मोड़ पर पहुँचा, तो वहाँ टिंकू खड़ा था — हाँफता हुआ, बिना टोपी का, और उसके हाथ में मिठाई का एक आधा खाया हुआ लड्डू था।

"भाई!" वो दौड़कर आया। "भाई, अखाड़े में… अखाड़े में भैरव ने सबको बुलाया है। पूरे गाँव को। पंचायत बैठी है, और वो…"

"वो क्या?"

टिंकू ने एक साँस ली।

"वो क्या?" मैंने फिर पूछा।

टिंकू ने लड्डू मेरे हाथ में थमा दिया, जैसे अब उसके पास पकड़ने की ताकत नहीं बची।

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