Spirit of a Fighter – Chapter 250
मैंने भैरव की तरफ़ देखा। वो अब भी दीवार के पास खड़ा था, और उसका चेहरा वापस लौट आया था — वो मिठास, वो ठंडक। जैसे कुछ हुआ ही न हो। उसने अपनी मूँछों पर हाथ फेरा और भीड़ की तरफ़ आकर बोला, "आज का दंगल ख़त्म। दोनों पहलवानों ने अपनी ताकत दिखाई। कल सुबह भारत केसरी का फ़ैसला होगा।"
फिर उसने मुझे देखा, और बोला, "वीर सिंह, तू अंदर आ। मेरे कमरे में। अभी।"
मेरा पेट कड़ा हो गया।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। टिंकू दौड़कर आया — उसकी थाली अब भी ज़मीन पर थी और उसकी टोपी तिरछी हो गई थी। उसने कुछ कहना चाहा, पर मैंने सिर हिलाकर मना किया।
"मैं जाऊँगा," मैंने कहा।
"वीर," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़ोर था जो टूट रहा था।
"माँ की पर्ची में लिखा है — अलमारी खोल।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "भैरव मुझे अपने कमरे में बुला रहा है। अगर मैं नहीं गया, तो वो मुझे कभी अलमारी के पास नहीं फटकने देगा। अगर गया…" मैंने साँस ली। "तो शायद वही मौक़ा है।"
मीरा ने मेरी आँखों में देखा। फिर उसने अपना हाथ छोड़ा और अपनी जेब से कुछ निकाला — सोंठ और काली मिर्च की वो छोटी पुड़िया।
"ये अपने पास रखो," उसने कहा। "अगर वो तुम्हें कुछ पिलाए, तो पहले इसकी गंध लो। तुम्हारी नाक सब बता देगी।"
मैंने पुड़िया ली। मेरी उँगलियाँ उसकी उँगलियों से छू गईं और उसने उन्हें वापस नहीं खींचा।
"मैं बाहर रहूँगी," उसने कहा। "इसी दीवार के पास।"
मैं मुड़ा और भैरव के पीछे-पीछे चला।
अखाड़े का वो कमरा मैंने बाहर से देखा था, पर अंदर पहली बार आया था। अंदर अंधेरा था, और एक अजीब सी गंध थी — तेल की, धुएँ की, और उसके नीचे कुछ और… कड़वी, जैसे सड़ी हुई जड़।
भैरव ने दरवाज़ा बंद किया।
मेरी पीठ दरवाज़े की तरफ़ थी और वो मेरे सामने खड़ा था। कमरे में एक लोहे की अलमारी थी — वही, जिसका दरवाज़ा मुझे खोलना था — और उसके ऊपर एक छोटा दीया जल रहा था। दीये की लौ से उसके चेहरे के आधे हिस्से पर परछाईं पड़ रही थी।
"बैठ," उसने कहा, और अपनी कुर्सी की तरफ़ इशारा किया।
"मैं खड़ा ठीक हूँ।"
वो हँसा। वो हँसी जो गुड़ की तरह मीठी शुरू होती है और फिर कड़वी हो जाती है।
"तू डरता नहीं," उसने कहा। "यही तेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है।"
उसने अपनी कमर से चाबी निकाली — वो चाबी जो हमेशा उसके साथ रहती थी — और उसे हवा में घुमाया। फिर उसने अलमारी का ताला खोला।
मेरी साँस रुक गई।
उसने दरवाज़ा खोला। अंदर काग़ज़ों के बंडल थे, कुछ बोतलें, और एक पीतल का डिब्बा। उसने वो डिब्बा निकाला और मेरे सामने रख दिया।
"तू यही ढूँढ रहा था ना?" उसने कहा। "यही काग़ज़? जो तेरी माँ ने कहा?"
मैं चुप रहा।
"मुझे सब पता है, वीर सिंह।" उसने डिब्बे का ढक्कन खोला। अंदर एक पीला काग़ज़ था, मुड़ा हुआ, पुराना। "ये वो काग़ज़ है जो तेरे पापा रघुवीर ने लिखा था। ज़हर बनाने की पर्ची। और नीचे उसकी लिखाई — 'अगर मैं न रहूँ, तो मेरा बेटा इस ज़हर को पानी में नहीं, मिट्टी में डालेगा।'"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
"तूने पढ़ लिया," मैंने कहा।
"मैंने इसे बीस साल पहले पढ़ लिया था।" उसने काग़ज़ को वापस डिब्बे में रखा और ढक्कन बंद कर दिया। "और इसीलिए मैं तुझे आज यहाँ बुलाया है। तेरी माँ ने तुझे यही बताया ना — कि मिट्टी में ज़हर डालने से वो दस गुना ज़हरीली हो जाती है?"
मैंने सिर हिलाया।
"तो सुन।" उसने डिब्बा उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। "ये ले।"
मैं हिला नहीं।
"ले," उसने फिर कहा। "मैं तुझे यही दे रहा हूँ जो तेरे पापा ने लिखा था। ज़हर की पर्ची। और साथ में एक बात — तेरी माँ आज रात इसी अखाड़े के नीचे है। तहखाने में। जहाँ मैंने उसे रखा है। और अगर तू ये काग़ज़ लेकर सुबह तक किसी को दिखाता है, तो वो काग़ज़ किसी काम का नहीं। क्योंकि सुबह तक मैं वहाँ की मिट्टी बदल दूँगा।"
मेरे हाथ काँपे।
"तो तू मुझे क्या कह रहा है?" मैंने पूछा।
"मैं तुझे एक सौदा दे रहा हूँ।" उसने डिब्बा मेरे हाथों में रख दिया। "तू ये ले। ये तेरा है। तेरे पापा का। पर तू मेरे खिलाफ़ इसका इस्तेमाल नहीं करेगा। बदले में — सुबह भारत केसरी का मुकाबला। तू उतरेगा। और तू हारेगा।"
"क्यों हारूँगा?"
"क्योंकि मैं तुझे बता रहा हूँ।" वो मेरे करीब आया। उसकी आवाज़ अब मीठी नहीं थी। "तू हारेगा, और उसके बाद तू अपनी माँ को लेकर इस गाँव से चला जाएगा। हमेशा के लिए। और मैं तेरे साथ कुछ नहीं करूँगा। न तेरी माँ के साथ। न तेरी बहन के साथ।"
मैंने डिब्बा अपने हाथों में पकड़ा। वो भारी था — उतना भारी नहीं जितना लग रहा था, पर हाथ में रखते ही मेरी उँगलियाँ भारी हो गईं।
"और अगर मैं न मानूँ?" मैंने पूछा।
"तो सुबह सूरज निकलने से पहले तेरी माँ की लाश इस अखाड़े की मिट्टी में मिलेगी। और गाँव कहेगा — बूढ़ी औरत, दिल का दौरा।" उसने अपनी मूँछों पर हाथ फेरा। "मैंने बीस साल में बहुत लाशें मिट्टी में दबाई हैं, वीर सिंह। एक और सही।"
कमरे में सन्नाटा था। दीये की लौ काँप रही थी, और उसकी परछाईं भैरव के चेहरे पर नाच रही थी।
मैंने डिब्बे को अपने सीने से लगाया।
"तूने मेरे पापा को मारा," मैंने कहा।
"मैंने किसी को नहीं मारा।" उसने कंधे उचकाए। "मैंने बस पानी दिया। पीना किसने कहा था?"
मेरे अंदर कुछ टूटा। मैं उस पर झपटने वाला था — मेरी मुट्ठी भींची जा रही थी, मेरी आँखों के आगे लाल धुंध थी — और तभी मुझे माँ की आवाज़ याद आई।
"गुस्सा हाथ की तरह इस्तेमाल कर, दिल की तरह नहीं।"
मैंने साँस खींची।
"ठीक है," मैंने कहा। "मैं सुबह उतरूँगा।"
भैरव मुस्कुराया।
"अब जा," उसने कहा, और दरवाज़ा खोल दिया।
मैं बाहर निकला। बाहर की हवा मेरे चेहरे पर लगी तो लगा जैसे पानी में डूबा आदमी ऊपर आया हो। मेरे पैर काँप रहे थे। मेरा कंधा जल रहा था।
मीरा दीवार के पास खड़ी थी। उसने मुझे देखते ही अपनी साँस रोक ली।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
मैंने डिब्बा दिखाया।
"उसने मुझे ये दिया," मैंने कहा। "और कहा कि माँ तहखाने में है। और अगर मैं सुबह उतरकर हार गया, तो माँ ज़िंदा। अगर जीता, तो माँ की लाश।"
मीरा का चेहरा बदल गया।
"तो तुम हारोगे?" उसकी आवाज़ में वो सवाल था जो मुझसे भी नहीं पूछा जा रहा था।
मैंने डिब्बा खोला और अंदर से वो पीला काग़ज़ निकाला।
"मैं हारूँगा नहीं," मैंने कहा। "मैं उसे जीतूँगा। पर उससे पहले —" मैंने काग़ज़ मीरा की तरफ़ बढ़ाया, "— तुझे ये पढ़ना है। और उसके बाद हमें आज रात माँ को निकालना है।"
मीरा ने काग़ज़ पकड़ा। उसके हाथ काँप रहे थे।
"कैसे?" उसने पूछा।
मैं मुड़ा और नीम के पेड़ की तरफ़ देखा। वहाँ कालू काका खड़े थे — मिट्टी में हाथ डाले, चुप, जैसे सब सुन रहे हों। मैंने उन्हें इशारा किया। वो धीरे-धीरे चलकर आए।
"काका," मैंने कहा। "आज रात उस गुप्त रास्ते से चलना है जो आपने बताया था। माँ तहखाने में है।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें धँसी हुई थीं और सफ़ेद दाढ़ी दीये की रोशनी में चाँदी जैसी लग रही थी।
"तो अब वक़्त आ गया," उन्होंने धीरे से कहा। "जब मैंने बीस साल पहले भैरव को उस रास्ते से जाते देखा था, तब मैं चुप रहा। मैं डर गया था।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "आज मैं चुप नहीं रहूँगा।"
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