Spirit of a Fighter255 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 255

7 min read November 5, 2026

वो दाहिने हाथ से मेरी गर्दन पकड़ने झपटा। मैंने हवा सूँघी। उसकी साँस में वो कड़वाहट पहले से ज़्यादा तेज़ थी। कनेर की जड़। मैं झुक गया, और उसका हाथ मेरे सिर के ऊपर से निकल गया। मैं पलटा, उसकी कमर के पीछे आया, और एक हल्का-सा धक्का दिया। वो लड़खड़ाया। पर गिरा नहीं। भई, ये बब्बर था। इस शरीर को ज़हर खा रहा था और ये शरीर अभी भी खड़ा था। ये आदमी अगर ज़हर न पीता, तो शायद मैं आज यहाँ खड़ा नहीं होता।

वो सीधा हुआ। उसने अपनी मुँह से थूक फेंका — लाल रंग का। मेरे पेट में एक झटका लगा। ये ज़हर अब उसके मुँह तक आ गया था।

"तेरी बातें बंद कर," वो बोला। "मैं तेरे जैसा नहीं हूँ जो सहानुभूति माँगे। मैं लड़ूँगा।"

"मैं सहानुभूति नहीं दे रहा," मैंने कहा। "मैं तुझे बचा रहा हूँ। फर्क है दोनों में।"

वो फिर झपटा। इस बार उसने मेरी कमर पकड़नी चाही। मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसकी उँगलियों को अपनी कलाई पर महसूस किया। उसकी उँगलियाँ पहले से ज़्यादा ठंडी थीं। ज़हर उसे अंदर से ठंडा कर रहा था।

मैंने उसकी कलाई नहीं छोड़ी। मैंने उसे घुमाया। वो घूमा। पर वो गिरा नहीं। उसने अपना पैर जमाया। और हम दोनों वहीं जमे रहे — दो आदमी, एक-दूसरे की कलाई थामे, मिट्टी में धँसे पैर, और बीच में सिर्फ़ साँस की आवाज़।

भीड़ में सन्नाटा था। ऐसा सन्नाटा जिसे चीरने के लिए कोई चीख भी काफ़ी नहीं थी।

तभी सुक्खी बुआ की आवाज़ आई। वो आवाज़ जो किसी भी सन्नाटे को चीरने के लिए बनी है।

"अरे मैंने तो सुना है," वो चिल्लाई, "कि आज बब्बर का तेल खत्म हो गया!"

टिंकू झट से बोला, "बुआ, तेल नहीं, पानी!"

और भीड़ में हँसी फूट पड़ी। एक पल के लिए मैं भूल गया कि मैं एक कुश्ती लड़ रहा हूँ। एक पल के लिए वो सिर्फ़ गाँव का मेला लगा। पर फिर सबकी नज़रें भैरव की तरफ़ गईं। वो दीवार के छेद के पास खड़ा था। उसका जबड़ा कसा हुआ था। उसकी मूँछें हिल रही थीं, पर हँसी नहीं। उसके हाथ की उँगलियाँ दीवार पर ऐसे दबी थीं जैसे पत्थर को पकड़कर कुछ कुचलना चाह रही हों।

"बब्बर!" वो फिर चिल्लाया। "आख़िरी बात। अगर तू हारा, तो चंदा को मैं उस कुएँ में डालूँगा जहाँ रामदीन सड़ रहा है।"

बब्बर की कलाई मेरे हाथ में थी, और मैंने महसूस किया — उसकी नब्ज़ एक झटके में तेज़ हो गई। उसका सारा शरीर जैसे एक झटके में फिर तन गया।

चंदा। उसकी बहन। वो लड़की जिसके लिए वो ज़हर पी रहा था। वो लड़की जिसके लिए वो अपने दुश्मन का गुलाम बना था।

मेरा गला सूख गया। मैंने उसकी कलाई छोड़ दी और एक कदम पीछे हटा।

"बब्बर," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपनी नहीं लगी। "बब्बर, सुन। अगर तू हार भी जाए, तो मैं चंदा को बचाऊँगा। मेरी कसम।"

वो रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब वो ठंडक नहीं थी। अब वहाँ कुछ और था — शायद उम्मीद। और उम्मीद की आँखें सबसे ज़्यादा डरावनी होती हैं, भई। क्योंकि अगर उम्मीद टूटे, तो आदमी पागल हो जाता है।

"कैसे?" उसने कहा। "तू क्या है? तू कौन है? तू एक मज़दूर है, जो अखाड़े के बाहर खड़ा रहता था। भैरव के पास पूरा गाँव है। पूरा शहर है। पुलिस है। तेरे पास क्या है?"

मैंने अपनी कलाई उठाई। उसपर गुड़िया का लाल धागा था।

"ये," मैंने कहा। "मेरी माँ है। मेरी बहन है। टिंकू है। मीरा है। कालू काका हैं। और एक बात है — मेरी नाक है।"

उसने कुछ समझा नहीं। पर उसने देखा कि मैं कुछ समझा रहा हूँ जो वो नहीं समझ रहा। उसका चेहरा कसा।

"तुझे ज़हर दिया गया है," मैंने कहा। "और मुझे उसकी गंध पता है। मुझे तेरे शरीर के अंदर जलते हुए ज़हर की गंध आ रही है। तू सिर्फ़ ये जानता है कि तू कमज़ोर हो रहा है। मैं जानता हूँ कि तुझे कब और कैसे रोकना है।"

वो हिल गया। उसने अपना हाथ अपने सीने पर रखा। पर फिर उसकी आँखें फिर ठंडी हो गईं। "भैरव साहब ने कहा था — तू जादूगर है। तेरी नाक में कोई जादू है।"

"जादू नहीं," मैंने कहा। "भूख। मैंने अपनी माँ की चक्की पर पंद्रह साल बिताए हैं। मैंने तेरे जैसे शरीरों को मिट्टी में गिरते देखा है। मैं वो गंध पहचानता हूँ जो आदमी को अंदर से खोखला करती है।"

वो फिर झपटा। इस बार अपनी बहन के नाम पर। इस बार उसकी आँखों में सिर्फ़ डर नहीं, गुस्सा भी था। वो गुस्सा जो आदमी अपनी मजबूरी पर करता है। और मुझे पता था कि ये गुस्सा किसी और के लिए नहीं, खुद के लिए है।

उसका हाथ मेरी गर्दन पर आया। उसने पकड़ा। मेरी साँस रुकी।

और उसी पल, मेरी नाक में वो बात आई जो मैं ढूँढ रहा था। उसकी साँस में एक नई गंध थी। धुएँ की। जली हुई मिट्टी की। और उसके पीछे — एक और गंध। मीठी। गुड़ जैसी।

गुड़।

मुझे चक्कर आया। भैरव के ज़हर में कनेर की जड़ है, ये मीरा ने कहा था। कनेर का ज़हर कड़वा होता है। पर मीठी गंध कहाँ से आई?

और तभी मुझे याद आया — बुधिया। रणवीर सिंह की बातें। तहखाने की मिट्टी। और वो सूखा कनेर का फूल।

मैंने बब्बर की कलाई पकड़ी और उसे उल्टा घुमाया। वो चकराया। मैंने उसके कान के पास कहा, "तेरी पीठ पर कोई दाँव है जो तुझे ज़हर से बचा रहा है। क्या है वो?"

उसकी आँखें फैल गईं।

"तेरे पास कोई शीशी है?" मैंने कहा। "भैरव ने तुझे कुछ और भी दिया है?"

वो कुछ नहीं बोला। पर उसका हाथ अपनी कमर पर गया। उसकी कमर पर एक छोटी थैली थी। कपड़े की। वो उसे पकड़े रहा। मुझे समझ आ गया।

"वो थैली?" मैंने कहा। "वो क्या है?"

"भैरव साहब ने दी थी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "कहा था — जब लड़ाई में जीतने वाला हो, तब सूँघ लेना। अगर लड़ाई भारी हो, तो एक बार सूँघ लेना। कहा था ये नाक की ताकत है।"

मेरा खून ठंडा हो गया।

"सूँघा कब?" मैंने कहा। "आज?"

"सुबह," उसने कहा। "एक बार। मैदान में उतरने से पहले।"

मैंने उसकी थैली खींची। वो मेरा हाथ रोकता रहा, पर मेरी पकड़ मज़बूत थी। थैली खोली। अंदर सूखी जड़ें थीं, और उन पर एक पतली-सी राख थी। मैंने उसे सूँघा।

कनेर की जड़। सूखी। जलाई हुई। और उसके ऊपर छिड़का हुआ गुड़।

मेरी आँखें भरी आईं।

"बब्बर," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी। "तू अपने मुँह से ज़हर सूँघ रहा था। जानकर नहीं। भैरव ने तुझे बताया कि ये नाक की ताकत है। पर ये वही ज़हर है जो वो तेरी पीठ पर लगाता है। बस सूखा। और तू इसे अपने फेफड़ों तक ले गया।"

वो पत्थर की तरह जम गया।

"तो मैं…" उसने कहा, और उसकी आवाज़ बच्चे जैसी हो गई। "तो मैं अपने हाथों से अपनी मौत को बुला रहा था?"

मैंने उसका कंधा पकड़ा। "अब नहीं," मैंने कहा। "अब तू उसे नहीं सूँघेगा।"

मैंने वो थैली उसके हाथ से छीनी और मुट्ठी में कुचल दी।

वो फूट पड़ा। आँसुओं से नहीं — नहीं, वो रोया नहीं। पर उसका चेहरा ऐसे टूटा जैसे कोई बाँध टूटे। और उसने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा, और मैंने उसका हाथ पकड़ा, और हम दोनों वहीं खड़े रहे, मिट्टी में, और कोई कुछ नहीं बोला।

भीड़ में से किसी ने कहा, "अरे, कुश्ती क्या हो रही है?"

भैरव दीवार के छेद से चिल्लाया, और अब उसकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी। अब सिर्फ़ गुस्सा था, और गुस्सा भी ऐसा जिसे छुपाने की ज़रूरत महसूस हो रही हो।

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