Spirit of a Fighter – Chapter 252
"काका —"
"समझा?"
"समझा," मैंने कहा, पर मेरी आवाज़ में वो बात नहीं थी।
कालू काका नीचे उतर गए।
मैं दीवार से चिपककर खड़ा रहा। मेरी नाक अंदर की हवा चूस रही थी — कनेर की कड़वाहट, जली मिट्टी की गंध, और उसके नीचे कुछ और। कुछ जो मैंने पहले नहीं सूंघा था। कुछ जो गीली राख जैसा था, और उसमें किसी का पसीना घुला था। इंसान का पसीना।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो दीवार से चिपकी खड़ी थी, डिब्बा उसके सीने से लगा था, और उसके होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे। मुझे लगा वो कोई दुआ पढ़ रही है। पर फिर मैंने सुना — वो गिन रही थी।
"एक… दो… तीन…"
वो मिनट गिन रही थी।
और मैं वहीं खड़ा, अपनी माँ के लिए, अपनी मिट्टी के लिए, अपने पूरे रामपुर के लिए, एक ऐसी आग के सामने खड़ा था जो मेरी नाक में जल रही थी और मेरे दिल में ठंडी उतर रही थी।
तभी मुझे आवाज़ आई। बहुत धीमी, बहुत दूर से, जैसे ज़मीन के अंदर से कोई सुर बह रहा हो।
वो सुर मैंने अपने सीने में महसूस किया था, कई रात पहले। वही सुर था। पर अब उसमें शब्द थे।
"वीर सिंह…"
मेरा पूरा शरीर सख्त हो गया।
"…तेरी माँ साँस ले रही है। जल्दी आ।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या हुआ?"
"तूने सुना?"
"क्या?"
मैंने सिर हिलाया। "कुछ नहीं।"
पर मैंने सुना था। और मैं जानता था कि ये आवाज़ किसकी है। ये वही आवाज़ थी जो कुएँ से आई थी। जिसने मुझे नाम से बुलाया था।
दस मिनट बीते। पंद्रह। बीस।
मेरे हाथ ठंडे पड़ रहे थे, और मेरी नाक में वो कड़वाहट अब इतनी तेज़ हो गई थी कि मेरी आँखों में पानी आ रहा था।
फिर दरवाज़े के मुँह से आवाज़ आई — कुछ गिरने की, और फिर कालू काका की खाँसी।
मैं दौड़कर पास गया। कालू काका ऊपर आ रहे थे, और उनके कंधे पर एक हाथ था। माँ का हाथ।
मैंने उन्हें खींचकर बाहर निकाला। माँ की आँखें बंद थीं, उनके होंठ सफ़ेद पड़ गए थे, और उनकी साँस कभी चल रही थी, कभी रुक रही थी।
"मीरा!" मैंने चीखा।
वो पहले से दौड़ रही थी। उसने अपना कुर्ता का पल्लू फाड़ा, पानी में भिगोया, और माँ के मुँह पर रख दिया। फिर जेब से एक छोटी पुड़िया निकाली — सोंठ और काली मिर्च — और उसकी चुटकी माँ के होंठों के नीचे रख दी।
"साँस," मीरा ने कहा। "माँ, साँस लो। ज़ोर लगाओ।"
माँ की छाती उठी। फिर गिरी। फिर उठी।
"हाँ," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में कंपन था, पर उसके हाथ स्थिर थे। "ऐसे ही। धीरे-धीरे।"
कालू काका ज़मीन पर बैठ गए और अपना सिर पकड़ लिया। "वहाँ अंदर," उन्होंने कहा, "वो एक बड़ी देगची में मिट्टी उबाल रहा था। और उसके पास — माँ बंधी थी। मैंने उसके हाथ खोले, पर तभी वो आ गया। वो दरवाज़े पर खड़ा था। उसने मुझे देखा, और कुछ नहीं कहा। बस हँसा। और बोला — 'ले जा। मुझे तो यही चाहिए था।'"
मेरा खून ठंडा हो गया।
"उसने माँ को जाने दिया?" मैंने पूछा।
"हाँ। उसने कहा — 'अब वो ज़हर उसके अंदर है। जो मैंने बीस साल से तैयार किया। वो छह महीने में मरेगी। और तू उसे बचाने के लिए जो भी करेगा, वो सब उसी ज़हर को तेज़ करेगा।'"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर पसीना था, और उनके होंठ हिल रहे थे। मैंने कान पास लगाया।
"वीर…" उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई सूखी नदी बहने की कोशिश कर रही हो। "…मेरी चक्की… ठीक है ना?"
मेरी आँखों में पानी आ गया। इस वक़्त भी उन्हें चक्की की फ़िक्र थी।
"ठीक है माँ," मैंने कहा। "सब ठीक है। तू आराम कर।"
"नहीं।" उन्होंने आँखें खोलने की कोशिश की। "मुझे घर ले चल। मुझे इस हवा में नहीं रहना।"
हमने उन्हें उठाया। कालू काका ने एक तरफ़ से पकड़ा, मैंने दूसरी तरफ़ से। मीरा आगे-आगे चल रही थी, रास्ता देखती हुई।
अखाड़े के गेट पर टिंकू और गुड़िया खड़े थे। गुड़िया ने माँ को देखा और उसकी आँखें भर आईं। वो दौड़ी और माँ के पैरों से लिपट गई।
"माँ," वो रोई। "माँ, मैंने तुझे कहा था ना, मत जा।"
माँ ने अपना हाथ धीरे से उसके सिर पर रखा। "चुप," उन्होंने कहा। "मैं आ गई।"
रणवीर सिंह की व्हीलचेयर पास आई। उन्होंने माँ की तरफ़ देखा, और उनके चेहरे पर जो आया, वो शब्दों में नहीं था। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"अंदर क्या था?" उन्होंने पूछा।
"उसने माँ को जाने दिया," मैंने कहा। "और कहा कि उसने माँ के अंदर ज़हर डाल दिया है।"
रणवीर सिंह की आँखें बंद हो गईं। "शांतनु का दाँव," उन्होंने धीरे से कहा। "वो जानता है कि तू कल कुश्ती में उतरेगा। अगर तेरी माँ मरने लगी, तो तेरा दिल मैदान में नहीं होगा।"
"तो कल का मुकाबला —"
"कल का मुकाबला होगा।" ये माँ ने कहा। उन्होंने आँखें खोलीं और सीधा मेरी तरफ़ देखा। "मैं मरने के लिए नहीं जी रही, बेटा। मैं तेरी जीत देखने के लिए जी रही हूँ। और अगर मुझे उस जीत के लिए थोड़ा और ज़हर सहना पड़े, तो मैं सहूँगी।"
"माँ —"
"चुप।" उनकी आवाज़ में वो गरमी लौट आई थी जो चक्की के आटे में होती है। "मुझे घर ले चल। और सुबह मुझे अखाड़े ले चलना। मैं वहीं बैठूँगी। मैं देखूँगी।"
मीरा आगे आई। "माँ," उसने कहा, "मैं तुम्हारे साथ रहूँगी। रात भर। मैं तुम्हें कोई नींद में नहीं जाने दूँगी।"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा। एक पल के लिए उनकी आँखों में कुछ पिघला। "तू वही है ना," उन्होंने कहा, "जिसके हाथों में औषधि की गंध है?"
मीरा ने सिर हिलाया।
"तो फिर आ।" माँ ने अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया। "मुझे तेरे हाथों की गंध चाहिए। मेरे बेटे की मिट्टी की गंध मुझे पता है, अब मुझे तेरी औषधि की गंध चाहिए।"
मीरा ने उनका हाथ थाम लिया। उसकी आँखों में पानी था, पर उसने अपनी आवाज़ साफ़ रखी। "चलो," उसने कहा। "घर।"
हम चले। रास्ते में टिंकू ने अपनी टोपी उतारकर माँ के सिर पर रख दी, और बोला, "माँ, ये मेरी किस्मत की टोपी है। इसे पहनकर तुम जल्दी ठीक हो जाओगी।"
माँ ने कमज़ोर-सी हँसी हँसी। "तू अब भी वही है, टिंकू।"
"हाँ माँ," टिंकू ने कहा। "बस कसरत कल से शुरू करूँगा।"
गुड़िया हँसी, और उस हँसी में रोना भी था।
घर पहुँचकर मीरा ने माँ को खाट पर लिटाया। फिर उसने अपना बैग खोला और उसमें से कुछ जड़ी-बूटियाँ निकालीं — कुछ सूखी पत्तियाँ, कुछ दाने। उसने उन्हें पीसकर पानी में घोला और माँ को पिलाया।
"ये ज़हर को नहीं मारेगी," उसने धीरे से मुझसे कहा। "पर इसे धीमा ज़रूर कर देगी। और हमें सिर्फ़ वक़्त चाहिए।"
"कितना वक़्त?"
"जितना तेरी जीत में लगेगा," उसने कहा। "और उससे एक पल ज़्यादा नहीं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो थकी थी, उसके बाल बिखरे थे, और उसके हाथों में जड़ी-बूटियों की गंध थी। पर उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहली बार अखाड़े की मिट्टी में देखी थी।
"मीरा," मैंने कहा।
"हूँ?"
"तूने आज रात बहुत कुछ किया।"
"तूने भी।" उसने माँ की तरफ़ देखा। "वो तेरी माँ है। और आज उसने मुझे अपना हाथ दिया। अब वो मेरी भी है।"
मेरे गले में कुछ अटक गया। मैंने कुछ कहना चाहा, पर शब्द नहीं मिले। तो मैं चुप रहा, और वो भी चुप रही। और उस चुप्पी में जो था, वो किसी भी शब्द से बड़ा था।
बाहर आँगन में कालू काका बैठे थे। उन्होंने मुझे इशारे से बुलाया।
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