Spirit of a Fighter253 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 253

7 min read November 5, 2026

"सुन," उन्होंने कहा। "अंदर जो मैंने देखा, वो तुझे बताना ज़रूरी है। भैरव ने तहखाने की मिट्टी उबाली है, पर उसमें एक चीज़ मिलाई है। कनेर की जड़, धतूरा, और —" उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा, "तेरे पापा की राख।"

मेरा पूरा शरीर ठंडा हो गया।

"क्या?"

"रघुवीर की राख। वो उसे जलाकर मिट्टी में मिला रहा है। वो कह रहा था — 'तेरा बेटा जिस मिट्टी से लड़ेगा, वो मिट्टी उसके पापा को जला रही है।'"

मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने अपनी मुट्ठियाँ कसीं। "तो कल मैं उसी मिट्टी में लड़ूँगा?"

"नहीं।" कालू काका ने मेरा कंधा पकड़ा। "तू उस मिट्टी में लड़ेगा जो मैंने तैयार की है। अखाड़े की पुरानी परत। वो मिट्टी तेरे पापा ने खुद सींची थी। भैरव उसे जानता नहीं। वो समझता है कि उसने पूरी मिट्टी बदल दी है। पर मैंने नीचे की परत बचा ली थी।"

"कैसे?"

"क्योंकि मैं बीस साल से उसी परत के नीचे छिपा बैठा था," उन्होंने कहा। "और तेरे पापा ने मुझसे एक बात कही थी, मरने से पहले — 'कालू, जिस दिन मेरा बेटा अखाड़े में उतरे, उसे उसी मिट्टी में उतारना जिसमें मैंने पहली बार पसीना बहाया था।'"

मेरी आँखें भर आईं।

"तो कल," कालू काका ने कहा, "तू उसी मिट्टी में लड़ेगा। और उस मिट्टी में तेरे पापा का पसीना है, तेरे पापा का दर्द है, और तेरे पापा की दुआ है। भैरव की राख उस मिट्टी को नहीं छू सकती।"

उन्होंने अपनी जेब से कुछ निकाला — छोटी-सी लाल मिट्टी की गोली, जो उन्होंने कभी मुझे दी थी, और अब वो टूटी हुई थी।

"ये तेरे पापा की मिट्टी है," उन्होंने कहा। "मैंने इसे बीस साल अपने पास रखा। अब तेरे पास रखता हूँ। कल इसकी एक चुटकी अपने माथे पर लगाना। और जब भैरव तुझे डराए, तो इसे अपनी जेब में रखना। ये मिट्टी तेरे पापा का साथ देगी।"

मैंने वो टूटी गोली अपने हाथ में ली। वो हल्की थी, पर जैसे पूरे रामपुर का बोझ उसमें भरा हो।

"काका," मैंने कहा, "आज रात जो आवाज़ आई — कुएँ से, तहखाने से — वो किसकी थी?"

कालू काका ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने अपनी दाढ़ी नोची, जैसे कोई पुराना राज़ मुँह तक आ रहा हो और फिर वापस चला जा रहा हो।

"वो आवाज़ रामदीन की है," उन्होंने कहा। "तेरे पापा का दोस्त। पर —"

"पर?"

"पर आज वो आवाज़ तहखाने से आई। रामदीन कुएँ में बंद है। वो तहखाने में कैसे पहुँचा?"

वो चुप हो गए। और मैं समझ गया कि सवाल का जवाब उनके पास भी नहीं था।

"कल सुबह," मैंने कहा। "कुश्ती के पहले, मैं रामदीन से बात करूँगा।"

"कर लेना," कालू काका ने कहा। "पर पहले उस आवाज़ का मतलब समझना। क्योंकि जो आवाज़ कुएँ से तहखाने पहुँची, वो किसी रास्ते से गई है। और अगर वहाँ कोई रास्ता है, तो —"

"तो भैरव के पास भी है," मैंने कहा।

कालू काका ने सिर हिलाया। "इसीलिए कह रहा हूँ — कल सिर्फ़ कुश्ती नहीं है। कल एक रास्ता खुलेगा। और उस रास्ते पर या तो तू होगा, या वो।"

अंदर से मीरा की आवाज़ आई। "वीर! आ जा! माँ जाग रही है!"

मैं दौड़कर अंदर गया।

माँ खाट पर बैठी थीं। उनका चेहरा अब भी पीला था, पर उनकी आँखों में वो चमक लौट आई थी जो मैंने पहली बार देखी थी — जब मैंने उनके हाथों से चक्की का आटा लिया था और कहा था, "माँ, मैं पहलवान बनूँगा।"

"आ," उन्होंने कहा।

मैं उनके पास बैठ गया।

"सुन," उन्होंने कहा। "मैं जानती हूँ कि मेरे अंदर ज़हर है। और मैं जानती हूँ कि तू कल उससे लड़ेगा जिसने ये ज़हर मुझमें डाला है। पर मैं तुझे एक बात कहने आई हूँ —"

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी पकड़ कमज़ोर थी, पर उसमें वो शक्ति थी जो चक्की चलाने से आती है।

"कल तू मुझे बचाने के लिए मत लड़ना।"

"माँ —"

"चुप। सुन।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "अगर तू मुझे बचाने के लिए लड़ेगा, तो तेरा दिल मैदान में नहीं होगा। तेरा दिल खाट पर होगा, मेरे पास। और जो पहलवान अपने दिल से नहीं लड़ता, वो हारता है।"

"तो मैं किसके लिए लड़ूँ?"

"अपनी मिट्टी के लिए," उन्होंने कहा। "उस मिट्टी के लिए जिसमें तेरे पापा का पसीना है। उस मिट्टी के लिए जिसमें सुबह गुड़िया की रोटी पकती है। उस मिट्टी के लिए जिसमें टिंकू की मिठाई की खुशबू है। और —" उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा, जो दरवाज़े पर खड़ी थी, "उस लड़की के लिए जिसने आज रात मेरे होंठों पर सोंठ रखी।"

मीरा ने नीचे देखा, पर उसके गाल लाल हो गए।

"माँ," मैंने कहा, "मैं —"

"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "मैं अंधी नहीं हूँ। मैंने देखा है तेरे हाथ कैसे उसकी तरफ़ जाते हैं। और मैंने देखा है कि वो तेरी तरफ़ देखती है जब तू नहीं देख रहा होता।"

"माँ, अभी वक़्त नहीं है —"

"वक़्त नहीं है, इसीलिए बता रही हूँ।" उनकी आवाज़ कड़क हुई। "क्योंकि कल कोई भी किसी के भी साथ हो सकता है। और जो दिल में है, वो मुँह से कह देना चाहिए।"

वो फिर लेट गईं। "अब जाओ। सो जाओ। सुबह तुझे लड़ना है, और मुझे तेरी जीत देखनी है।"

मैं उठा। दरवाज़े पर मीरा खड़ी थी।

"मैं बाहर हूँ," उसने कहा। "माँ के साथ। तू सो जा।"

"तू सो जा," मैंने कहा। "तू ज़्यादा थकी है।"

"मैं आयुर्वेद वाली हूँ," उसने कहा। "मुझे पता है कि कब सोना है और कब नहीं।"

मैं हँसा। पहली बार उस रात में हँसा। "तू हर बात में जीत जाती है।"

"क्योंकि मैं सही होती हूँ।" उसने मुस्कुराकर कहा।

मैं बाहर आया। आँगन में चाँद अब बादलों से निकल आया था, और उसकी रोशनी में टूटी घड़ी की सुइयाँ चमक रही थीं। मैंने उसे उठाया और अपने सीने से लगाया।

"कल," मैंने धीरे से कहा, "मैं तुझे चलती हुई लौटाऊँगा। मीरा से वादा किया है।"

और फिर मैंने आसमान की तरफ़ देखा। बादल फट रहे थे, और चाँद पूरा निकल आया था।

तभी मेरी नाक में कुछ आया। तेज़, तीखा, और बिलकुल अलग। जैसे किसी ने आग में गीली लकड़ी डाल दी हो।

मैं पलटा।

घर के पीछे, चक्की के पास, एक परछाई खड़ी थी।

और उस परछाई के हाथ में एक जलती लालटेन थी — जो बुझी हुई थी, पर उसके शीशे पर धुआँ था, जैसे अभी-अभी बुझाई गई हो।

मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।

परछाई नहीं हिली।

"कौन है?" मैंने कहा।

कोई जवाब नहीं आया।

फिर उस परछाई ने अपना हाथ उठाया — और मेरी तरफ़ इशारा किया।

और तभी मैंने सुना — बहुत धीमी, बहुत साफ़ आवाज़, जैसे कोई मेरे कान के पास खड़ा फुसफुसा रहा हो।

"कल सुबह," वो आवाज़ बोली, "मैं मैदान में तेरे सामने खड़ा होऊँगा। पर उससे पहले — तेरी माँ की दवा, जो मीरा ने दी है, वो उसे और ज़हर दे रही है। तेरी लड़की ने जो पत्तियाँ पीसी हैं, वो कनेर की जड़ से बनी हैं। और कनेर की जड़ — मेरी है।"

मेरी साँस रुक गई।

"अगर तू कल जीतना चाहता है," वो आवाज़ बोली, "तो तेरी माँ को आज रात मरने दे। क्योंकि जो मर जाता है, वो मेरा नहीं रहता।"

परछाई गायब हो गई। लालटेन की जगह सिर्फ़ धुआँ बचा था, जो हवा में घुल गया।

मैं दौड़कर अंदर गया। "मीरा!"

वो माँ के पास बैठी थी, और उसके हाथ में पुड़िया थी — वही पुड़िया जो उसने माँ को दी थी।

"मीरा," मैंने कहा, "ये पुड़िया किस चीज़ से बनी है?"

"सोंठ, काली मिर्च, और —" उसने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "एक जड़। कनेर की सूखी जड़। मेरे पास यही थी।"

मैंने उसका हाथ पकड़ा। "वो जड़ तुझे किसने दी?"

"मैंने खुद तैयार की थी।" उसकी आवाज़ में घबराहट आई। "क्यों? क्या हुआ?"

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