Spirit of a Fighter – Chapter 254
"मीरा," मैंने कहा, "भैरव अभी यहाँ था। उसने कहा कि तेरी दवा में ज़हर है।"
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने पुड़िया को अपनी हथेली पर रखा, उसे सूँघा, और फिर उसकी आँखों में वो डर आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा।
"नहीं," उसने धीरे से कहा। "मैंने इसे खुद बनाया था। मैं जानती हूँ कि मैंने क्या पीसा।"
"तो फिर वो झूठ बोल रहा है?"
"या फिर —" उसने माँ की तरफ़ देखा, "वो सच बोल रहा है, और मेरी जड़ किसी ने बदल दी है।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनकी छाती धीरे-धीरे उठ-गिर रही थी। उनके होंठ हिल रहे थे, जैसे कोई दुआ।
"मीरा," मैंने कहा, "अगर ये ज़हर है, तो हमें क्या करना चाहिए?"
वो एक पल चुप रही। फिर उसने पुड़िया को फ़र्श पर गिरा दिया, अपनी एड़ी से उसे कुचल दिया, और अपनी जेब से एक और पुड़िया निकाली — छोटी, नीली।
"ये मेरी असली दवा है," उसने कहा। "जो मैंने घर से लाई थी, अखाड़े के लिए नहीं। सिर्फ़ अपने लिए।" उसने माँ के होंठों पर रखी। "माँ, इसे चूसो। धीरे-धीरे।"
माँ ने आँखें खोलीं। उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा, और फिर मेरी तरफ़।
"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा।
"कुछ नहीं माँ," मैंने कहा। "तू आराम कर।"
पर माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। "वीर," उन्होंने कहा, "मैंने तुझे कहा था ना — भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है। आज मैंने तीन दिन से कुछ नहीं खाया। तो आज मेरी दुआ सबसे ऊपर है।"
वो मुस्कुराईं। और उनकी मुस्कान में वो सब था जो किसी चक्की में नहीं पिसता।
"कल तू जीतेगा," उन्होंने कहा। "मैं जानती हूँ। क्योंकि आज रात भैरव ने जो किया, वो डर से किया। और जो डरता है, वो हारता है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर उसके होंठ मुस्कुरा रहे थे।
"माँ," उसने कहा, "तुम अद्भुत हो।"
"नहीं," माँ ने कहा। "मैं बस एक माँ हूँ। और माँ होना ही अद्भुत है।"
रात खत्म हो रही थी। पूरब में राख जैसी रोशनी फैल रही थी।
मैं आँगन में आया। टिंकू दरवाज़े के बाहर ज़मीन पर सो रहा था, उसका एक हाथ थाली पर था, और मुँह में खीर की आख़िरी चुटकी। गुड़िया माँ के पैरों के पास सो रही थी, उसकी कॉपी उसके सीने से चिपकी थी। कालू काका दीवार से टेक लगाए बैठे थे, आँखें बंद, होंठ हिल रहे थे।
मैंने टूटी घड़ी उठाई। उसकी सुइयाँ जाम थीं — तीन बजकर सैंतालीस मिनट।
मैंने उसे अपने सीने से लगाया।
सूरज निकलते ही मैदान भर गया। मिट्टी पर पानी का छींटा पड़ा था, और उसकी गंध में कुछ अलग था — जैसे मिट्टी नहीं, कोई बीमार चीज़ सूख रही हो।
बब्बर आया। उसका शरीर तेल से चमक रहा था, पर उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे। वो मुझे देखकर हँसा, पर हँसी में वो बात नहीं थी जो पहले थी।
"डर गया?" उसने कहा।
"तेरे जैसा नहीं," मैंने कहा।
वो झपटा। पहला दाँव — मैं बचा। दूसरा — मैं फिसला, उसका हाथ मेरे कंधे पर पड़ा और जल गया। तीसरा — उसने मेरी कमर पकड़नी चाही, पर मैं झुक गया।
भीड़ में "वाह" उठी। पर मैं कुछ और सुन रहा था। उसकी साँस। हर दाँव के बाद वो एक पल के लिए रुकता था — जैसे उसके अंदर कोई चीज़ उसे खींच रही हो।
नीम के नीचे से माँ दीवार के पास आ गई थीं। उनके हाथ जुड़े थे, होंठ हिल रहे थे। टिंकू मिठाई की थाली पकड़े ऐसे खड़ा था जैसे खुद कुश्ती लड़ रहा हो, और गुड़िया उसका हाथ खींचकर कह रही थी, "टिंकू भैया, थाली गिरा दोगे!"
फिर बब्बर ने मेरा हाथ मरोड़ा। दर्द आँखों तक चला गया और मैंने आँखें बंद कर लीं। उसी पल मुझे अपनी कलाई पर कुछ दिखा — गुड़िया का बँधा लाल धागा, जो कल रात उसने चुपचाप बाँध दिया था, और मैंने उसे हटाया भी नहीं।
धागा धीरे-धीरे फैलता लगा, जैसे गुड़िया का छोटा हाथ मेरी कलाई पकड़े खींच रहा हो — "भैया, उठो।"
मैं दाँव से निकल आया।
भैरव बाहर से चिल्लाया, "बब्बर, अब!"
बब्बर ने अपनी पूरी ताकत से मेरी छाती पर घुटना मारने के लिए झपटा। मैं झुक गया। उसका घुटना हवा में गया — और उसी पल हवा मेरे नाक से टकराई।
वो कड़वी बू अब और तेज़ थी। जैसे उसके अंदर कुछ जल रहा हो, धीरे-धीरे, राख बनकर।
मैं रुक गया। भीड़ चुप हो गई। मैंने बब्बर को देखा — उसकी आँखों में अब गुस्सा नहीं था। डर था। वो डर जो इंसान को रात में अकेले आईने के सामने दिखता है।
"तू बीमार है, बब्बर," मैंने धीरे से कहा। "ये कुश्ती नहीं, तेरा ज़हर निकल रहा है।"
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"तू बीमार है, बब्बर," मैंने धीरे से कहा। "ये कुश्ती नहीं, तेरा ज़हर निकल रहा है।"
वो रुक गया। एक पल। बस एक पल। पर उस एक पल में मैंने उसकी आँखों में सब देख लिया। उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी। उसका हाथ मेरे कंधे पर था और उसकी उँगलियाँ मेरी त्वचा को पकड़े हुए थीं, और वो उँगलियाँ काँप रही थीं। काँप रही थीं, भई। एक पहलवान की उँगलियाँ जो अभी मेरे कंधे को पीसने वाली थीं, अब काँप रही थीं।
"क्या बक रहा है?" उसने कहा। पर आवाज़ में वो गरज नहीं थी। आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी सूखे कुएँ से पानी माँगा जा रहा हो।
"तू खुद जानता है," मैंने कहा। "सुबह उठता है तो मुँह में कड़वाहट? रात को पसीना? और कलाई, देख अपनी कलाई —"
वो अपनी कलाई की तरफ़ देखने लगा। मैंने भी देखा। उसकी नसें नीली-काली होकर ऐसे उभरी थीं जैसे नदी की धारा बाहर निकल आई हो।
और उसी पल बाहर से भैरव की आवाज़ आई। दीवार के छेद से, ऐसे आई जैसे किसी अन्धे कुएँ से निकल रही हो।
"लड़! वरना कल तेरे घर का चूल्हा ठंडा होगा!"
बब्बर का पूरा शरीर एक झटके में सीधा हो गया। जैसे किसी ने उसकी रीढ़ में तार खींच दिया हो। उसकी आँखों में जो पल भर के लिए नरमी आई थी, वो गायब हो गई। उसकी जगह वो वापस आ गया — वो ठंडा, सख्त, मजबूर आदमी। मजबूरी की ठंडक। मैंने वो ठंडक लुट्टन की आँखों में भी देखी थी। और श्यामू की आँखों में भी। और आज, बब्बर की आँखों में।
मेरे अंदर कुछ पिघल गया। ये दुश्मन नहीं था। ये भी उसी जाल में फँसा एक मछली थी, जो अपनी ही मौत की तरफ़ तैर रही थी और समझ रही थी कि ये जीत है।
मैंने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया। भीड़ में से कोई चिल्लाया — "अरे, क्या कर रहा है?"
मैंने बब्बर की आँखों में देखा और बहुत धीरे कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ वो सुन सके, और मेरे होंठ सिर्फ़ उसके कान तक पहुँचे।
"मैं तुझे हराऊँगा, बब्बर। पर तेरा ज़हर नहीं पिलाऊँगा। जब तेरा शरीर टूटेगा, तो मैं उसे जोड़ने में मदद करूँगा। ये मेरा वादा है।"
उसका चेहरा बदल गया। कैसे बदला, मैं नहीं बता सकता। ऐसे बदला जैसे किसी पुराने पत्थर पर बारिश पड़े और उस पर धूल की एक परत बह जाए। उसके होंठ खुले रह गए। उसने कुछ कहना चाहा, फिर चुप हो गया। उसकी आँखों में पानी नहीं आया — नहीं, ऐसा मत समझो — पर उसकी आँखों के भीतर कुछ हिल गया था। जो आदमी तीस साल से सिर्फ़ मारना जानता हो, उसे कोई "मदद" का शब्द सुनाए, तो उसके भीतर कुछ हिलता है।
भैरव फिर चिल्लाया। "बब्बर! सुनता है? लड़!"
और बब्बर लड़ा।
पर अब वो लड़ाई नहीं थी। अब वो दो आदमियों की लड़ाई नहीं थी। अब वो एक आदमी की लड़ाई थी — खुद से। बब्बर अपनी पूरी ताकत से मुझ पर झपटा, और मैं बचता गया। उसके दाँव भारी थे, तेज़ थे, पर उनमें वो बात नहीं थी जो सुबह थी। सुबह उसके दाँव में भूख थी, मारने की भूख। अब उसके दाँव में सिर्फ़ डर था। और डर से लड़ा हुआ दाँव कभी सीधा नहीं लगता।
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