Spirit of a Fighter – Chapter 302
और तभी मेरे कान में फुसफुसाहट आई। इतनी करीब कि जैसे कोई मेरे कंधे पर ही बोल रहा हो।
"मैं जानता हूँ तू यहाँ है, वीर सिंह।"
मैं जम गया। मेरा शरीर पत्थर।
"कल सुबह अखाड़े में मिल। तेरे लिए सर का संदेशा है।"
आवाज़ के साथ गरम साँस मेरी गर्दन पर पड़ी। फिर वो हटी। कदम दूर गए। धीरे-धीरे। जैसे जानबूझकर। ताकि मैं जान जाऊँ कि वो जा रहा है। कि वो जानता है कि मैं जानता हूँ।
मैं वहीं खड़ा रहा। कितनी देर, पता नहीं। मेरे हाथ मुट्ठी में बंधे थे। नाखून हथेली में गड़ रहे थे।
जब हिम्मत हुई, मैं पलटा। धीरे-धीरे कमरे तक आया। दरवाज़ा बंद किया। चारपाई पर बैठा। और तब जाकर मैंने अपनी साँस छोड़ी।
मेरे हाथ अभी भी काँप रहे थे।
मैंने सोचा — लुट्टन ने मुझे देखा नहीं। उसने सिर्फ़ सुना। सूँघा। समझा। वो जानता था कि मैं वहाँ हूँ, पर उसने पकड़ा नहीं। क्यों? अगर वो चाहता तो मुझे पकड़ सकता था। पर उसने नहीं पकड़ा। उसने मुझे जाने दिया। और संदेशा दिया — "कल सुबह अखाड़े में।"
मतलब वो चाहता था कि मैं आऊँ। वो मुझसे कुछ कहना चाहता था। या मुझसे कुछ करवाना चाहता था।
और "सर" — सर कौन?
मेरी नज़र तकिये के नीचे से झाँकती रघुवीर की डायरी पर पड़ी। वो नाम। जो मैंने मिट्टी से साफ़ किया था। जो मुझे पता था। जो रोज़ मेरे सामने से गुज़रता है।
अब उस नाम के दो मतलब हो सकते थे। एक — वो भैरव का आदमी था। दूसरा — वो भैरव से भी बड़ा था।
मैंने डायरी उठाई। उसे खोला। उस नाम पर उँगली रखी।
"तू कौन है?" मैंने धीरे से पूछा, जैसे वो सुन सकता हो। "तू क्या है?"
जवाब नहीं आया। बस बाहर हवा चली। खिड़की का परदा हिला।
मैंने डायरी बंद की। छाती से लगाई। और अंधेरे में देखा।
कल सुबह। अखाड़ा। लुट्टन। और सर का संदेशा।
मैंने आँखें बंद कीं। माँ की बात याद आई — "अंधेरे में लड़ने वाला बेटा और अंधेरे में बैठी माँ, दोनों एक ही दिन गिरते हैं।"
पर इस बार मैं अंधेरे में अकेला नहीं था। मेरे पास एक नाम था। एक किताब थी। और एक सुबह का वादा।
मैंने आँखें खोलीं। और तभी मेरी नाक में फिर वो गंध आई। कड़वी। भारी। पर इस बार कुएँ से नहीं। अखाड़े के फाटक से। और उसके साथ एक आवाज़ — बहुत धीमी, बहुत दूर, जैसे कोई गा रहा हो।
कोई और था जो इस वक़्त ज़हर लेकर आ रहा था। और वो मेरे लिए आ रहा था।
मैंने धोती कसी। बुझी लालटेन उठाई। दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। हैंडल छुआ — ठंडा था। और उस ठंडक में एक बात साफ़ समझ आई — भैरव जेल में था, पर उसका ज़हर अभी भी चल रहा था। किसी और के हाथों से। किसी और की आवाज़ से।
और वो "कोई और" मेरे बहुत करीब था। इतना करीब कि मैं उसकी गंध अभी सूँघ सकता था।
मैंने दरवाज़ा खोला।
बाहर अंधेरा था। और उस अंधेरे में, अखाड़े के फाटक के पास, एक लालटेन जल रही थी। अकेली। हिलती हुई। जैसे कोई उसे हाथ में लेकर इंतज़ार कर रहा हो।
मैंने कदम बढ़ाया।
और तभी वो लालटेन बुझ गई।
अंधेरा और गहरा हो गया।
॥
लालटेन बुझी तो मैंने दो कदम और बढ़ा दिए। अंधेरे में कुछ दिख नहीं रहा था, पर मेरी नाक काम कर रही थी। और वो मुझे बता रही थी कि सामने कोई खड़ा है। पसीना। तेल। और उसके ऊपर वो कड़वी बू जो मैं अब बंद आँखों से भी पहचान लूँ।
"लुट्टन।"
हँसी सुनाई दी। फिर माचिस जली। एक छोटी लौ, और उसके पीछे लुट्टन का चेहरा — आधा रोशनी में, आधा अंधेरे में। उसके हाथ में वही हरी बोतल थी।
"तूने पहचान लिया?" उसने लालटेन जलाई और मेरी तरफ बढ़ा दी। "या सूँघ लिया?"
मैंने लालटेन ली। मेरी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"सुबह का संदेशा," मैंने कहा। "सर का।"
लुट्टन ने कंधे उठाए। "सर ने कहा था — तू जो कर रहा है, वो सब उन्हें पता है।"
"कौन सर?"
"जो सब जानते हैं।"
"नाम बोल।"
लुट्टन मुस्कुराया। पर वो मुस्कान उसके मुँह पर टिकी नहीं। फिसल गई। "नाम बोलूँ तो मेरा काम खत्म। सर ने कहा था — वीर को मौका देना। आख़िरी मौका।"
मैंने बोतल की तरफ देखा। "ये बोतल में क्या है?"
लुट्टन ने बोतल हिलाई। अंदर पानी हिला। "ताकत।"
"ताकत?"
"सर कहते हैं जो इसे नहीं पीता, वो कभी बड़ा पहलवान नहीं बन सकता। तू मिट्टी में पसीना बहाता है, रोटी सूखी खाता है, और सोचता है बड़ा बन जाएगा?" उसकी आवाज़ में हँसी थी, पर आँखें नहीं हँस रही थीं। "देख, मैं तेरे भले की बात कर रहा हूँ। एक घूँट। बस एक। और कल तेरी कुश्ती में तेरे हाथ लोहे के हो जाएँगे।"
मैंने उसे देखा। उसका गला सूख रहा था। वो बोलते-बोलते जीभ से होंठ गीले कर रहा था।
"तो तू क्यों नहीं पीता?" मैंने पूछा।
लुट्टन का चेहरा पल भर के लिए उतर गया। जैसे किसी ने उसकी टोपी उतार दी हो। फिर वो संभला। ठुड्डी ऊपर की। सीना ताना।
"मैं पीता हूँ। रोज़ सुबह। सर के हाथ से।"
उसकी आवाज़ में गर्व था। सच में गर्व। जैसे बच्चा कहे मैंने खुद के जूते बाँधे। पर जब वो बोला, तो मैंने उसके पसीने में वो कड़वाहट पकड़ी जो ताकत की नहीं, बीमारी की बू होती है। वो बू जो श्यामू के शरीर से आ रही थी। जो बब्बर की साँस से निकलती थी।
मेरा पेट हल्का सा डगमगाया। अंधेरे में मैंने अपनी आँखें मींच लीं।
ये आदमी भैरव का चेला नहीं था। ये आदमी भैरव का मवेशी था। जिसे रोज़ पानी पिलाकर मोटा किया जा रहा था, और जो खुश था कि उसे पानी मिल रहा है।
"लुट्टन," मैंने धीरे से कहा। मेरी आवाज़ खुद मेरे कानों में बदली हुई लगी। "एक काम कर। बोतल उलट।"
"क्यों?"
"बस उलट। और नीचे देख।"
"मैं तेरे बहकावे में नहीं आने वाला।"
"मैं तुझे बहका नहीं रहा। मैं तुझे तेरा ही पानी दिखा रहा हूँ।"
वो रुका। उसकी उँगलियाँ बोतल पर कस गईं। फिर बहाने से बोला, "मुझे सर ने भेजा है, मैं तेरे साथ ये नहीं…"
"डर किस बात का?" मैंने कहा। "उलट दे। अगर साफ़ है, तो तेरे सर का पानी साफ़ है। कोई नुकसान नहीं।"
लुट्टन ने मेरी तरफ देखा। लालटेन की लौ में उसकी आँखों में कुछ चमका। शक नहीं। कुछ और। जैसे कोई बच्चा कुएँ में झाँक रहा हो ये जानने के लिए कि अंदर पानी है या सूखा।
उसने बोतल उलटी कर दी।
और तब मैंने देखा — उसके हाथ की उँगलियाँ जकड़ी रह गईं। उसकी गर्दन झुकी। आँखें बोतल के निचले हिस्से पर टिकी रहीं।
नीचे सफ़ेद पाउडर की पतली परत जमी थी। एक चम्मच भर। बस।
लुट्टन का हाथ काँपा। बोतल से एक बूँद टपकी और उसकी चप्पल पर गिरी।
"ये क्या है?" उसकी आवाज़ भारी हो गई।
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि इस सवाल का जवाब मैं नहीं दे सकता था। वो जवाब उसके सर के पास था। और मैं चाहता था कि लुट्टन खुद उस तक पहुँचे।
"ये…" उसने बोतल हिलाई। पाउडर घुला। पानी लगभग साफ़ हो गया। "ये तो पानी है। बस पानी।"
"तू रोज़ पीता है," मैंने कहा। "कितने साल से?"
"बीस… नहीं, पंद्रह। पंद्रह साल।"
"तेरी कमर में दर्द होता है?"
लुट्टन ने झटके से मेरी तरफ देखा। "तुझे कैसे…"
"तेरी साँस फूलती है? रात में पसीना आता है? भूख कम लगती है?"
उसने बोतल अपनी छाती से लगा ली। "तू… तू ये सब क्या बोल रहा है?"
"तेरे साँस में कड़वाहट है," मैंने कहा। "उसी पानी की। वो तेरे अंदर तक पहुँच चुकी है। अब जाने का रास्ता नहीं है। सिर्फ़ रुकने का है।"
लुट्टन की आँखें भर आईं। उसने बोतल को दोनों हाथों से पकड़ा और ज़मीन की तरफ झुकाया — जैसे उसे पटकना चाहता हो। उसका पूरा शरीर काँप रहा था।
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