Spirit of a Fighter293 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 293

7 min read November 5, 2026

मैंने एक कदम आगे रखा। तहखाने की मिट्टी पैर के नीचे नरम थी, जैसे किसी ने अभी गूंधी हो।

"उस कटोरे को उसके मुँह से दूर रख।"

"क्यों?" भैरव ने सिर झुकाया। "मैं तो यहाँ तेरी लड़की को ज़हर नहीं, ताकत देने वाला पानी पिलाने आया था। इसमें वही है जो मैं अपने पहलवानों को देता हूँ। बस एक बात — ये पानी मीरा के लिए नहीं बना। ये मेरे अखाड़े के पहलवानों के लिए बना है। पर तूने मेरा खेल बिगाड़ दिया। तूने मेरे सामने हाथ उठाया। तो अब ये पानी तेरी लड़की पीएगी।"

मीरा ने कपड़े के नीचे से कुछ कहा। आवाज़ दबी हुई थी, पर साफ़। "मत… आ… वो झूठ… बोल रहा है।"

मेरा शरीर काँपने लगा। हाथों में जोर आया — वो जोर जो पहले कभी नहीं आया था। मैं एक कदम और आगे बढ़ा। भैरव का कटोरा मीरा के मुँह की तरफ़ झुका।

और तभी पीछे से एक आवाज़ आई।

"भैरव। ये कटोरी मत बढ़ा।"

कालू काका आगे आए। उन्होंने लालटेन ऊँची की। उसकी रोशनी भैरव के चेहरे पर पड़ी और भैरव पल भर के लिए सिकुड़ा, जैसे रोशनी से जल गया हो।

"वरना," कालू काका ने कहा, "मैं आज वो बात बोल दूँगा जो मैंने बीस साल से सीने में दबाकर रखी है।"

भैरव हँसा। पर हँसी में वो दम नहीं थी जो उसकी आवाज़ में हमेशा रहती थी।

"तू?" उसने कटोरा थोड़ा नीचे किया। "तू क्या बोलेगा, कालू? तू तो बस मिट्टी सींचने वाला है। तूने ज़िंदगी में एक बात नहीं बोली, आज क्या बोलेगा?"

"वो बात," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ न ऊँची थी न धीमी, बस साफ़, "जो तेरी अपनी माँ की कब्र से जुड़ी है।"

भैरव का हाथ हवा में रुक गया।

कटोरा वहीं अटका रहा, मीरा के मुँह से एक बालिश्त दूर। भैरव की मुट्ठी कसी हुई थी। उसका चेहरा वो नहीं था जो अभी था। अभी वो मुस्कुरा रहा था, हँस रहा था। अब उसके माथे पर एक लकीर आ गई थी और उसकी आँखें कालू काका पर टिकी थीं, जैसे वो उन्हें देख नहीं रहा, उनके पीछे कुछ ढूँढ रहा हो।

तहखाने में चुप्पी छा गई। टिंकू मेरे पीछे खड़ा था, उसकी साँस मेरी गर्दन पर लग रही थी। मिट्टी की गंध, दीये की तेल की गंध, और उस कटोरे की कड़वाहट — सब एक साथ मेरे सिर में घूम रही थी।

भैरव ने धीरे से कटोरा नीचे रखा। मिट्टी पर। बिना आवाज़ के। फिर पलटा। और जब बोला, तो उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुराने ज़ख्म से खून बह रहा हो, बहुत धीरे, बहुत भारी।

"बोल कालू। मेरी माँ के बारे में तू क्या जानता है?"

कालू काका ने लालटेन को और ऊँचा किया। उनके कुबड़े शरीर में एक झटका आया, जैसे बीस साल का बोझ एक पल में उतर रहा हो।

"तेरी माँ," उन्होंने कहा, "मरकर नहीं गई थी, भैरव। उसे मारा गया था।"

भैरव हिला। बस एक कदम पीछे, पर हिला। उसके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने कभी नहीं देखा था — जैसे किसी ने उसके अंदर का कोई दरवाज़ा ज़ोर से खोल दिया हो।

"तू झूठ बोल रहा है।" उसकी आवाज़ भारी हो गई। "मेरी माँ बीमारी से मरी थी। मैंने खुद उसका दाह-संस्कार किया था। मैंने खुद उसकी कब्र पर पत्थर रखा था।"

"कब्र पर पत्थर तूने रखा था," कालू काका ने कहा, "पर उस कब्र में जो लेटा है, वो तेरी माँ नहीं है।"

मेरी साँस रुक गई। मीरा की आँखें भी फैल गईं। टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया, उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।

"तू… तू क्या कह रहा है?" भैरव की आवाज़ टूटी।

कालू काका ने आह भरी। "बैठ जा, भैरव। खड़ा नहीं सुन पाएगा।"

"मैं नहीं बैठूँगा! बोल!"

"तेरी माँ को ज़हर दिया गया था," कालू काका ने कहा। "वही ज़हर जो आज तेरे हाथ में उस कटोरे में है। और वो ज़हर उसे तेरे पिता ने दिया था।"

भैरव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने कुछ कहने की कोशिश की, पर आवाज़ नहीं निकली। उसके होंठ हिले, बस हिले।

"तेरे पिता," कालू काका आगे बढ़े, "को लगता था कि तेरी माँ उसका राज़ जान गई है। वो राज़ — कि तेरे पिता ने अखाड़े की मिट्टी बेचनी शुरू कर दी थी। उस ज़माने में रणवीर सिंह के पिता अखाड़े के मालिक थे। तेरे पिता कोई और थे, भैरव। वो अखाड़े के हिसाब की कॉपी में हेर-फेर करते थे। तेरी माँ ने वो कॉपी देख ली थी।"

भैरव का हाथ कुर्सी की पीठ पर टिका। उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं।

"तेरी माँ ने तेरे पिता को रोका। कहा — ये गलत है, बच्चे का पापा, ये मिट्टी हमारी नहीं है। और उसी रात तेरे पिता ने उसके दूध में कुछ मिला दिया। वही ज़हर। वो ज़हर जो उम्र खाता है। तेरी माँ दो हफ़्ते में सूख गई। डॉक्टर बोले — कमज़ोरी है। गाँव बोला — नज़र लग गई।"

कालू काका रुके। उनका गला भर आया था।

"और तू?" भैरव की आवाज़ में कुछ टूट रहा था। "तू जानता था? और तूने बोला नहीं?"

"मैं तब अखाड़े में नया मज़दूर था," कालू काका ने धीमे से कहा। "मैंने रात को तेरे पिता को कुएँ के पास देखा था। उसके हाथ में वही शीशी थी जो आज तेरे हाथ के कटोरे में है। मैं डर गया, भैरव। मैं चुप रहा। और ये चुप्पी मैंने बीस साल अपने सीने में ढोई है। रोज़ रात। जब भी तेरे पिता को देखता, मेरा दम घुटता था।"

"मेरे पिता…" भैरव ने धीमे से दोहराया, जैसे नाम को ज़ुबान पर रखकर तौल रहा हो।

"तेरे पिता को भी बाद में पता चला कि तेरी माँ ने किसी को कुछ बता दिया है।" कालू काका ने आँखें नीची कीं। "वो किसी को कुछ बता नहीं पाई थी। पर तेरे पिता को शक हो गया। तो वो अपना बोरिया-बिस्तर उठाकर गाँव छोड़कर भाग गया। गाँव वालों ने कहा — देखो, बीवी मर गई तो आदमी भाग गया। पर सच ये था कि वो अपना गुनाह पीछे छोड़कर भागा था।"

मैंने भैरव की तरफ़ देखा। उसका चेहरा अब वो नहीं था जो मैंने अखाड़े में देखा था। वो ऐसे खड़ा था जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली हो।

"फिर भी तूने ये सब किया?" मेरी आवाज़ खुद मेरे कानों में अजीब लगी। मुझे बोलना नहीं चाहिए था, पर निकल गया। "अगर तुझे पता था कि ज़हर क्या करता है, तो तूने वही काम क्यों किया जो तेरे पिता ने किया?"

भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, पर पानी नहीं था। "तू क्या जाने, लड़के।" उसकी आवाज़ कर्कश हो गई। "तू क्या जाने कि जब तेरी माँ को ज़हर दिया जाए और तू देखता रहे बस देखता रहे, तो अंदर क्या बनता है। मैं तब चौदह साल का था। मैंने अपने पिता को अपनी माँ के दूध में कुछ डालते देखा था। एक रात मैंने देखा। और मैं कुछ नहीं बोला। मैं डर गया था।"

कालू काका की आँखों से पानी बह निकला।

"और बाद में जब वो भाग गया, तो मैं अकेला रह गया। माँ की कब्र के साथ। गाँव वाले कहते — बेचारा। पर कोई नहीं जानता था कि बेचारे के अंदर क्या चल रहा है। फिर मैं बड़ा हुआ। मैंने सोचा — जिस दुनिया ने मेरी माँ को मारा, उसी दुनिया को मैं हराऊँगा। जिन लोगों ने मेरी माँ को अकेला छोड़ा, उन्हीं लोगों को मैं झुकाऊँगा।" भैरव की आवाज़ में एक पुरानी आग की गंध आई। "यही ज़हर मेरे पास आया। मेरे पिता की शीशी। किसी तरह मुझे मिली। और मैंने सोचा — अब इसी शीशी से मैं सबका हिसाब लूँगा।"

"तो तूने मासूम पहलवानों को मारा?" मेरी आवाज़ भर्रा गई। "ग्यारह लड़के। उनकी माँएँ आज भी उनकी खाटों को देखती हैं।"

"वो लोग मेरी दुनिया में आए थे," भैरव ने कहा। "उन्होंने मेरी मिट्टी में पैर रखा।"

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