Spirit of a Fighter – Chapter 256
"बस!" वो चिल्लाया। "ये कुश्ती रद्द! ये कोई कुश्ती नहीं है! ये धोखा है! बब्बर, तू अंदर आ जा!"
मैदान में सन्नाटा छा गया। लोगों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। कोई कुछ समझ नहीं रहा था। भैरव का आदमी आया — लुट्टन, जो अब भी घावों पर पट्टी बाँधे खड़ा था — और बब्बर की तरफ़ बढ़ा।
पर बब्बर ने अपना हाथ उठाया और उसे रोक दिया।
"मैं नहीं आ रहा," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "मैं ये लड़ाई लड़ूँगा।"
"बब्बर!" भैरव फिर चिल्लाया। "तेरी बहन —"
और तभी एक आवाज़ आई।
पूरे अखाड़े के ऊपर से। वो आवाज़ किसी दीवार के छेद से नहीं आई। वो आवाज़ ऊँचाई से आई। व्हीलचेयर से।
"जिस अखाड़े की मिट्टी मेरे पसीने से बनी है," रणवीर सिंह की आवाज़ गूँजी, "उसकी कुश्ती रद्द करने का हक़ तुझे किसने दिया, भैरव?"
मैंने सिर उठाया।
वो अखाड़े के फाटक पर खड़े थे। व्हीलचेयर पर। उनका बड़ा शरीर ऐसे बैठा था जैसे कोई पहाड़ बैठा हो। उनके सफ़ेद बाल हवा में हिल रहे थे। उनकी आँखें ऐसी थीं जैसे बीस साल की चुप्पी आज बोलने आई हो।
उनके पीछे मीरा खड़ी थी। उसका हाथ अपने पिता की कुर्सी पर था। उसकी आँखें मुझ पर थीं और उनमें कुछ ऐसा था जो मुझे सीने में महसूस हुआ।
और पूरा अखाड़ा सन्न रह गया। कोई नहीं हिला। कोई नहीं बोला।
दीवार के छेद से भैरव की आवाज़ आई, और इस बार वो आवाज़ पहले जैसी मीठी नहीं थी। वो आवाज़ डर से काँप रही थी।
"रणवीर सिंह," उसने कहा। "तुम… तुम यहाँ क्यों आए हो? तुम्हारी हालत…"
"मेरी हालत तेरे ज़हर से है," रणवीर सिंह ने कहा। "और मैं आज यहाँ इसलिए आया हूँ कि ये मिट्टी मुझसे पूछ रही है — 'तेरा बेटा कहाँ है?'"
उन्होंने अपना हाथ उठाया। उँगली मेरी तरफ़।
"ये मेरा बेटा है," उन्होंने कहा। "जो आज तेरे ज़हर से लड़ रहा है। जिसे तूने अखाड़े के बाहर खड़ा रखा, क्योंकि तू जानता था कि अगर ये अंदर आया, तो तेरा खेल खत्म।"
भैरव हँसा। पर वो हँसी ऐसी थी जैसे किसी बूढ़े ताले में चाबी घूम जाए — बिना तेल, बिना आवाज़ के।
"रणवीर," उसने कहा, "तू बीस साल से चुप बैठा था। आज तू बोलने आया है? तेरे पास सबूत क्या है? तेरे पास क्या है?"
"मेरे पास मेरा बेटा है," रणवीर सिंह ने कहा। "और उसके पास वो है जो तेरे पास कभी नहीं था — सच।"
उन्होंने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया। वो बैठे थे, व्हीलचेयर पर, और उनका हाथ काँप रहा था। पर वो हाथ मेरी तरफ़ बढ़ा था।
मैं उनकी तरफ़ बढ़ा।
और मैदान के बीच में, मिट्टी में, मेरे पैर ऐसे चले जैसे वो मिट्टी खुद मुझे धकेल रही हो। मैंने उनका हाथ पकड़ा।
उनकी पकड़ मज़बूत थी। उम्र से नहीं, बीमारी से नहीं, बीस साल की चुप्पी से मज़बूत।
मैदान में खड़े सब लोग देख रहे थे। कोई पहलवान, कोई मज़दूर, कोई बच्चा, कोई बूढ़ा। सुक्खी बुआ का पान का बीड़ा उसके हाथ से गिर गया। टिंकू की थाली में मिठाई काँप रही थी। माँ दीवार के पास खड़ी थीं, उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी।
भैरव दीवार के छेद से बाहर आया। वो मैदान में आया। उसकी लाल धोती में आज मिट्टी नहीं लगी थी। उसकी सोने की चेन आज ऐसे चमक रही थी जैसे किसी और ही आदमी की हो। वो मेरे सामने आकर खड़ा हुआ।
"वीर सिंह," उसने कहा। "मैं तुझे एक आख़िरी बात बताता हूँ। तू जीत भी गया, तो क्या? तेरे पास क्या रहेगा? ये अखाड़ा? ये मिट्टी? ये सब मेरा है। इन काग़ज़ों में मेरा नाम है।"
"काग़ज़ों में नाम होता है," रणवीर सिंह ने कहा। "मिट्टी में पसीना होता है। और मिट्टी कभी झूठ नहीं बोलती।"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो ठंडक थी जो कुएँ में होती है — गहरी, अंधेरी, और बिना तल की।
"कल सुबह," उसने कहा। "फिर मिलेंगे।"
वो पलटा और चला गया। उसके कदमों की आवाज़ मिट्टी में दब गई। पर उसकी आवाज़ दबी नहीं। वो दीवार के बाहर जाकर भी मेरे कानों में गूँजती रही।
"कल सुबह," मैंने दोहराया। "कल सुबह।"
रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था।
"बेटा," उन्होंने कहा, "आज रात हमें वो अलमारी खोलनी है। कल सुबह तक सबूत सामने होना चाहिए। क्योंकि कल सुबह, अगर भैरव ने एक भी कदम पहले बढ़ाया, तो तेरी माँ, मीरा, गुड़िया — सब खत्म।"
मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा।
"आज रात," मैंने कहा। "अलमारी।"
और तभी मेरी नज़र बब्बर पर पड़ी। वो वहीं खड़ा था, मिट्टी में, अकेला। उसने अपनी कमर से वो थैली निकाली — जिसे मैंने कुचला था — और उसे ज़मीन पर रख दिया। फिर उसने अपना सिर उठाया।
"वीर सिंह," उसने कहा। "मैं तेरे साथ चलूँगा।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि मेरी बहन उस कुएँ में है," उसने कहा। "और अगर मैं आज रात नहीं गया, तो कल सुबह मेरी बहन उसी कुएँ में सड़ेगी। और मैं ये नहीं चाहता।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब वो डर नहीं था। अब वहाँ कुछ और था — शायद वो चीज़ जो आदमी को अपनी मौत से लड़ने की ताकत देती है।
"ठीक है," मैंने कहा। "आज रात।"
मैंने अपनी मुट्ठी खोली, और उसमें गुड़िया का लाल धागा था। वो थोड़ा लाल-काला हो गया था, पर बँधा हुआ था।
आज रात मैं वो अलमारी खोलूँगा — जिसकी चाबी भैरव की मुट्ठी में है, और जिसके पीछे बीस साल का सच छिपा है। और अगर मैंने आज रात वो अलमारी नहीं खोली, तो कल सुबह वो मुझे खोल देगा — जैसे उसने लुट्टन को खोला, श्यामू को खोला, और मेरे दोनों पापाओं को खोला था।
मैंने लाल धागे को अपनी कलाई पर कसकर बाँध लिया।
॥
मैंने लाल धागे को कसकर बाँध लिया, और उसी वक़्त रणवीर सिंह की आवाज़ मैदान में गूँजी।
"ठहरो।"
एक शब्द। बस एक शब्द। पर वो शब्द ऐसे गिरा जैसे सूखी मिट्टी पर पानी की पहली बूँद।
भैरव के कदम रुक गए। वो पलटा, धीरे-धीरे, जैसे किसी ने उसकी धोती की गाँठ पकड़ ली हो।
मीरा पहले से ही अपने पिता की व्हीलचेयर धकेलकर मैदान के किनारे तक आ रही थी। पहियों की आवाज़ मिट्टी पर दबी-दबी आ रही थी। रणवीर सिंह का शरीर कुर्सी में धँसा हुआ था, पर उनकी गर्दन सीधी थी। आँखें मैदान के बीचोंबीच।
"मैं बीस साल से चुप था," उन्होंने कहा। आवाज़ कमज़ोर थी, साँस के बीच से निकल रही थी, पर हर शब्द साफ़ था जैसे कोई पत्थर पर लिख रहा हो। "आज नहीं रहूँगा। ये कुश्ती पूरी होगी।"
भैरव के चेहरे पर मुस्कान आई। वो मीठी मुस्कान, जो गुड़ की तरह दिखती है और कुएँ की तरह ठंडी होती है।
"चाचा जी," उसने कहा, आवाज़ में वो नरमी डालकर जो वो हर किसी के लिए रखता था। "आपकी तबीयत…"
"मेरी तबीयत का हिसाब तू मत रख, भैरव।"
मैदान में सन्नाटा छा गया। सुक्खी बुआ ने अपना पान वापस मुँह में रख लिया, पर उनकी आँखें फटी रह गईं। टिंकू की थाली अब भी काँप रही थी।
"तू मेरा भतीजा है," रणवीर सिंह ने कहा। "पर मेरी मिट्टी का मालिक नहीं।"
भीड़ में फुसफुसाहट उठी। मैंने देखा — एक पहलवान ने दूसरे की तरफ़ देखा। एक बूढ़े मज़दूर ने अपना मुँह ढक लिया। कालू काका दीवार के पास खड़े थे और उनके हाथ मिट्टी में गड़े हुए थे, बिलकुल उस वक़्त जैसे जब दीवार के नीचे से उन्होंने मुझे आवाज़ दी थी।
भतीजा। भैरव — रणवीर सिंह का भतीजा।
मेरे दिमाग़ में वो काग़ज़ घूम गया जो मुझे तहखाने में मिला था। रघुवीर की तस्वीर के पीछे लिखा था — भैरव उसका भाई है। अब समझ आ रहा था। भाई का बेटा। भतीजा।
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