Spirit of a Fighter – Chapter 317
मैं चौंका। मेरे मुँह से कुछ नहीं निकला।
"तू समझता है मैं सिर्फ़ घर का काम करती हूँ?" माँ ने आटे से हाथ झाड़े। "भैरव की रसोई में जो बर्तन धोएगा, वो भैरव की बातें भी सुनेगा। जो चूल्हे पर रोटी सेकता है, वो उस आदमी के मुँह से निकली हर बात सुनता है, जो उसे खाने के लिए बुलाता है।"
गुड़िया ने गोलू का सिर सहलाते हुए ऊपर देखा।
"दादी, तो तुम जासूस बनोगी?"
माँ हँसीं। पूरे दिन में पहली बार। वो हँसी आँगन में फैल गई, जैसे सूखी मिट्टी पर पहली बारिश पड़ी हो।
"तेरा काम पढ़ाई है," माँ ने गुड़िया की चोटी खींची। "जासूसी मैं करूँगी। उम्र भी है, तजुर्बा भी। और एक बात — जासूसी वो करता है जिसे कोई नहीं देखता। मुझे कौन देखता है? बूढ़ी औरत, चूल्हे के पास बैठी। कोई नहीं पूछता।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का। डर से नहीं। किसी और चीज़ से।
"माँ, वहाँ भैरव के आदमी हैं। कोई भी कुछ भी कर सकता है।"
"और यहाँ क्या है?" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "यहाँ भी तो वही आदमी हैं। रात को गुड़िया की कॉपी फाड़ने वाले। दीवार पर कोयले से लिखने वाले। तू सोचता है, तेरी माँ को बाहर ही कोई नहीं छू सकता?"
मैं चुप हो गया।
माँ उठीं। उन्होंने गोलू के सिर पर हाथ रखा। गोलू की आँखें खुलीं, वो घबराकर उठ बैठी, फिर माँ का हाथ देखकर फिर से लेट गई। माँ ने उसके माथे पर हल्का-सा थपथपाया।
"इसकी हिम्मत देखो," माँ ने कहा। "इतनी छोटी, और पीली दीवारों वाले घर से भागकर यहाँ आ गई। इसकी माँ कहाँ है?"
"इसका बाप लुट्टन है," मैंने कहा। "भैरव का आदमी। भैरव ने इसे बंधक रखा था।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें सिकुड़ीं।
"लुट्टन?" उनकी आवाज़ बदली। "वो जो कल अखाड़े में तेरे पैरों पर गिरा था?"
"हाँ।"
"तो एक बात सुन।" माँ फिर बैठ गईं। "जब मैं भैरव की रसोई में जाऊँगी, तो सबसे पहले उसी लुट्टन के बारे में पूछूँगी। जो आदमी अपनी बेटी को बंधक रखे, वो अपने बाकी आदमियों से कैसे पेश आता है — ये जानने की चीज़ है।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। आज माँ कुछ और लग रही थीं। जैसे आटा गूंधते-गूंधते उनके अंदर कोई और औरत जाग गई हो।
"माँ, तू मत जा। मैं कुछ सोचूँगा।"
"कुछ सोचने का वक़्त नहीं है, बेटा।" माँ ने आटे की लोई उठाई। "भैरव ने खुद हमें रास्ता दिया है। ऐसा रास्ता कोई क्यों देता है? क्योंकि वो सोचता है कि ये उसका रास्ता है, हमारा नहीं। हमें उसकी सोच बदलनी है।"
टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में गठरी। वो कुछ बोलना चाहता था, पर माँ ने उसे देखा और वो चुप हो गया।
"टिंकू, तू अंदर आ।" माँ ने उसे बुलाया। "तेरी भी एक बात सुननी है।"
टिंकू ने आँगन में कदम रखा। उसकी चप्पल का तसला मिट्टी से भरा था।
"तेरी मिठाई की दुकान कहाँ है?"
"वो तो, काकी…" टिंकू ने सिर खुजाया। "नहर के पास, टिन के शेड में।"
"वो शेड अखाड़े की दीवार से कितनी दूर है?"
टिंकू ने सोचा। "पचास कदम होंगे। शायद कम।"
"तो कल से तू उसी शेड में रात भी रुकेगा।" माँ ने लोई को तवे पर रखा। "अखाड़े के पीछे वाली दीवार से सटा हुआ तेरा शेड है। अगर रात में कोई उधर से आए-जाए, तो तू देख सकेगा।"
टिंकू का मुँह खुला रह गया। "काकी, मैं… मैं तो रात में डरता—"
"डर लगे तो मेरी बात सुन।" माँ ने तवे से रोटी पलटी। "डर उसी को लगता है जो अकेला हो। तू अकेला नहीं है। रात को अगर कुछ दिखे, तो सीटी मार दे। मैं रसोई में होऊँगी, और मेरी खिड़की से तेरी दुकान दिखती है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कंधे उठाए।
"माँ की बात मान ले," मैंने कहा। "वरना वो तुझे भी चक्की पर बैठा देगी।"
टिंकू हँसा। पहली बार आज उसके चेहरे पर कुछ वापस आया।
माँ ने रोटी तवे से उतारी और मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"अब सुन मेरी शर्त।" उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "मैं जाऊँगी। पर तुझे एक वादा देना पड़ेगा।"
"क्या?"
"तू कभी अकेले भैरव के सामने नहीं जाएगा।" माँ ने रोटी मेरे हाथ में रखी। "न अखाड़े में, न कुएँ पर, न कहीं भी। जब भी उसका सामना हो, तेरे पीछे कोई होगा — टिंकू, या मैं, या गुड़िया। अकेले तू उसके सामने नहीं खड़ा होगा।"
मैंने रोटी को हाथ में पकड़ा। वो गरम थी।
"माँ, आदमी को अपनी लड़ाई अकेले लड़नी चाहिए। पापा भी—"
"तेरे पापा ने भी अकेले लड़कर क्या पाया?" माँ की आवाज़ कड़ी हो गई। "एक ज़हर की शीशी, और एक कुर्सी जिस पर बैठकर वो बीस साल तड़पे। अकेले लड़ने का नतीजा यही होता है। तू अकेला नहीं लड़ेगा। ये मेरी शर्त है।"
मैंने उनकी आँखों में देखा। वो अपनी बात से पीछे हटने वाली औरत नहीं थीं।
"ठीक है," मैंने कहा। "मैं वादा करता हूँ।"
माँ ने सिर हिलाया। फिर मुड़कर चूल्हे की तरफ़ देखा।
"अब तू बता — उस काग़ज़ पर क्या लिखा है?"
मैंने काग़ज़ माँ को दिया। उन्होंने पढ़ा। उनके होंठ धीरे-धीरे हिले।
"माधव," उन्होंने कहा। जैसे नाम को मुँह में रखकर तौल रही हों। "ये नाम मैंने पहले भी सुना है। बहुत पहले।"
"कब?"
माँ ने काग़ज़ मुझे लौटाया। उनकी नज़र चूल्हे की आग पर थी।
"तेरे पापा की धोती जब भैरव ने वापस दी थी, उस दिन मैंने उसे धोया।" माँ की आवाज़ धीमी थी। "धोते वक़्त जेब में एक काग़ज़ मिला था। उस पर यही नाम लिखा था। माधव। और नीचे एक लाइन।"
"क्या लिखा था?"
माँ का हाथ चूल्हे की आग के पास गया, फिर रुक गया।
"लिखा था — 'जो मिट्टी में नहीं बैठता, वो मिट्टी का मालिक नहीं होता।'"
मैंने साँस रोक ली।
"वो काग़ज़ कहाँ है?"
"मैंने जला दिया था।" माँ ने आँखें नीची कीं। "उस वक़्त मुझे डर लगा था। सोचा, अगर भैरव ने देख लिया, तो गुड़िया को भी नहीं छोड़ेगा। पर अब…" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, "अब पछतावा होता है। वो काग़ज़ आज काम आता।"
"कोई बात नहीं," मैंने कहा। "अब हमारे पास ये है।"
मैंने काग़ज़ को तह करके जेब में रखा। फिर गोलू की तरफ़ देखा। वो अब करवट लेकर सो रही थी, गुड़िया की गोद में सिर रखकर।
"माँ, इस बच्ची का क्या करें?"
माँ ने गोलू को देखा। उनकी आँखें नरम पड़ गईं।
"जब तक इसका बाप नहीं आता, ये हमारी है।" उन्होंने रोटी तवे पर रखी। "पर एक बात — इसका बाप इसे लेने आए, तो पहले मेरी नज़र में आएगा। मैं उससे पूछूँगी कि अपनी बेटी को बंधक रखने की नौबत कैसे आई।"
"वो भैरव के डर से," मैंने कहा।
"डर बहाना है।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "अगर आदमी अपनी बेटी को बचाने के लिए कुछ नहीं करता, तो वो डर नहीं रहा — वो आदत बन गई। मैं उस आदमी से बोलूँगी।"
मैं माँ के पास बैठा रहा। चूल्हे की आग धीमी हो रही थी। दूर कहीं कुत्ता भौंका, फिर चुप हो गया।
तभी गुड़िया ने अपना सिर उठाया।
"भैया," उसकी आवाज़ धीमी थी, जैसे वो कोई राज़ बता रही हो। "आज दोपहर सुक्खी बुआ हमारे घर आई थी।"
"तो?"
"वो माँ से कह रही थी…" गुड़िया ने माँ की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "कह रही थी कि अखाड़े के नीचे कोई खज़ाना है।"
मैं ठिठक गया।
"खज़ाना?"
"हाँ।" गुड़िया ने आवाज़ और धीमी की। "बुआ कह रही थी — 'बहन, मुझे तो सुना है कि रातों को वहाँ से एक खुशबू आती है। मीठी-मीठी। ऐसी खुशबू जो पैसों की होती है। भैरव उसी खुशबू के पीछे पागल है। चार दिन से रात को अखाड़े में रोशनी दिखती है।'"
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno