Spirit of a Fighter – Chapter 251
उन्होंने अपनी कमर से एक पुरानी लालटेन निकाली और उसे जलाया।
"पर एक बात," उन्होंने कहा। "वो रास्ता सिर्फ़ एक आदमी के लिए है। अंदर से बंद हो जाएगा। जो जाएगा, वो अकेला जाएगा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। टिंकू दौड़कर आ रहा था — उसने अपनी थाली उठा ली थी और टोपी ठीक कर ली थी। गुड़िया भी पीछे-पीछे आ रही थी, और रणवीर सिंह की व्हीलचेयर दीवार के कोने पर रुकी थी।
"मैं जाऊँगा," मैंने कहा।
"नहीं," मीरा ने कहा। वो मेरे सामने आई। "मैं जाऊँगी।"
"मीरा —"
"मैं आयुर्वेद पढ़ती हूँ और मैं तुमसे ज़्यादा जानती हूँ कि उस ज़हर का क्या करना है।" उसने डिब्बा मेरे हाथ से लिया और अपनी बगल में दबा लिया। "और मैं तुम्हें अकेले नहीं जाने दूँगी। तुमने कहा था ना — तुम अकेले नहीं हो। अब मेरी बारी है।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। उनमें वो पानी अब भी था, पर उसके नीचे वो ज़िद थी जो पहाड़ को भी हिला दे।
"तो ठीक है," मैंने कहा। "हम दोनों जाएँगे।"
कालू काका ने खाँसा। "मैंने कहा था — एक आदमी।"
"तो हम एक होंगे," मीरा ने कहा। "माँ की लड़ाई में दो जिस्म, एक आदमी।"
कालू काका ने एक पल उसे देखा। फिर उनके सूखे होंठों पर एक मुस्कान आई — पहली बार।
"तेरे पापा भी ऐसा ही बोलते थे," उन्होंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखते हुए कहा।
रणवीर सिंह ने व्हीलचेयर से हाथ उठाया, धीमे से, जैसे कोई पुरानी आदत हो। उनकी आँखें भरी हुई थीं।
"जाओ," उन्होंने कहा। "और सुबह मुझे मैदान में मिलो — अपनी माँ के साथ, और अपनी जीत के साथ।"
तभी पीछे से सुक्खी बुआ की आवाज़ आई, जो अब तक दीवार के पीछे से सब सुन रही थीं, "अरे मैंने तो सुना है आज रात कुछ बड़ा होने वाला है!"
टिंकू ने आवाज़ लगाई, "बुआ, चुप रहो, वरना सब गाँव को बता दोगी!"
भीड़ में हँसी फूटी, और उस हँसी में सुक्खी बुआ की आवाज़ दब गई।
मैंने कालू काका की लालटेन थामी। वो उसे मेरे हाथ में देकर बोले, "जब मैं कहूँ, बुझा देना। रास्ते में रोशनी नहीं चाहिए — रोशनी से वो जाग जाता है।"
मैंने सिर हिलाया।
हम चले — कालू काका आगे, उनके पीछे मैं और मीरा। टिंकू और गुड़िया अखाड़े के गेट पर रुके रहे, और रणवीर सिंह वहीं दीवार के कोने पर, अपनी कुर्सी में, हमें जाते देखते रहे।
नीम के पेड़ के पीछे एक पुरानी दीवार थी, जिस पर घास उगी थी। कालू काका ने उसमें एक पत्थर दबाया, और दीवार में एक हिस्सा अंदर की तरफ़ खिसक गया — एक छोटा-सा मुँह, बस एक आदमी के जितना।
"यहीं से," उन्होंने कहा।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया।
पर जैसे ही मैंने अपना पैर अंदर रखा, मुझे कुछ सूंघाई दिया — मिट्टी की गंध, पुरानी, गहरी, और उसके नीचे कुछ और। कुछ जलता हुआ। कुछ जो अभी-अभी जला हो।
मैं रुक गया।
"काका," मैंने धीरे से कहा, "अंदर कोई है।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो डर लौट आया जो बीस साल पहले उन्होंने छिपाया था।
"नहीं," उन्होंने धीरे से कहा। "अंदर कोई नहीं है। पर अंदर कुछ जल रहा है — और वो आग है।"
और तभी, दीवार के उस छेद से, धुएँ की एक पतली लकीर बाहर आई।
मीरा ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मेरी अपनी नहीं लगी।
॥
धुएँ की लकीर पतली थी, पर उसकी गंध मोटी थी। जली हुई लकड़ी, गीली मिट्टी, और उसके नीचे कुछ और — कुछ मीठा-सा, जैसे कोई पुरानी जड़ उबल रही हो।
"रुको," मैंने कालू काका का हाथ पकड़ा। "अंदर आग नहीं, कुछ और जल रहा है।"
"क्या?" मीरा ने पूछा।
"कनेर की जड़," मैंने कहा। मेरी नाक अंदर की हवा चूस रही थी, और ज़ुबान पर वो कड़वाहट आ रही थी जो मैंने उस रात भैरव की बोतल में पहचानी थी। "कोई जड़ उबाल रहा है। और वो जड़ ठीक वैसी ही बू दे रही है जैसी तहखाने की मिट्टी में थी।"
कालू काका ने लालटेन नीचे की। "तो वो अंदर है।"
"कौन?"
"भैरव।" कालू काका की आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई पुरानी किताब का पन्ना अपने आप पलट गया हो। "वो तीन दिन का वक़्त लेकर बैठा नहीं है। वो तहखाने की मिट्टी पहले ही उबाल रहा है। जब मिट्टी उबलती है, तो उसका ज़हर हवा में फैल जाता है। फिर जो भी नीचे जाएगा, वो सीधा ऊपर नहीं आएगा।"
मीरा ने डिब्बा कसकर पकड़ा। "मतलब वो माँ को ज़िंदा रखकर उसी हवा में सुला रहा है।"
कालू काका ने सिर हिलाया।
मेरे पैर जम गए। माँ नीचे थी। और नीचे जो हवा थी, वो माँ को ही नहीं, किसी को भी धीरे-धीरे खोखला कर रही थी।
"काका," मैंने कहा, "आपने कहा था — रास्ता है।"
"है," उन्होंने कहा। "पर वो रास्ता तहखाने के ऊपर से जाता है। पुराने कुएँ की दीवार के अंदर, एक हवा की नाली है, जो सीधे तहखाने की छत पर खुलती है। उससे हम नीचे उतर सकते हैं।"
"तो फिर देर किस बात की?"
"इस बात की," उन्होंने कहा, "कि वो नाली बहुत पतली है। एक आदमी, बस। और उसमें हवा नहीं है। जो उतरेगा, वो साँस रोककर उतरेगा। अगर रास्ते में चक्कर आया, तो वो वहीं।"
"मैं जाऊँगा," मैंने कहा।
"नहीं।" मीरा मेरे आगे आ गई। "तू नहीं जाएगा। तू माँ के पास से आया है और तू सुबह कुश्ती भी लड़ेगा। तेरी साँस ही तेरी जान है। तू जाएगा और अगर वहाँ अटक गया, तो माँ को कौन निकालेगा?"
"तो तू जाएगी?" मेरी आवाज़ ऊँची हो गई। "तू अंदर जाएगी, अंधेरे में, उसी हवा में —"
"मैं आयुर्वेद जानती हूँ," उसने कहा। "मुझे पता है कि उस हवा में ज़्यादा देर कैसे रुकना है। तू गंध जानता है, पर मैं ज़हर जानती हूँ।"
कालू काका ने हम दोनों के बीच हाथ डाला। "बस। बहस बंद।"
हम दोनों चुप हो गए।
"मैं उतरूँगा," कालू काका ने कहा। "मेरी उम्र हो गई। मेरे जाने से किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा। और मैं वो नाली जानता हूँ। बीस साल पहले भी एक बार उतरा था।"
"काका —"
"चुप।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तू सुन। तेरा काम अंदर जाना नहीं है। तेरा काम ये है — तू इस दीवार की दूसरी तरफ़ खड़ा रहेगा, जहाँ से तहखाने का दरवाज़ा दिखता है। मैं अंदर जाऊँगा, माँ को निकालूँगा, और तब तक तू उस दरवाज़े को खुला रखेगा। अगर भैरव आया, तो तू उसे रोकेगा। और मीरा —"
उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा।
"मीरा यहीं रहेगी। जब माँ बाहर आए, तो उसे तुरंत हवा चाहिए। तू उसके मुँह पर कपड़ा रखेगी, उसे खुली हवा में लाएगी। और जो पुड़िया तू लाई है — वो सोंठ और काली मिर्च वाली — वो उसके होंठों पर रखेगी।"
मीरा ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में वो ज़िद अब भी थी, पर उसके साथ अब कुछ और था — वो भरोसा जो बिना शब्दों के बनता है।
हम नीम के पेड़ के पीछे से दीवार के उस छेद से निकले और अखाड़े के पिछवाड़े की तरफ़ बढ़े। आसमान में बादल थे, और चाँद जैसे-तैसे उनके बीच से झाँक रहा था। कालू काका ने लालटेन बुझा दी थी। अब सिर्फ़ हमारी साँसें थीं और ज़मीन पर चलती हमारी चप्पलों की आवाज़।
तहखाने का दरवाज़ा उसी पुराने कुएँ के पीछे था, जिसकी सीढ़ियाँ भैरव ने तुड़वा दी थीं। पर कालू काका ने सीढ़ियों से नहीं, कुएँ के पीछे की ज़मीन से एक पत्थर उठाया, और नीचे एक छोटा-सा मुँह दिखा।
"यहीं से," उन्होंने कहा। "मैं अंदर जाता हूँ। तू ऊपर रह। और वीर —"
उन्होंने मेरी आँखों में देखा।
"अगर मैं आधे घंटे में न आऊँ, तो तू मत आना। तू अपनी माँ को ढूँढने के लिए किसी और रास्ते से जाना। समझा?"
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