Spirit of a Fighter – Chapter 303
"मैं…" उसका गला रुँध गया। "मैंने तो बस… सर ने कहा था ताकत बढ़ेगी। मैं सोचा… मैं तो बस…"
और तभी पीछे से आवाज़ आई।
"लुट्टन!"
वो आवाज़ नहीं थी। वो गरज थी। और वो गरज मैंने कभी नहीं सुनी थी। क्योंकि भैरव जेल में था। भैरव इस वक़्त यहाँ नहीं हो सकता था।
पर जो भी था, उसकी आवाज़ में वही गुड़ जैसी मिठास थी और वही कुएँ जैसी ठंडक।
"लुट्टन! बोतल वापस कर।"
लुट्टन का हाथ हवा में ठिठक गया। बोतल हवा में लटकी रही। उसका चेहरा ऐसा हुआ जैसे किसी कुत्ते ने उसकी टाँग पर पेशाब कर दी हो। शर्म और डर एक साथ।
"सर…" वो फुसफुसाया।
"मैं जानता हूँ तू मेरा नमक खाता है," आवाज़ आई। "और मेरा नमक कभी मुफ़्त नहीं होता।"
वो आगे आया। अखाड़े के फाटक के पास, लालटेन की रोशनी से बाहर, एक लंबी परछाईं। और वो परछाईं धीरे-धीरे सामने आई। धोती। मोटा शरीर। बड़ी मूँछें। पर चेहरा — मैंने पहले कभी नहीं देखा। कम से कम इस गाँव में नहीं।
"तू कौन है?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ मज़बूत रखी, पर अंदर से मैं काँप रहा था।
"लुट्टन, बोतल।"
लुट्टन ने बोतल आगे बढ़ा दी। हाथ काँपता रहा। उस आदमी ने बोतल ली, ढक्कन लगाया, और अपनी धोती में खोंस ली। फिर उसने मेरी तरफ देखा।
"मैं वही हूँ," वो बोला, "जिसे तू नाम से नहीं जानता। पर मैं तुझे नाम से जानता हूँ, वीर सिंह। बहुत अच्छे से।"
"मैं तुझे नहीं जानता।"
"ना जान। अभी। पर तेरे पापा ने मुझे पहचाना था। रघुवीर ने। और तेरे दूसरे पापा ने भी — जगदीश ने।"
मेरे पेट में ठंडी सुई चुभी। "तू झूठ बोल रहा है।"
"मैं झूठ नहीं बोलता। मैं हिसाब रखता हूँ। बीस साल से हर नाम का, हर साल का।" उसने अपनी जेब से एक छोटी कॉपी निकाली। मोटी। जर्जर। हरी कवर। "ये देख?"
मेरी नज़र कॉपी पर गई। वो हरी कवर वाली कॉपी थी। जिसे भैरव ने जला दिया था। जिसका सिर्फ़ एक पन्ना बचा था। जो मीरा के पास था।
"ये…" मेरा गला सूख गया। "ये तो जल गई थी।"
"ये जली नहीं थी। ये मेरी थी। भैरव को तो मैंने इसकी नक़ल दी थी।" उसने कॉपी खोली। पन्ने पलटे। "ये बीस साल का हिसाब है। हर पहलवान जो मरा, कब मरा, कैसे मरा, कौन बोला जाएगा, कौन चुप रहेगा। सब।"
लुट्टन ज़मीन पर बैठ गया था। उसके घुटने टूट गए थे। वो अपना सिर पकड़कर बैठा था, और उसके कंधे हिल रहे थे।
"तूने लुट्टन को भी…" मैंने कहा। "तूने उसे भी पिलाया।"
"मैंने सबको पिलाया," वो बोला। "ये मेरा काम है। ताकत देना। और ताकत लेना। जो लेता है, वो मेरा।"
"तू क्यों करता है ये?"
"क्यों?" उसने कॉपी बंद की। मुस्कुराया। वो मुस्कान मीठी थी, पर आँखें नहीं हिलीं। "क्योंकि मिट्टी पर हक जताने वाले बहुत हैं। और मिट्टी असल में किसी की नहीं होती। जो इसे अपना कहता है, वो भूल जाता है कि एक दिन कोई और आएगा और उसका नाम भी मिट्टी में मिला देगा। मैं बस वो दिन पहले ला रहा हूँ।"
"तू पागल है।"
"ना, बेटा। मैं व्यापारी हूँ। और तेरे जैसे पहलवान — तुम हो मेरा माल। तुम गिरोगे, तो मैं उठाऊँगा। तुम उठोगे, तो मैं बेचूँगा।"
उसने कदम बढ़ाया। मैं पीछे हटा। मेरी पीठ अखाड़े की दीवार से टकरा गई।
"अब सुन," उसने कहा। "तेरे पास दो रास्ते हैं। एक — तू लुट्टन की तरह एक घूँट पी ले, और मेरा हो जा। दूसरा — तू अपनी माँ के पास जा, उसे अपनी बाँहों में ले, और देख कि ज़िंदगी में एक भी कुश्ती नहीं जीती।"
"मैं तेरा नहीं होऊँगा।"
"हो जाएगा। सब होते हैं। रघुवीर भी हुआ था। बस उसने बाद में मना किया, तो मैंने उसे तोड़ दिया। जगदीश भी हुआ था। उसने भी मना किया, तो मैंने उसे भी तोड़ दिया। अब तेरी बारी है।"
मेरे अंदर कुछ जमने लगा। जैसे कोई बर्तन में दूध उबलकर ऊपर आ रहा हो। "तूने मेरे दोनों पापाओं को…"
"मैंने कुछ नहीं किया," उसने कंधे उठाए। "मैंने बस पानी दिया। बाकी सब उन्होंने खुद चुना। जैसे तू चुनेगा।"
वो पलटा। जाने लगा। फिर रुका। बिना मुड़े बोला, "कल सुबह अखाड़े में मुकाबला है। भैरव जेल में है, पर मुकाबला मेरे लिए नहीं — अखाड़े के लिए है। तू जीत गया, तो भी हारेगा। क्योंकि मिट्टी तो मेरी है।"
और वो चला गया। उसके कदमों की आवाज़ दूर गई। लालटेन अभी भी जल रही थी, पर उसकी लौ काँप रही थी। जैसे उसने भी वो बात सुन ली हो।
लुट्टन अभी भी ज़मीन पर बैठा था। उसका सिर झुका हुआ था। मैं उसके पास बैठ गया।
"लुट्टन।"
उसने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था। "मैं मर जाऊँगा ना?"
"ना," मैंने कहा। "जब तक बोतल नहीं छोड़ेगा, नहीं।"
"मैं छोड़ दूँगा।"
"तेरी कमर…"
"जाने दे कमर को।" उसने ज़मीन से मुट्ठी भर मिट्टी उठाई और अपने मुँह पर मल ली। जैसे कोई गुस्से में अपना चेहरा छुपा रहा हो। "पंद्रह साल। पंद्रह साल इसने मुझे पानी पिलाया और मैंने सोचा सर मुझे बड़ा बना रहा है।"
"अब क्या करेगा?"
"तेरे साथ हूँ।" उसने सीधा मेरी तरफ देखा। "मैं जो कहूँगा, सबके सामने कहूँगा।"
मैंने उसका कंधा थामा। उसका शरीर काँप रहा था। वो उस आदमी के जाने के बाद से काँप रहा था, और अभी भी रुका नहीं था।
मैं घर लौटा तो आँगन की मिट्टी पर सुबह की ओस जमी थी। माँ चूल्हे के पास बैठी थीं, आँखें बंद किए। कुछ बुदबुदा रही थीं। मैंने उनके पास बैठकर सब कुछ बताया — लुट्टन की बोतल, नीचे की सफ़ेद परत, वो आदमी, हरी कवर वाली कॉपी।
माँ ने आँखें खोलीं। उन्होंने चूल्हे की राख में से एक जलता कोयला उठाया, अपनी हथेली पर रखा, और बुझा दिया। उनकी हथेली पर कोयले का निशान बन गया, पर उन्होंने हाथ नहीं हिलाया।
"मैं उसे जानती हूँ," माँ ने कहा।
मैं सन्न रह गया। "कौन है वो?"
"तेरे पापा का गुरु।" उन्होंने हथेली झाड़ी। "रघुवीर ने उससे ज़हर बनाना सीखा था। पर बाद में उसने ज़हर बनाना बंद कर दिया, तो उस गुरु ने उसे अपना दुश्मन मान लिया। उसने रघुवीर को मरवाया। फिर जगदीश को।"
"क्यों नहीं बताया तुमने पहले?"
"क्योंकि मैं उसका नाम जानती थी," माँ ने कहा। "पर उसका नाम लेने वाले की ज़ुबान कट जाती थी।"
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा।
"अब सुन। वो आदमी तुझे डराने आया था। वो नाम बोलकर जाता है ताकि तेरी रात खराब हो। तू मत डर।"
"मैं नहीं डरता।"
"डरता है।" उन्होंने मेरी ठुड्डी उठाई। "पर डरना ठीक है। डरने वाला ही सोचता है। जो नहीं डरता, वो सोचना बंद कर देता है।"
गुड़िया दौड़कर आई। उसके हाथ में एक लोटा पानी था।
"भैया, मैंने सुना।"
"किससे?"
"सुक्खी बुआ आई थीं। बोल रही थीं — 'अरे मैंने तो सुना है कि अखाड़े में कोई नया आया है, बड़ी-बड़ी मूँछें, बड़ा आदमी।'"
मैंने माँ की तरफ देखा। माँ ने होंठ सिकोड़े। "सुक्खी बुआ… कभी-कभी सच्ची बात भी बोल देती हैं।"
गुड़िया ने लोटा मेरे हाथ में दिया। "भैया, पिए।"
"क्यों?"
"मैंने इसमें अखाड़े की मिट्टी डाली है। जैसे माँ कहती हैं — जो पानी में मिट्टी घोले, उसका डर मिट्टी में रह जाता है।"
मैंने हँसकर लोटा पिया। मिट्टी दाँतों में आई। कड़वी थी। पर मेरे अंदर की जो कड़वाहट लुट्टन की बोतल से आई थी, वो थोड़ी हल्की हुई।
दोपहर को टिंकू आया। उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी थी। पर उसकी मुस्कान गायब थी। उसने डिब्बी मेरे सामने रखी। डिब्बी खोली तो उसमें लड्डू नहीं थे। उसमें एक पुराना काग़ज़ था।
"ये क्या है?"
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