Spirit of a Fighter248 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 248

7 min read November 5, 2026

मिट्टी ठंडी थी। मेरे पैर उसमें धँसे और मुझे पापा की धोती की गंध आई। भीड़ चुप हो गई। इतनी चुप कि मुझे नीम के पत्तों की आवाज़ सुनाई दी।

बब्बर पहले झपटा।

मुझे कुछ समझने का मौका ही नहीं मिला। उसने मेरा हाथ पकड़ा, अपने कंधे पर रखा, और मुझे हवा में उठा दिया। फिर ज़मीन पर पटक दिया।

मेरी पीठ पर झटका लगा। मेरे मुँह में मिट्टी भर गई — काली, गीली, कड़वी। मेरे कानों में घंटी बजने लगी और आँखों के आगे अंधेरा छा गया।

भीड़ चीखी। किसी ने कहा, "अरे, ये तो एक ही दाँव में…" और किसी ने कहा, "देखा, मैंने कहा था ना।"

मैं ज़मीन पर पड़ा था। मेरी आँखें खुली थीं पर कुछ नहीं दिख रहा था। और फिर, उस अंधेरे में, मुझे एक आवाज़ सुनाई दी।

घरघर… घरघर… घरघर…

चक्की। माँ की चक्की। वो आवाज़ जो मेरे बचपन से मेरे कानों में है। वो आवाज़ जिसके साथ मैं सोया हूँ, जिसके साथ उठा हूँ। माँ हर सुबह चार बजे उठती हैं और चक्की चलाती हैं, और मैं उस आवाज़ में बड़ा हुआ हूँ।

मेरी उँगलियाँ मिट्टी में धँस गईं। मैंने मुट्ठी भरी। मिट्टी मेरी हथेली में ठंडी थी, और उसमें वो गंध थी — पापा की गंध। मैंने सुना, बहुत दूर से, जैसे किसी और ज़माने से, माँ की आवाज़ — "भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा।"

"उठ!" किसी ने चिल्लाया। मैंने पहचाना — कालू काका थे। "उठ, बेटा! मिट्टी तेरी माँ है, उससे बैर मत कर!"

मैं उठा।

धीरे-धीरे। पहले घुटने पर। फिर हाथ के सहारे। मेरी पीठ में दर्द था, मेरी गर्दन में दर्द था। मैंने मुँह से मिट्टी थूकी — काली, गाढ़ी। और खड़ा हो गया।

भीड़ चुप हो गई। भैरव की ताली हवा में अधूरी रुक गई — मैंने देखा, उसका हाथ ऊपर था और रुक गया। बब्बर मेरे सामने खड़ा था और उसके चेहरे पर हैरानी थी।

मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। फिर दूसरा।

"तूने मुझे गिराया नहीं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ कर्कश थी, मुँह में मिट्टी थी, पर मैंने पूरी ताकत से बोला। "मैंने तेरी साँस सूंघी है, बब्बर।"

उसकी आँखें फैल गईं। उसने एक कदम पीछे हटाया।

"तू अंदर से थक रहा है," मैंने कहा। "तेरे सर के बालों में जो पसीना सूख रहा है, वो किसी और चीज़ की बू दे रहा है। मुझे पता है वो बू क्या है। मैंने वो बू अपने पापा के कपड़ों में सूंघी थी, बचपन में।उसकी आँखों में डर आ गया था, और उस डर में ज़हर नहीं था — उस डर में सच था।

भीड़ में से कोई बोला, "क्या बोल रहा है ये?"

भैरव ने अपना हाथ नीचे किया। उसकी मुट्ठी कस गई — मैंने देखा, उसकी उँगलियाँ सफ़ेद हो गईं। और उसकी आँखें, जो अब तक ठंडी थीं, अब कुछ और हो गईं।

मैंने बब्बर की तरफ़ देखा। फिर धीरे से, इतना धीरे कि बस वो सुन सके, मैंने कहा, "तेरी लड़की का नाम क्या है?"

बब्बर का मुँह खुला रह गया। उसकी आँखें भर आईं, और फिर उसने जवाब दिया, बस होंठ हिलाकर, "चंदा।"

"आज शाम," मैंने कहा, "चंदा को लेकर मेरे घर आ। माँ चक्की पर बैठी होगी। उसे बता देना कि तेरा इलाज शुरू हो गया है।"

बब्बर ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर वो कुछ ऐसा कर गया जो मैंने सोचा भी नहीं था — उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया, मेरा हाथ पकड़ा, और मुझे ऊपर खींचा। फिर उसने मेरे कान में कहा, "भैरव ने आज सुबह मुझे दो घूँट पिला दिए थे। कहा — ये आख़िरी है।" उसने मेरी आँखों में देखा। "मेरे शरीर में आग जल रही है। मैं ज़्यादा देर नहीं लड़ सकता।"

मेरी छाती धक-धक करने लगी।

"तो लड़," मैंने कहा। "जितनी देर लड़ सकता है, लड़। और जब गिरे, तो गिर जाना। पर गिरना ईमानदारी से।"

बब्बर ने सिर हिलाया। फिर उसने अपनी मुट्ठियाँ कसीं और मेरे सामने आ गया।

भैरव ने दूसरी ताली बजाई — इस बार ज़ोर से, गुस्से में।

और इस बार, दाँव मैंने चला।

मैं उसकी तरफ़ झपटा। उसने मेरा हाथ पकड़ना चाहा, पर मैंने अपना शरीर नीचे किया और उसकी कमर को पकड़ लिया। उसकी साँस मेरे चेहरे पर आई — कड़वी, गरम। मैंने अपना पूरा वज़न उसके पैरों पर डाला। वो डगमगाया। और फिर मैंने वही किया जो कालू काका ने सिखाया था — मैंने उसकी एड़ी पर अपना पैर मारा, वहाँ जहाँ मिट्टी नरम थी।

बब्बर गिरा।

मैदान में मिट्टी का एक बादल उठा और भीड़ चीख पड़ी।

मैं उसके ऊपर झुक गया। उसकी आँखों में पानी था, और वो मुस्कुरा रहा था। बस होंठ हिलाकर उसने कहा, "चंदा…" और फिर उसकी आँखें बंद हो गईं।

मैं उसके ऊपर झुका हुआ था, और मेरा दिल धक-धक कर रहा था, और तभी मुझे मालूम हुआ कि अखाड़े में सन्नाटा है। पूरा सन्नाटा।

मैंने सिर उठाया।

भैरव अपनी जगह से उठ चुका था। उसकी आँखें मुझ पर थीं और उनमें कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — सिर्फ़ गुस्सा नहीं। डर।

वो मेरी तरफ़ आया। उसने मेरे सामने झुककर बब्बर को देखा — बेहोश, साँस लेता हुआ। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और कहा, इतना धीरे कि बस मैं सुन सकूँ, "तुझे बब्बर को गिराना नहीं चाहिए था। अब मुझे तेरे साथ खुद लड़ना पड़ेगा।"

उसने अपनी धोती ऊपर की। उसकी छाती पर पुराने निशान थे — मिट्टी में लड़ने के, और उसके बाएँ कंधे पर एक जला हुआ निशान, गोल, जैसे किसी ने चूल्हे की राख से दागा हो।

"आज नहीं," उसने कहा। "आज तू जीत गया। पर सुन।" उसने मेरा कंधा पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। "कल सुबह सूरज निकलने से पहले, अगर तू मेरी अलमारी खोलने की कोशिश करेगा, तो जो तेरे पापा के साथ हुआ, वो तेरी माँ के साथ होगा। मैंने तुझे चेताया।"

वो पलटा और भीड़ की तरफ़ गया। भीड़ को हाथ उठाकर बोला, "आज का मुकाबला वीर सिंह ने जीता! कल सुबह भारत केसरी का दंगल होगा — वीर सिंह और भैरव सिंह के बीच!"

भीड़ चीख पड़ी। किसी ने मेरा नाम लिया, किसी ने पापा का।

पर मैं वहीं खड़ा था, बब्बर के पास, और मेरे कानों में भैरव की आख़िरी बात गूँज रही थी — "तेरी माँ के साथ होगा।"

माँ।

मैंने सिर घुमाया। नीम के पेड़ के नीचे माँ की जगह खाली थी।

मेरी साँस रुक गई।

मैं भागा। भीड़ को चीरता हुआ, टिंकू की थाली को गिराता हुआ, गुड़िया की आवाज़ को पीछे छोड़ता हुआ। दीवार के पास पहुँचा तो देखा — माँ नहीं थीं। पर मीरा वहीं खड़ी थी, और उसके हाथ में एक पर्ची थी।

"ये माँ ने दी," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ सपाट थी। "उन्होंने कहा — वीर से कहना, मैं भैरव के आदमी के साथ जा रही हूँ, और वो मुझे वहीं ले जा रहा है जहाँ वीर नहीं जानता। और ये भी कहना कि अगर वो मेरे पीछे आया, तो वो मेरी लाश देखेगा।"

मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने पर्ची पकड़ी। उस पर माँ की टेढ़ी लिखाई थी — "बेटा, जो लड़ाई मिट्टी में लड़ी जाती है, वो आज तूने लड़ ली। अब सच की लड़ाई है। मैं ठीक हूँ। मुझे मत ढूँढ। अलमारी खोल। — तेरी माँ।"

मैंने पर्ची को अपनी छाती से लगाया।

फिर मैंने मीरा की तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो आँसू थे जो वो रोक रही थी।

"वो अलमारी," मीरा ने धीरे से कहा, "जिसका दरवाज़ा अब खुलेगा, वहीं से शायद माँ का रास्ता भी निकले।"

मैंने सिर हिलाया। फिर मैंने अपनी मुट्ठी में मिट्टी भरी, और ऊपर आसमान की तरफ़ देखा।

"माँ," मैंने कहा, "मैं आ रहा हूँ।"

॥

"माँ," मैंने कहा, "मैं आ रहा हूँ।"

पर मैं उठ नहीं पाया। क्योंकि पर्ची को छाती से लगाए, मीरा के आँसुओं के सामने, टिंकू की गिरी थाली के पास, मेरे पीछे से एक आवाज़ आई जिससे अखाड़े की हवा भारी हो गई।

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