Spirit of a Fighter318 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 318

7 min read November 5, 2026

माँ का चेहरा पत्थर जैसा हो गया था। उनके हाथ चूल्हे के पास थे, और उनकी उँगलियों में एक लोई दबी हुई थी।

"माँ?"

माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

"माँ, तूने सुना?"

माँ ने धीरे से लोई चूल्हे में डाल दी। आग ने उसे लपक लिया। जलती लोई की गंध आँगन में फैल गई — जली हुई रोटी की कड़वी गंध।

"माँ!"

"मैंने सुना।" माँ की आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने उनके गले में रेत भर दी हो। "और तू जानता है, उस दिन मैंने क्या किया? मैंने चूल्हे में आटा जला दिया था। गुड़िया, तू उस दिन बाहर खेलने गई थी। तेरे भैया टिंकू के साथ थे। और मैं अकेली बैठी थी, और सुक्खी के जाने के बाद मेरे हाथ काँप रहे थे। आटा गूंधते-गूंधते मेरी उँगलियों से गिर गया और चूल्हे में जा पड़ा।"

मैंने माँ के हाथ देखे। उनकी उँगलियों पर आटा सूख रहा था।

"माँ, तू क्यों डर गई? खज़ाना तो अच्छी बात है—"

"खज़ाना नहीं, बेटा।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर था जो बीस साल से दबा हुआ था। "खुशबू। सुक्खी ने 'खुशबू' कहा। और मुझे वो खुशबू पता है।"

"कौन-सी खुशबू?"

माँ ने धीरे से कहा, "तेरे पापा की धोती से आती थी। उस दिन, जब भैरव ने वो धोती वापस दी थी। मैंने सोचा था, पसीने की बू होगी। पर वो खुशबू पसीने की नहीं थी। वो कुछ और थी। जैसे मिट्टी को किसी ने उबाला हो। और उसमें कुछ मीठा घोला हो।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

"माँ, वो तहखाने की मिट्टी है। जो भैरव उबाल रहा था।"

"तो वो खज़ाना नहीं है," माँ ने कहा। "वो मिट्टी है। और भैरव उसे बेचने की तैयारी कर रहा है।"

मैं खड़ा हो गया। मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था।

"अगर भैरव तहखाने की मिट्टी उबाल-उबालकर बोतलों में भर रहा है, तो वो ज़हर नहीं बना रहा। वो कुछ और बना रहा है।"

"क्या?" टिंकू ने पूछा।

"ऐसी ताकत," मैंने कहा, "जो उसे बिना पहलवान बनाए पहलवानों का मालिक बना दे।"

माँ ने अपने हाथ पोंछे। उनकी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी।

"तो जल्दी कर।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "कल मैं उसकी रसोई में जाऊँगी। और मैं उस रसोई से बाहर नहीं आऊँगी, जब तक ये नहीं जान लेती कि वो उस मिट्टी का क्या करता है।"

"माँ—"

"और तू एक काम कर।" उन्होंने मेरी बात काटी। "उस सुक्खी को ढूँढ। वो जो भी बोलती है, आधा झूठ होता है, पर आधा सच होता है। उससे पूछ — वो खुशबू उसने खुद सूँघी है, या किसी और ने बताई।"

"क्यों?"

"क्योंकि अगर उसने खुद सूँघी है, तो वो अखाड़े के पीछे से गुज़री है। और अगर किसी ने बताई है, तो कोई उसे जान-बूझकर भेज रहा है। दोनों बातें अलग हैं।"

मैंने माँ को देखा। आज वो औरत कुछ और थी। वही हाथ जो चक्की चलाते थे, वही आँखें जो हल्दी का टीका लगाती थीं — पर आज उनमें कुछ और था।

"माँ, तू ऐसे बोल रही है जैसे तू ये सब पहले भी कर चुकी हो।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। एक पल के लिए उनकी आँखों में कुछ ऐसा दिखा जो उन्होंने कभी नहीं दिखाया था।

"तेरे पापा के साथ रहते हुए," उन्होंने धीरे से कहा, "मैंने बहुत कुछ किया था, बेटा। बहुत कुछ। पहले उनकी लड़ाई के लिए, फिर उनकी मौत के बाद सच के लिए। पर उस वक़्त मेरे पास कोई नहीं था।"

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।

"अब तू है। और टिंकू है। और वो लड़की है — मीरा। जिसने तेरे लिए औषधि के पत्ते तोड़े।"

मैंने सिर हिलाया।

"अब सो जा," माँ ने कहा। "कल बड़ा दिन है। मेरी रसोई में पहला दिन।"

रात के तीसरे पहर में मैं उठा। बाहर आँगन में चाँदनी थी, और गोलू चारपाई पर करवट बदल रही थी। मैंने उसे देखा — उसकी उँगलियाँ अब भी कसी हुई थीं, जैसे सोते में भी किसी का हाथ पकड़े हो।

मैं बाहर निकला। टिंकू का शेड दूर नहीं था। मैंने सोचा, चलकर देखूँ कि वो पहुँचा या नहीं।

रास्ते में एक परछाईं हिली।

मैं रुका। मेरी नाक ने हवा पकड़ी। पसीना। टिंकू का पसीना। और उसमें मिली हुई गंध — हल्दी, घी, और… डर।

"टिंकू?"

वो पेड़ के पीछे से निकला। उसके हाथ में लाठी थी।

"भाई, मैं… मैं शेड के पास जा रहा था।"

"तू काँप रहा है।"

"नहीं, मैं तो…" उसने लाठी दोनों हाथों से पकड़ी। "मैं ठीक हूँ।"

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"सुन, अगर डर लगे तो—"

"नहीं।" टिंकू ने सिर हिलाया। "भाई, तू जानता है, आज दिन में जब मैं गोलू को बैलगाड़ी से ला रहा था, तो रास्ते में एक आदमी मिला। मैंने उसे नहीं देखा, पर उसने मुझे देखा। मैंने उसकी गंध पकड़ी, भाई। बहुत तेज़ गंध। जैसे कोई नया-नया नहाया हो। और वो गंध मुझे तब भी आई थी — उस रात, जब भैरव ने माँ को ज़हर दिया था।"

मेरा दिल ठहर गया।

"तूने और कुछ देखा? चेहरा? कपड़े?"

"बस एक झलक।" टिंकू की आवाज़ फुसफुसाहट बन गई। "उसके हाथ में एक डिब्बी थी। छोटी-सी। पीली। और वो चलते-चलते बोल रहा था — 'अब तो खेल शुरू होगा।'"

"किससे?"

"पता नहीं। पर भाई, वो आदमी बूढ़ा लग रहा था। बहुत बूढ़ा। और उसकी चाल…" टिंकू ने गला साफ़ किया, "उसकी चाल में कुछ अजीब था। जैसे उसे चलने में दर्द होता हो, पर वो दिखाना नहीं चाहता।"

मैंने आसमान की तरफ़ देखा। रात गहरी हो रही थी।

"तू शेड जा," मैंने कहा। "अंदर से कुंडी लगा। और हाँ, अगर कोई दिखे, तो लड़ना मत। बस सीटी मार। माँ रसोई में होगी।"

टिंकू ने सिर हिलाया और मुड़ गया। कुछ कदम चलकर वो रुका।

"भाई, एक बात और।"

"क्या?"

"वो आदमी जब चल रहा था, तो उसके पैरों के नीचे से आवाज़ नहीं आ रही थी। ज़मीन पर उसके कदमों की आहट नहीं थी। जैसे वो हवा में चल रहा हो।"

वो चला गया।

मैं आँगन में खड़ा रहा। मेरी नाक हवा में तैर रही थी, पर कुछ नहीं मिला। बस रात की ठंडी गंध, और दूर कहीं से आती हुई चूल्हे की राख की बू।

सुबह होते ही माँ ने अपनी पुरानी साड़ी निकाली। वो साड़ी जो उन्होंने पापा की मौत के बाद पहली बार पहनी थी — पीली, फीकी पड़ी, किनारों पर धागे निकले हुए।

"माँ, इसे क्यों?"

"क्योंकि भैरव को लगना चाहिए," माँ ने साड़ी को ठीक किया, "कि मैं डरकर आई हूँ। एक बूढ़ी औरत, जिसके पास पहनने को कुछ और नहीं।"

उन्होंने बालों में कंघी की। आँगन में गोलू ने आँखें खोलीं और माँ को देखकर चुपचाप बैठ गई।

"तू यहाँ रुक," माँ ने उसे कहा। "गुड़िया तुझे खाना देगी। और जब तेरे बाबा आएँ, तो उनसे कहना — सरस्वती तुझसे मिलना चाहती है।"

गोलू ने सिर हिलाया। उसकी आँखें अब भी डरी हुई थीं, पर उनमें कुछ और भी था — भरोसा।

माँ बाहर निकलीं। गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी थी। माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

"पढ़ाई करना। और गोलू का ध्यान रखना।"

"दादी, तुम रोज़ जाओगी?"

"रोज़।" माँ ने कहा। "जब तक काम खत्म नहीं होता।"

मैं माँ के साथ चला। अखाड़े का फाटक खुला था। बाहर लुट्टन खड़ा था, हाथ में एक थाली लिए — उसमें एक गिलास पानी था।

माँ ने गिलास की तरफ़ देखा। फिर लुट्टन की तरफ़।

"ये क्या है?"

"सर का हुक्म है," लुट्टन ने धीरे से कहा। "जो भी अखाड़े में काम करने आए, पहले ये पानी पीता है।"

माँ ने गिलास उठाया। मेरी साँस रुक गई।

"माँ—"

माँ ने गिलास को सूँघा। फिर उन्होंने उसे लुट्टन के हाथ में वापस रख दिया।

"मैं बूढ़ी हूँ, लुट्टन।" उन्होंने कहा। "बूढ़े लोगों को ठंडा पानी नहीं सुहाता। मुझे रसोई में गरम पानी मिल जाएगा।"

लुट्टन ने गिलास पकड़े हुए माँ की तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर कुछ नहीं बोला।

माँ अंदर चली गईं।

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