Spirit of a Fighter291 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 291

7 min read November 5, 2026

"ठीक है," वो बोला। "आज रात।" वो मेरे पास आया, मेरे चेहरे से एक हाथ की दूरी पर रुका। "पर एक शर्त है। अगर तू हारा, तो तेरी माँ और तेरा टिंकू — दोनों अखाड़े से बाहर। हमेशा के लिए।"

मेरे पेट में आग भर गई। मेरा हाथ मुट्ठी में बंधा। कालू काका ने पीछे से मेरी कलाई दबाई — बस एक पल, जैसे कह रहे हों, चुप रह।

मैं चुप रहा। मैंने एक लंबी साँस ली और बोला, "मंज़ूर।"

"और हाँ," भैरव ने कहा। वो मुड़ा, दो कदम चला, और फिर पलटा। उसकी आवाज़ में अब वो मिठास थी जो डराने से पहले आती है। "मैं तुझे एक खुशखबरी भी देता हूँ।"

मेरी नसों में ठंड बही।

"तेरी मीरा आज अखाड़े में नहीं होगी," उसने कहा। "मैंने उसके पापा को शहर भेज दिया है — इलाज के लिए। पुराने अखाड़े के एक डॉक्टर के पास। और मीरा अपने पापा के साथ गई है।"

मेरे पैर जैसे ज़मीन में धँस गए।

मैंने पीछे देखा। मीरा कहाँ थी? अभी तो वो मेरे साथ थी — नहर के किनारे, अखाड़े के गेट पर, अभी तो…

पर वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ़ कालू काका खड़े थे, और उनका चेहरा पत्थर जैसा था।

"लुट्टन?" मैंने आवाज़ दी।

कोई जवाब नहीं।

भैरव मुस्कुराया। उसने अपनी जेब से चाबी निकाली, हवा में उछाली और पकड़ी।

"तेरे पास आज रात का वक़्त है," उसने कहा। "सोच ले। लड़ेगा, तो अकेला लड़ेगा।"

वो मुड़ा और अंधेरे में चला गया। उसके कदमों की आवाज़ दूर तक गई, और फिर ख़त्म हो गई।

मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे हाथ ठंडे थे। मेरा गला सूख रहा था।

कालू काका मेरे पास आए। उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा और मुझे मिट्टी पर बैठा दिया।

"साँस ले," वो बोले। "साँस ले, बेटा।"

मैंने साँस ली। एक, दो, तीन। मेरे फेफड़ों में मिट्टी की गंध भर गई।

"वो झूठ बोल रहा है," मैंने कहा। "मीरा यहीं थी। वो यहाँ से कैसे…"

"वो यहाँ थी," कालू काका ने कहा। "पर जब हम गेट पर पहुँचे, तब वो पीछे रह गई। मैंने सोचा, शायद उसने तेरी कलाई पकड़नी थी। पर वो नहीं आई।"

मैं उठा। "मैं उसे ढूँढता हूँ।"

"रुक," कालू काका ने कहा। "पहले सोच। भैरव ने कहा कि उसने मीरा को भेज दिया है। अगर सच में भेज दिया, तो वो अब तक गाड़ी में होगी। अगर झूठ बोला, तो वो कहीं यहीं है। और अगर वो यहीं है, तो उसे किसी ने पकड़ा है।"

"कौन?"

"लुट्टन," कालू काका ने धीरे से कहा।

मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।

"नहीं," मैंने कहा। "लुट्टन ने आज हमारा साथ दिया। वो बदल गया।"

"वो बदला है," कालू काका ने कहा। "पर एक आदमी एक दिन में नहीं बदलता। वो डरा हुआ है। और डरा हुआ आदमी वही करता है जो उसे सबसे सुरक्षित लगता है। शायद भैरव ने उसे धमकाया हो। शायद उससे कहा हो — मीरा को ले जा, वरना तेरी गर्दन का जला निशान फिर ताज़ा हो जाएगा।"

मैंने अपना सिर पकड़ा। मेरे दिमाग़ में हर चीज़ घूम रही थी।

फिर मुझे कुछ याद आया। मैं दौड़ा, अखाड़े के पीछे वाले दरवाज़े तक। वहाँ मिट्टी पर पैरों के निशान थे। दो जोड़ी।

"काका," मैंने कहा, "ये देखो।"

कालू काका झुके। उन्होंने निशानों को उँगली से छुआ। "एक बड़ा पैर, एक छोटा। बड़ा लुट्टन का है। छोटा मीरा का। और वो दोनों पीछे की तरफ़ गए हैं।"

"पीछे कुएँ की तरफ़?"

"नहीं," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ भारी हो गई। "पीछे की तरफ़ सिर्फ़ कुआँ है। और कुएँ की सीढ़ियाँ भैरव ने कल तुड़वा दी थीं।"

मेरा दिल धक् से रह गया।

"तो वो उसे कुएँ पर ले गया?" मैंने कहा। "कुएँ पर तो कोई रास्ता नहीं…"

"एक रास्ता है," कालू काका ने कहा। "वो जो मैंने तुझे बताया था — नीम के पेड़ के नीचे से। वो रास्ता अभी खुला है।"

मैं भागा। कालू काका मेरे पीछे भागे, पर वो धीमे थे।

अखाड़े के पीछे अंधेरा था। नीम का पेड़ चाँदनी में काला दिख रहा था। उसके नीचे मिट्टी ताज़ी खुदी हुई थी, और एक लालटेन रखी थी — बुझी हुई।

मैंने लालटेन उठाई। ठंडी थी।

"मीरा!" मैंने आवाज़ दी।

कोई जवाब नहीं।

"मीरा!"

हवा में एक हल्की सी गंध थी — तुलसी और अदरक। मीरा के हाथों की गंध। मैं उस गंध के पीछे-पीछे चला। नीम के पेड़ के पीछे, झाड़ियों के बीच, एक झुका हुआ पत्थर था — वही रास्ता जो कालू काका ने बताया था।

पत्थर हटाया हुआ था। नीचे से ठंडी हवा आ रही थी।

मैंने लालटेन जलाई — मेरे पास माचिस थी। और मैंने नीचे झाँका।

सीढ़ियाँ थीं। बहुत पुरानी। और सीढ़ियों पर, तीसरे पायदान पर, एक हरी कुर्ता-सलवार का फटा हुआ टुकड़ा पड़ा था।

मेरा दिल ज़ोर से धड़का।

मैं नीचे उतरा। सीढ़ियाँ चरमराईं। नीचे की हवा में गीली मिट्टी और पुराने पत्थर की गंध थी।

"मीरा?" मैंने फिर आवाज़ दी, इस बार धीरे से।

दूर से कोई आवाज़ आई — दबी हुई, जैसे किसी ने मुँह बंद करके कहा हो।

मैं तेज़ चला। सीढ़ियाँ खत्म हुईं और एक छोटा सा कमरा आया — जिसकी दीवारें पत्थर की थीं और ज़मीन मिट्टी की। कोने में एक दीया जल रहा था।

और दीये के नीचे, मिट्टी पर, मीरा बैठी थी।

उसके हाथ रस्सी से बंधे थे, मुँह पर कपड़ा था, और उसकी आँखें — उसकी आँखों में पानी था।

मैं दौड़ा। मैंने उसके मुँह से कपड़ा खींचा।

"वीर," वो फूट-फूटकर बोली, "वो… वो मेरे पीछे…"

मैंने पलटकर देखा।

सीढ़ियों पर लुट्टन खड़ा था। उसके हाथ में चाकू था, और उसका चेहरा… उसका चेहरा ऐसा था जैसे वो खुद को ही पहचान नहीं रहा हो।

"लुट्टन," मैंने धीरे से कहा। "चाकू नीचे रख।"

"मैं… मैं माफ़ी चाहता हूँ।" उसकी आवाज़ टूट रही थी। "उसने कहा था कि अगर मैं उसे नहीं लाया, तो मेरी बहन को…"

"मैं जानता हूँ," मैंने कहा। "पर चाकू नीचे रख, लुट्टन। अभी।"

चाकू उसके हाथ से गिर गया। वो सीढ़ियों पर बैठ गया और अपना सिर घुटनों में छिपा लिया।

मैंने मीरा के हाथ खोले। रस्सी कसी हुई थी — उसकी कलाइयों पर लाल निशान पड़ गए थे।

"तू ठीक है?" मैंने पूछा।

"अब ठीक हूँ," उसने कहा। और फिर उसने एक बात कही जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो गए। "वीर, भैरव ने जो काग़ज़ जलाए — वो अलमारी के नहीं थे।"

मैं रुका। "तो किसके थे?"

"वो हरनाम की हरी कवर वाली कॉपी के पन्ने थे," उसने कहा। "मैंने जब ऊपर से देखा — अंगीठी में जलते पन्नों पर हरी जिल्द का कोना दिखा था। भैरव ने हरनाम का सबूत जला दिया।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

"तो अब हमारे पास सबूत नहीं?" मैंने कहा।

मीरा ने अपनी जेब से एक छोटी पुड़िया निकाली। "एक पन्ना मेरे पास है। जो आज सुबह मुंशीजी ने मुझे दिया था — भैरव की लिखाई वाला। पर वो एक ही पन्ना है। पूरी कॉपी नहीं।"

मैंने पुड़िया ली और उसे सीने से लगाया।

"एक पन्ना काफ़ी है," मैंने कहा। "अगर सही मौके पर दिखाया जाए।"

हम सीढ़ियों से ऊपर आए। कालू काका ऊपर खड़े थे, और उनके हाथ में लाठी थी। जब उन्होंने हमें देखा, तो उनकी साँस लौटी।

लुट्टन पीछे-पीछे आया, सिर झुकाए।

"काका," उसने धीरे से कहा, "मुझे मार दो। मैंने जो किया…"

कालू काका ने उसकी तरफ़ देखा। और फिर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस अपनी लाठी उसके कंधे पर रखी और उसे आगे बढ़ने का इशारा किया।

अखाड़े में लौटे तो आसमान पहले हल्का हो रहा था। पूरब में एक पतली लकीर थी — सुबह की पहली।

अखाड़े के फाटक पर पहुँचे तो कालू काका ने मेरा कंधा थाम लिया।

"वीर," उनकी आवाज़ रात की थकान से भारी थी। "आज तू सो जा। दो घंटे। कल की लड़ाई में दिमाग़ चाहिए, सिर्फ़ गुस्सा नहीं।"

"मैं सो नहीं सकता, काका।"

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