Spirit of a Fighter – Chapter 304
"मैंने तेरे लिए खीर बनाई थी," टिंकू ने कहा। "दुकान के पीछे वाले पुराने संदूक में रखने गया। वहाँ ये मिला।"
"किसने रखा?"
"किसी ने नहीं। वो संदूक पिछले साल से बंद था। उसकी चाबी मेरे पास है। और आज खुला मिला।"
मैंने काग़ज़ खोला। सादा काग़ज़ था। पर उस पर लिखावट मेरी जानी-पहचानी थी। पतली। झुकी हुई। बाएँ हाथ से लिखी — जैसे रघुवीर लिखता था। मैंने उसकी डायरी पढ़ी थी। वो लिखावट पहचानता था।
उस काग़ज़ पर बस एक लाइन थी।
"अगर तू ये पढ़ रहा है, तो तेरा पापा ही मुझे भेज रहा है। — माधव सिंह।"
मेरी नज़र काग़ज़ पर टिकी रही। माधव सिंह।
मैंने टिंकू की तरफ देखा। "टिंकू, ये संदूक कहाँ है?"
"मेरी दुकान के पीछे।"
"कब से?"
"जब से मेरे बाबा ने दुकान खोली। बीस साल से ज़्यादा।"
मैंने काग़ज़ मोड़ा। उसे अपनी जेब में रखा। "टिंकू, ये संदूक जिसने खोला, वो तेरी दुकान के आसपास ही होगा।"
"कोई नहीं आया।"
"कोई नहीं आया, या तूने देखा नहीं?"
टिंकू ने सिर खुजाया। "मैं सुबह से मिठाई बना रहा था। आज माँ ने पूछा कि खीर कहाँ गई, तो मैंने कहा बिक गई।" उसका चेहरा उतर गया। "भाई, मैंने फिर झूठ बोला।"
"क्यों बोला?"
"ताकि वो जाने कि दुकान चल रही है। ताकि वो परेशान न हो।"
मैंने उसकी तरफ देखा। उसका चेहरा हमेशा मुस्कुराता रहता था। आज नहीं मुस्कुरा रहा था।
"टिंकू," मैंने कहा। "तेरी माँ को सच बता। कि खीर मैं खाता हूँ। कि तू रोज़ मेरे लिए बनाता है। वो बुरा नहीं मानेगी।"
टिंकू ने होंठ काटे। "वो कहेगी — इतना सारा घी, इतनी मेहनत, अपने लिए रख।"
"तो रख लेना।"
"मैं तेरे बिना क्या रखूँगा?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में हल्की सी हँसी लौटी। "जिस दिन तू भारत केसरी बनेगा, मैं अपनी दुकान का नाम बदल दूँगा। 'टिंकू मिष्ठान भंडार' से 'भारत केसरी की मिठाई'।"
"पहले जीत तो ले।"
"जीतेगा।" उसने मेरी बाँह पर हाथ रखा। "मुझे पता है।"
शाम को मैंने माधव सिंह का नाम ज़ोर से बोला। माँ चौके में थीं। उनका हाथ रुक गया।
"कहाँ सुना ये नाम?" उन्होंने बिना पलटे पूछा।
"टिंकू के संदूक में पर्ची मिली। रघुवीर की लिखावट में।" मैंने पर्ची उन्हें दी। "इस पर लिखा है — माधव सिंह।"
माँ ने पर्ची पढ़ी। फिर उन्होंने उसे चूल्हे में डाल दिया। काग़ज़ जलकर राख हुई।
"माँ!"
"जो काग़ज़ में लिखा है, वो काग़ज़ में ही रहना चाहिए।" उन्होंने हाथ पोंछे। "माधव सिंह। तेरे पापा का गुरु। वही जिससे तू कल मिला।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "तू जानती थी कि वो यहाँ है?"
"मैं जानती थी कि वो आएगा।" माँ ने मेरी तरफ देखा। "तीन दिन पहले जब भैरव ने अखाड़ा बंद किया, उस दिन मैंने तेरे पापा की तस्वीर के सामने दीया जलाया था। और आज तेरे पापा ने मुझे सपने में आकर कहा — 'माधव आ गया। बेटे को अकेला मत छोड़।'"
मैं चुप खड़ा रहा। माँ की आँखें भरी नहीं थीं। उनका चेहरा शांत था। जैसे वो पहले से तैयार बैठी हों।
"माँ," मैंने धीरे से कहा। "तू डर नहीं रही?"
"डर रही हूँ।" उन्होंने साफ़ बोला। "पर डर के साथ चलना आ गया है। तेरे पापा के साथ चलना सीखा था।"
उन्होंने चूल्हे की आग में एक लकड़ी डाली। आग भड़की। रोशनी उनके चेहरे पर पड़ी।
"कल अखाड़े में जब माधव आए," माँ ने कहा, "तो उससे एक सवाल पूछना।"
"क्या?"
"उससे पूछना — 'उस रात कुएँ में कौन था जब मेरे पापा गिरे थे?'"
मैंने माँ की तरफ देखा।
"वो सवाल उसके पेट में चाकू की तरह घुसेगा," माँ ने कहा। "क्योंकि उस रात वो खुद कुएँ के पास था। और जब तेरे पापा गिरे, तो वो भागा नहीं। वो खड़ा रहा। और देखता रहा।"
रात को मैं चारपाई पर लेटा। छत की तरफ देखा। मेरे सीने में वो सुर फिर आ रहा था। धीमा। गहरा। जैसे कोई दूर से नगाड़ा बजा रहा हो।
मैंने आँखें बंद कीं। माधव सिंह। नाम के साथ एक चेहरा बना। मोटी मूँछें। भारी शरीर। मीठी आवाज़।
पर माधव सिंह की गंध मुझे याद नहीं थी। मैंने उसे सूँघा नहीं था। मैंने उसकी आवाज़ सुनी थी, उसकी बातें सुनी थीं, पर वो दो कदम दूर खड़ा था। मैं उसके करीब नहीं गया।
कल अगर वो अखाड़े में आया, तो मैं उसकी गंध पकड़ूँगा। क्योंकि हर आदमी की गंध होती है। और माधव सिंह की गंध ज़रूर किसी ऐसी चीज़ की होगी जो मैंने पहले सूँघी हो। शायद रघुवीर की डायरी से। शायद उस पुराने तहखाने से। शायद किसी ज़हर से।
मैंने करवट बदली।
आधी रात को मुझे कुछ सुनाई दिया। आँगन में पैरों की आहट। मैं उठा। दरवाज़े के पास गया। दरवाज़े से सटकर सुना।
कोई रो रहा था। धीमे से। किसी का गला घुट रहा था।
मैंने दरवाज़ा खोला। आँगन में गुड़िया खड़ी थी। उसके हाथ में एक काग़ज़ था। वो काँप रही थी।
"गुड़िया?"
"भैया…" उसकी आवाज़ फट गई। "किसी ने मेरी कॉपी में कुछ लिख दिया।"
मैंने काग़ज़ लिया। लालटेन जलाई। काग़ज़ पर तिरछे अक्षरों में लिखा था — "जो सवाल कुएँ का पूछेगा, वो कुएँ में सोएगा।"
मेरा खून जम गया। मैंने गुड़िया का कंधा थामा। "किसने दिया?"
"कोई नहीं दिया। मेरी कॉपी में था। मैं सो रही थी। जब उठी, तो ये कॉपी के बीच से निकला।"
मैंने उसे गले लगाया। वो मेरी छाती से चिपक गई। उसका शरीर ठंडा था।
"डर मत।"
"मैं डर नहीं रही।" उसने अपनी आवाज़ सख्त की। "मैं गुस्से में हूँ।"
मैंने काग़ज़ चूल्हे में डाल दिया। आग ने उसे एक पल में खा लिया।
"सुन गुड़िया," मैंने कहा। "कल सुबह तू माँ के साथ अखाड़े चलेगी। मेरे पीछे। और जो हो, तू चुप खड़ी रहेगी।"
"मैं चुप नहीं रहूँगी।"
"गुड़िया…"
"जिस दिन तू जीतेगा, उस दिन मैं सबको बताऊँगी कि मैंने तुझे मिट्टी दी थी।" उसने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ में आग। "और जो काग़ज़ में लिखकर भेजता है, वो सामने आकर लड़े।"
मैं हँस पड़ा। डर के बीच हँसी आई।
"ठीक है।" मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "अब जा, सो जा।"
वो गई। मैं आँगन में खड़ा रहा। आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे।
सुबह जल्दी आई। जैसे रात ने हार मान ली हो।
मैंने पापा की धोती पहनी। माँ ने तिलक किया। गुड़िया ने लाल धागा बाँधा। टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में मिठाई की डिब्बी।
"आज सुबह की खीर?" मैंने पूछा।
"ना।" उसने डिब्बी खोली। इसमें लड्डू थे। "आज लड्डू हैं। जीत के बाद खाएँगे।"
हम चले। रास्ते में सुक्खी बुआ मिलीं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
"बेटा," उन्होंने कहा। "मैंने सुना है कि आज अखाड़े में कोई बड़ा आदमी आया है। बड़ी मूँछें हैं उसकी।"
"तूने कहाँ देखा उसे?"
"मैंने नहीं देखा। मैंने सुना है।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। उनकी आँखों में चुगली नहीं थी। कुछ और था। "पर बेटा, मेरी एक बात मान। आज अखाड़े में जो भी हो, तू उस आदमी की आँखों में देखता रहना। जो आदमी अपनी आँखें नीची कर ले, वो झूठ बोल रहा होता है।"
मैंने उनका हाथ थामा। "थैंक्यू, बुआ।"
अखाड़े का गेट खुला था। अंदर मिट्टी ताज़ी सिंची हुई थी। लाल मिट्टी। पर मेरी नाक ने पहले ही पकड़ लिया — ऊपर की परत के नीचे वो पुरानी कालू काका वाली मिट्टी थी। मेरी मिट्टी।
मैदान के बीच वो खड़ा था। माधव सिंह। उसके पीछे लुट्टन खड़ा था, सिर झुकाए। और माधव के हाथ में वही हरी कवर वाली कॉपी थी।
मैं मैदान में उतरा। मेरे पीछे माँ, गुड़िया, टिंकू, और अखाड़े की दीवार के पास रणवीर सिंह व्हीलचेयर पर।
माधव ने मुझे देखा। मुस्कुराया।
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