Spirit of a Fighter – Chapter 249
"वीर सिंह!"
बब्बर की आवाज़ थी। वो उठ चुका था। धूल में लिपटा, चेहरे पर खून की लकीर, और आँखों में वो आग जो सिर्फ़ बेइज़्ज़ती से आती है।
"तू मुझे गिराकर चला जाएगा? मेरे बाप के सामने?" उसने अपनी मुट्ठी भींची। "फिर से आ। अभी। मैदान में।"
मैंने पर्ची मुट्ठी में कस ली। मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं और ज़ोर से दब रही थीं।
"मत जाओ," उसने धीरे से कहा। "तुम्हारा कंधा…"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके होंठ काँप रहे थे, पर आँखों में वो ज़िद थी जो सुबह से थी। उसे पता था मैं जाऊँगा। उसे यह भी पता था कि वो रोक नहीं सकती।
"एक दाँव," मैंने कहा। "और फिर मैं माँ के पास जाऊँगा।"
मैं पलटा।
भीड़ ने रास्ता दिया। सुक्खी बुआ ने अपना पान का बीड़ा गिरा दिया और चिल्लाई, "अरे मैंने तो सुना है वीर कल ही जीत गया था!"
पीछे से कोई बूढ़ा बोला, "बुआ, कल तो कुश्ती हुई ही नहीं थी।"
भीड़ में हँसी फूटी। कोई खाँसा, कोई मुड़ा, और उस हँसी में मेरी साँस थोड़ी आसान हुई। अच्छा हुआ। अगर गाँव हँस रहा है तो गाँव मेरे साथ है।
मैं मैदान में उतरा। मेरा कंधा दर्द से चीख रहा था — बब्बर के पहले दाँव में ही कुछ चटक गया था, अंदर से, हड्डी में। मैंने उसे दबाया अपनी हथेली से।
बब्बर आया।
वो गुस्से में था, और गुस्से में आदमी अपनी ताकत भूल जाता है, पर अपनी चालाकी नहीं। उसने पहला दाँव मेरे कंधे पर मारा। ठीक उसी कंधे पर जहाँ दर्द था। मैं पीछे हटा, आँखों के आगे अंधेरा छाया, और उसने दूसरा दाँव मेरी कमर पर।
मैं लड़खड़ाया।
तीसरा दाँव। उसने मेरे पैर पकड़े और मुझे घुमाकर पटका। मैं मिट्टी में गिरा, मुँह के बल, और उसने मेरी पीठ पर अपना घुटना टिका दिया।
पूरा अखाड़ा साँस रोककर चुप हो गया।
मेरे कान में मिट्टी भर गई। मेरी छाती ज़मीन से चिपकी थी और मेरा दिल उस मिट्टी में धड़क रहा था। पीठ पर बब्बर का घुटना था, भारी, और उसकी साँस मेरे कान के पास आती-जाती थी।
"बोल," उसने फुसफुसाया। "बोल कि तू हार गया।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
उस पल मुझे माँ याद आईं। वो पर्ची, जो मेरी मुट्ठी में थी। "अलमारी खोल।" माँ ने वो लिखा था, जानते हुए कि वो किसी के हाथ में है। जानते हुए कि मैं उन्हें ढूँढने दौड़ूँगा। और उन्होंने फिर भी लिखा — अलमारी खोल।
मेरी आँखें भर आईं। दर्द से भी, और उस बात से भी कि माँ ने मुझसे ज़्यादा उस काग़ज़ को भरोसा दिया।
और तभी, मेरे घुटने के नीचे, कुछ बदला।
मिट्टी।
मैं मुँह के बल था, पर मेरा एक घुटना मुड़ा हुआ था और वो मिट्टी को छू रहा था। और वो मिट्टी… अलग थी। ऊपर की परत सूखी थी, नई, तेल मिली। पर नीचे, ज़रा-सा दबाने पर, कुछ नरम मिला। ठंडा। गीला। पुराना।
कालू काका।
उन्होंने कहा था — "जहाँ पैर नरम लगे, वहीं दाँव लगाना।"
मैंने नाक से साँस खींची। मिट्टी की गंध आई — चिकनी लाल मिट्टी, हल्की सी गीली, जैसे अभी खोदकर रखी गई हो। वहाँ कोई मुझसे पहले खोद चुका था। कोई मेरे लिए रास्ता बना गया था।
मैंने आँखें खोलीं।
मैदान के किनारे, नीम के पेड़ के नीचे, मीरा खड़ी थी। उसने कुछ नहीं कहा। वो बस अपना हाथ धीरे से उठाकर हथेली सीधी करके रख दिया — जैसे किसी को रोक रही हो। जैसे कह रही हो — रुको, साँस लो।
मैंने साँस धीमी की।
एक। मेरी छाती में हवा गई।
दो। बब्बर का घुटना मेरी पीठ पर था, पर उसका भार अब पहले जैसा नहीं लगा।
तीन। मेरी उँगलियाँ मिट्टी में गईं, ठीक उस जगह, जहाँ परत पतली थी, और मैंने उसे ज़रा-सा खिसकाया।
बब्बर ऊपर से बोला, "क्या हुआ? ज़ुबान सूख गई?" और वो ज़रा-सा ऊपर उठा ताकि मेरी पीठ पर और ज़ोर दे सके।
वही मेरा पल था।
मैंने अपने पंजे से उस मिट्टी को एक तरफ़ धकेला — जितना ज़ोर लगा सका, उतना। और उसके पैर के नीचे की मिट्टी… खिसक गई। वो परत, जो किसी ने चुपचाप नरम छोड़ दी थी, बब्बर के वज़न से फिसल गई।
उसका पैर गया।
एक पल के लिए उसका घुटना मेरी पीठ से हटा, और उसका पूरा शरीर एक तरफ़ झुक गया। मैंने वो पल नहीं गँवाया।
मैं उठा, पलटा, और अपना कंधा उसके पेट में मारा।
वो पीछे गया। उसकी साँस एक झटके में निकल गई — वो आवाज़ जो आदमी तब करता है जब हवा अचानक छूट जाए। वो लड़खड़ाया और मिट्टी में बैठ गया।
मैं खड़ा था।
मेरा कंधा जल रहा था, मेरी आँखों से पानी बह रहा था, और मेरी साँस ऐसे चल रही थी जैसे कोई भागकर आया हो। पर मैं खड़ा था।
भीड़ चीख पड़ी।
बब्बर उठा। उसने अपना मुँह पोंछा। उसकी नाक से खून की एक पतली लकीर बह रही थी, गिरे हुए आदमी की तरह नहीं — उस आदमी की तरह जो अंदर से टूट रहा हो।
और तभी भीड़ में से कोई चिल्लाया, "भैरव सर! बब्बर की नाक से खून आ रहा है!"
मैंने भैरव की तरफ़ देखा।
वो मैदान के बाहर खड़ा था, दीवार के पास, अपनी जगह पर। और उसका चेहरा… मैंने उसे कभी ऐसा नहीं देखा था। बीस साल का मालिक, जिसकी आवाज़ में गुड़ की मिठास और आँखों में कुएँ की ठंडक थी — वो पहली बार सफ़ेद पड़ा था। सफ़ेद, जैसे किसी ने उसके चेहरे से खून खींच लिया हो।
उसने अपना हाथ उठाया। धीरे से। बस एक इशारा — जो सिर्फ़ बब्बर के लिए था। उँगली मुड़ी, फिर सीधी, फिर मुड़ी।
मैंने बब्बर की तरफ़ देखा।
वो उस इशारे को देख रहा था। और उसके चेहरे पर जो था, वो गुस्सा नहीं था। डर था। वो डर जो इंसान को तब लगता है जब उसे पता हो कि आगे क्या होने वाला है और वो रोक नहीं सकता।
उसने अपनी नाक पोंछी और अपनी हथेली को अपनी धोती पर पोंछ दिया। फिर वो मेरी तरफ़ आया, पर लड़ने के लिए नहीं। वो मेरे पास आया और इतना धीरे बोला कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ, "वो इशारा… उसका मतलब है कि आज रात मुझे ज़हर की आख़िरी खुराक मिलेगी।"
मेरे पेट में ठंडी सुई चुभी।
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि मैं हार गया।" उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो पानी अब भी था। "भैरव सर हारने वाले को नहीं छोड़ते। उन्होंने मुझे सुबह दो घूँट दिए थे — जीतने के लिए। और अब…" उसने हाथ उठाया, फिर गिरा दिया। "अब वो मुझे तीन देगा। और तीन का मतलब होता है — सिर्फ़ एक हफ़्ता।"
मैं चुप खड़ा रहा।
बब्बर ने अपना सिर झुकाया और धीरे से कहा, "मेरी बहन है। चंदा। दस साल की। उसे भैरव सर के घर में रखा है — कहते हैं पढ़ाएँगे। पर मैं जानता हूँ, वो बंधक है। अगर मैं मरा, तो वो…" उसकी आवाज़ रुक गई।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
क्यों रखा, मुझे नहीं पता। पर रखा। क्योंकि उस वक़्त मुझे वो शख्स दिख रहा था जो सुबह तक मेरा दुश्मन था और अब सिर्फ़ एक ऐसा आदमी था जिसकी बहन किसी के घर में बंद है।
"मेरी माँ भी उसी के पास है," मैंने कहा। "आज रात।"
बब्बर ने सिर उठाया।
"तो हम दोनों का एक ही रास्ता है," उसने कहा। "मैं तुझे बताता हूँ वो रास्ता। पर पहले तू मुझसे वादा कर — मेरी बहन।"
"वादा," मैंने कहा।
भीड़ में से आवाज़ें आ रही थीं — किसी ने मेरा नाम लिया, किसी ने कहा "दोनों खड़े हैं, कुछ हुआ क्या?" सुक्खी बुआ फिर चिल्लाई, "अरे मैंने तो सुना है दोनों भाई बन गए!"
पीछे वही बूढ़ा बोला, "बुआ, तू कुछ भी सुनती है।"
हँसी फूटी, पर मैं हँस नहीं सका।
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