Spirit of a Fighter292 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 292

7 min read November 5, 2026

"तो मत सो। पर मेरी बात सुन।" उन्होंने मेरी तरफ़ मुड़कर देखा। "भैरव कल तेरे हाथों में एक ही मौका देगा — शर्त का। उसने माँ और टिंकू को दाँव पर लगाया है, तो वो चाहेगा कि तू गुस्से में लड़े। गुस्से में आदमी अपनी ही पकड़ खो देता है।"

मैंने कुछ नहीं कहा। मैं जानता था वो सही कह रहे थे। पर सही बात सुनने का मन तब होता है जब दिल में जगह हो। मेरे दिल में उस वक़्त सिर्फ़ एक ही चीज़ थी — मीरा का वो फटा हुआ हरा टुकड़ा, सीढ़ी पर पड़ा हुआ।

मीरा अपने घर की तरफ़ चली गई थी। जाते वक़्त वो रुकी थी, मुड़ी थी, और उसने कुछ कहना चाहा था। पर फिर चुप होकर चली गई। अधूरी बात सबसे ज़्यादा चुभती है।

कमरे में लेटा तो आँखों के सामने वही दीया जल रहा था। वो दीया जो उसके सामने मिट्टी पर रखा था, रोशनी देने के लिए नहीं — मेरे लिए निशान छोड़ने के लिए। उस लड़की को रस्सी से बाँधकर भी अक्ल आ गई थी। मेरे पेट में कुछ गरम-गरम घूम गया। डर नहीं था, वो और कुछ था। शायद यही होता है जब कोई आपके लिए खुद को ख़तरे में डाल दे।

सुबह टिंकू खीर लेकर आया। मेरी माँ ने भेजी थी, उसने कहा। कटोरा मेरे सामने रख दिया और बैठकर मुझे देखने लगा। गुड़िया कॉपी लेकर आई और मेरे पास चुपचाप बैठ गई।

"तू हारेगा तो नहीं?" टिंकू ने पूछा। सीधा सवाल। बच्चों के सवाल ऐसे ही होते हैं — बिना लाग-लपेट।

"नहीं।"

"मीरा दीदी भी आएँगी?"

मेरा हाथ कटोरे पर रुक गया। "पता नहीं।"

"वो आएँगी," गुड़िया बोली, जैसे दुनिया का सबसे आसान हिसाब हो। "वो तुझे देखने आती है ना।"

मैं मुस्कुराया। पहली बार सुबह से। बच्चों को कभी-कभी वो बात पता होती है जो बड़ों को नहीं।

तभी दरवाज़े पर बब्बर आया। हाँफ रहा था, माथे पर पसीना।

"वीर, मैंने मीरा को फाटक पर देखा है। वो जा नहीं रही। वो यहीं है।"

मैं उठा। कटोरा मिट्टी पर उलट गया। मैं भागा बाहर, फाटक तक।

फाटक खाली था। सिर्फ़ धूल और सुबह की ठंडी हवा।

"वो पीछे नहर के रास्ते आई थी," बब्बर ने हाँफते हुए कहा। "मैंने हरी कुर्ता देखी — पक्का यही थी।"

मैं नहर की तरफ़ भागा। पाँव मिट्टी में धँसते गए, पर मैं रुका नहीं। दूर पुलिया के नीचे कुछ हरा दिखा — कुर्ता-सलवार।

मैं और तेज़ भागा। साँस फूल रही थी, पर मन में एक ही बात — कि वो मुझे बताने आई थी, कि वो गई नहीं।

पुलिया के नीचे पहुँचा तो साँस रुक गई।

वहाँ मीरा नहीं थी।

वहाँ सिर्फ़ उसका बैग पड़ा था, कीचड़ में। और बैग पर एक पर्ची रखी थी, जो पत्थर से दबी थी ताकि हवा उड़ा न दे।

मैंने काँपते हाथों से पर्ची उठाई।

"वीर, मैं गई नहीं। मुझे किसी ने उठा लिया है। वो कुएँ वाले रास्ते से ले गए। जल्दी आ। — मीरा"

और पर्ची के नीचे, काग़ज़ के कोने पर, एक बूँद थी। लाल। सूखने लगी थी, पर अभी भी गीली।

मेरे हाथ से पर्ची फिसलने लगी। मैंने उसे कसकर पकड़ा।

कुएँ वाला रास्ता — वो वही रास्ता था जहाँ से हरनाम गया था।

॥

पर्ची मेरे हाथ में काँप रही थी। मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, फिर भी काँपती रही। कीचड़ में पड़ा मीरा का बैग जैसे मुझे देख रहा था। उसका बैग, जिसमें आयुर्वेद की किताबें रहती थीं, जिसमें सोंठ-काली मिर्च की पुड़िया रहती थी।

दिमाग़ सुन्न था। एक आवाज़ भी नहीं आ रही थी अंदर से। सिर्फ़ एक शब्द गूँज रहा था — कुआँ। कुआँ। कुआँ।

मैंने पर्ची जेब में ठूँसी और उसी वक़्त पीछे से बब्बर की साँस सुनाई दी।

"वीर! क्या हुआ? क्या मिला?"

मैं पलटा। मेरा चेहरा देखकर उसका रंग उतर गया। वो कुछ पूछने ही वाला था कि मैंने उसका कलाई पकड़ ली।

"अखाड़ा। अभी। भाग।"

हम दोनों भागे। नहर का किनारा, फिर सूखी मिट्टी का रास्ता, फिर नीम के पेड़ों की कतार। मेरे पैर मिट्टी में धँसते जा रहे थे और मैं उन्हें खींच रहा था, जैसे शरीर मेरा नहीं, किसी और का हो और मैं उसे जबरदस्ती ले जा रहा हूँ।

रास्ते में टिंकू मिला। वो अपनी दुकान की तरफ़ जा रहा था, हाथ में मिठाई की डिब्बी। मुझे देखकर रुका।

"अरे वीर, ये खीर तेरी माँ ने…"

"टिंकू।" मेरी आवाज़ ऐसी निकली कि वो खीर की डिब्बी वहीं मिट्टी पर रख बैठा। "मीरा को उठा लिया। कुएँ वाले रास्ते से।"

टिंकू एक पल को ऐसे रुका जैसे उसे समझ नहीं आया। फिर उसका चेहरा बदला। वो उस खीर को भूल गया जो वो अपनी माँ से बचाकर लाया था। वो उठा और भागने लगा, मुझसे भी आगे। उसका लंबा पतला शरीर हवा में काँप रहा था।

अखाड़े का पिछला हिस्सा आया। वहाँ कालू काका खड़े थे। लालटेन उनके हाथ में थी, पर उसकी रोशनी कुएँ की तरफ़ नहीं, नीचे की तरफ़ झुकी थी। उनका चेहरा मैंने पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। सफ़ेद दाढ़ी में धूल थी और आँखों के नीचे काले घेरे, जैसे उन्होंने सालों की नींद एक रात में खो दी हो।

"काका!" मैंने दौड़कर उनका हाथ पकड़ा। "मीरा? मीरा कहाँ है?"

कालू काका ने कुएँ की तरफ़ देखा।

कुएँ का ढक्कन पत्थर से जड़ दिया गया था। बड़ा, चौकोर, भारी पत्थर। उस पर ताज़ी मिट्टी की परत चढ़ी थी, जैसे जल्दबाज़ी में लगाई गई हो।

"अंदर से आवाज़ आ रही थी," कालू काका ने धीमे से कहा। उनकी आवाज़ में वो बात नहीं थी जो हमेशा रहती थी। "पहले मैंने सुना — 'बचाओ' जैसा कुछ। फिर आवाज़ बंद हो गई। मैंने पत्थर हटाने की कोशिश की, पर अकेला कहाँ उठा पाता। भैरव के दो आदमी यहाँ से अभी-अभी गए हैं।"

"मीरा अंदर है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ सुनकर मुझे खुद लगा जैसे ये मैंने नहीं कहा, किसी और ने कहा।

"हाँ।" कालू काका ने मेरी आँखों में देखा। "और भैरव भी अंदर है।"

मेरे पैर के नीचे की ज़मीन खिसक गई। पर मैं गिरा नहीं। मैंने बब्बर और टिंकू की तरफ़ देखा। बब्बर का चेहरा कसा हुआ था, मुँह से साँस ज़ोर-ज़ोर आ रही थी। टिंकू हाँफ रहा था, पर उसकी आँखों में डर नहीं था।

"पत्थर हटाओ," मैंने कहा।

चारों ने मिलकर धक्का लगाया। पत्थर हिला, फिर सरका। उसके नीचे का ढक्कन ज़ंग खाया हुआ था, पर खुला था — भैरव उसे खुला छोड़ गया था, जैसे जानता हो कोई आएगा। मैंने लालटेन ली और सीढ़ी पर पैर रखा।

"मैं भी आता हूँ," बब्बर बोला।

"तू ऊपर रुक," मैंने कहा। "अगर हम ऊपर न आएँ, तो तू गाँव में आग लगा देना। सबको जगा देना।"

बब्बर ने एक पल मेरी आँखों में देखा, फिर सिर हिलाया।

सीढ़ियाँ संकरी थीं। पत्थर की, ठंडी, ऊपर से काई फिसल रही थी। नीचे उतरते-उतरते मुझे वो गंध आई — कड़वी, धातु जैसी, और उसके नीचे मीरा की गंध — तुलसी, अदरक, काली मिर्च। मेरा दिल ज़ोर से धड़का। वो ज़िंदा है।

नीचे तहखाने में हल्की रोशनी थी। मिट्टी के तेल का दीया जल रहा था, दीवार के आले में। और उसकी रोशनी में, बीच में, एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी थी।

मीरा उस पर बँधी थी। रस्सी हाथों पर, पैरों पर। मुँह पर कपड़ा बँधा था। उसके छोटे बाल माथे पर चिपके थे और आँखें — आँखें मुझे देख रही थीं। उनमें पानी था, पर डर नहीं। जैसे वो मुझे बता रही हो — देखा, मैंने कहा था ना, तू आएगा।

और उसके पास, हाथ में मिट्टी का कटोरा लिए, भैरव सिंह खड़ा था।

उसने कोई शस्त्र नहीं उठाया हुआ था। बस वो कटोरा। और उस कटोरे से वही गंध आ रही थी — वही कड़वी, धातु जैसी, वही जो हरी शीशी से आती थी।

भैरव मुस्कुराया। उसकी तेल लगी मूँछें रोशनी में चमकीं।

"आ गया तू।" उसने कटोरा हल्का ऊपर किया। "मुझे पता था तू आएगा। तेरे जैसे लड़के की एक ही कमज़ोरी होती है — वो सोचते हैं दुनिया को बचाना उनका काम है।"

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