Spirit of a Fighter – Chapter 247
"तो मैं तुझे एक और बात बता दूँगा। जो भैरव सर ने नहीं कही।"
बब्बर ने शीशी अपनी जेब में रखी। फिर आँगन की मुंडेर पर बैठ गया, जैसे कोई बूढ़ा थका हुआ मज़दूर खेत से लौटकर बैठता है।
"कल अखाड़े में जो लड़ेगा," उसने कहा, "वो मैं हूँ।"
मेरा मुँह खुला रह गया।
"तेरे पापा की धोती पहनकर तू आएगा, सब देखेंगे। भैरव सर ने सबको बता दिया है — कि वीर अपने पापा का बदला लेने आ रहा है। और जब तू मिट्टी में गिरेगा, तो सब कहेंगे — देखो, रघुवीर का बेटा भी वैसा ही निकला।"
"तू क्यों बता रहा है मुझे?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ काँप रही थी, और मुझे उस पर शर्म आई।
बब्बर ने अपने हाथ देखे। उसकी उँगलियाँ मोटी थीं, नाखून चटके हुए। "क्योंकि मैंने भी वो पानी पिया था," उसने धीरे से कहा। "तीन साल। रोज़ एक घूँट। मुझे लगा ताकत बढ़ रही है। दो साल तक बढ़ी भी। फिर शुरू हुआ — घुटने, कमर, साँस। डॉक्टर ने कहा बस दो साल और।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मेरी लड़की आठ साल की है। वो मुझे ऐसा नहीं देखना चाहती जैसे मैं अभी हूँ।"
मैं चुप खड़ा रहा। आँगन में ठंडी हवा चल रही थी और मुझे अपने पैरों के नीचे की मिट्टी ठंडी लग रही थी।
"तो तू हार जाएगा?" मैंने पूछा।
"मैं हारूँगा नहीं," बब्बर ने कहा। उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ जान आई। "मैं लड़ूँगा। पर जिस दिन मैं ये पानी पीना बंद कर दूँ, उस दिन भैरव मेरी खुराक काट देगा। और खुराक कटी, तो…" उसने हाथ से अपना गला दबाया, जैसे कोई चीज़ अंदर से आ रही हो। "पहले कमज़ोरी, फिर उल्टी, फिर धुंधला। मैंने अपने साथ के दो को जाते देखा है।"
"तो शीशी वापस ले जा," मैंने कहा। "कह दे भैरव से कि वीर ने मना कर दिया।"
"वो मानेगा नहीं। वो कहेगा — फिर तू ही उसे पिला।"
मेरे पेट में एक ठंडा गोला बन गया। मैंने बब्बर की तरफ़ देखा — बड़ा शरीर, चौड़े कंधे, पर आँखों में वो डर जो हाथी की आँखों में भी नहीं होता।
तभी दरवाज़े के पीछे से आवाज़ आई। "उसे मत पीने दे।"
माँ थीं। वो दरवाज़े की चौखट पर खड़ी थीं, सिर पर दुपट्टा, हाथ में लालटेन। उन्होंने बब्बर की तरफ़ नहीं देखा। मेरी तरफ़ देखा।
"बेटा," उन्होंने कहा, "ये शीशी जो लेकर आया है, इसे गरम पानी में डाल दे। उबाल दे।"
बब्बर ने पूछा, "क्यों?"
"क्योंकि इसका रंग वही है जो मैंने अपने पति के हाथ में देखा था," माँ ने कहा। "और मैं उस दिन से इस रंग से डरती हूँ।" वो आगे आईं और बब्बर के सामने खड़ी हो गईं। "तू अंदर से डरा हुआ है। डरा हुआ आदमी ज़हर नहीं पिला सकता। तू मेरे बेटे को नहीं मार सकता।"
बब्बर ने माँ को देखा। फिर उसने अपनी जेब से शीशी निकाली और माँ के हाथ में रख दी।
"मैडम," वो बोला, "आपकी बात सही है। पर कल मैं और वीर मिट्टी में होंगे, और भैरव दीवार पर बैठा होगा। अगर मैं आपके बेटे को नहीं गिराता, तो भैरव मुझे…" उसने बात अधूरी छोड़ दी।
"तो तू उसे गिराना," माँ ने कहा। "पर ईमानदारी से। अगर तेरी मेहनत उसे गिरा देती है, तो गिरा। मैं तुझसे नहीं लड़ूँगी। पर ज़हर से नहीं।"
बब्बर ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने सिर हिलाया और मुड़कर चल दिया। रास्ते में उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा। "कल सुबह मैं दीवार से सटकर खड़ा रहूँगा," उसने कहा। "अगर तू जीतेगा, तो मेरी लड़की के लिए कुछ करना। उसे मेरे ज़हर की बात मत बताना।"
वो चला गया। माँ ने शीशी गरम पानी में डाली और उसे उबालने लगीं। भाप उठी, और घर में वो बदबू फैली जो कल चूल्हे में आई थी।
"सो जा," माँ ने कहा। "सुबह जल्दी है।"
पर मैं नहीं सोया। मैं बैठा रहा और आँगन में चाँद को ढलते देखता रहा।
सुबह जब मैं उठा, माँ पहले से जाग रही थीं। उन्होंने मेरे लिए दाल बनाई थी और उसमें नमक बिलकुल ठीक था। मैंने कुछ नहीं कहा, पर जब आख़िरी निवाला मुँह में रखा, तो माँ ने कहा, "आज की दाल में कुछ कमी नहीं है।"
"हाँ," मैंने कहा।
"तो लड़।"
वो शादी की साड़ी पहनकर आईं — लाल, सोने की किनारी वाली, जो उन्होंने बीस साल से पहनी नहीं थी। गुड़िया ने मेरी कलाई पर तीसरा लाल धागा बाँधा। "तीसरा," उसने कहा। "तीन धागे, तीन रक्षा।"
मैं पापा की धोती पहनकर निकला। रास्ते में लोग मुझे देखकर रुक जाते थे। कोई कुछ कहता नहीं, बस देखता। किसी की आँख में मुझ पर तरस था, किसी की आँख में डर। और एक बुढ़िया ने, जो नहर के किनारे कपड़े धो रही थी, चिल्लाकर कहा, "जा बेटा, जा। रघुवीर का बेटा है, तो जीतेगा।"
अखाड़े के गेट पर भीड़ थी। ज़्यादा भीड़। रामपुर भर आया था — और बाहर के गाँव के भी। मैंने देखा — सुक्खी बुआ सबसे आगे, हाथ में पान का बीड़ा, जोर-जोर से कह रही थीं, "अरे मैंने तो सुना है कि वीर ने कल रात भैरव की अलमारी खोल दी थी।" मेरे आगे वो बात बढ़ा-चढ़ाकर बताती जा रही थीं।
गेट के अंदर घुसते ही मुझे टिंकू दिखा। वो दीवार के पास खड़ा था, सामने मिठाइयों की बड़ी-सी थाली रखी थी, और ज़ोर से चिल्ला रहा था, "आज मेरी मिठाई जीतने वाले के मुँह में जाएगी! सुनो सब! आज टिंकू मिष्ठान भंडार का नाम वो पहलवान बोलेगा जो मिट्टी में खड़ा रहेगा!"
भीड़ हँसी। मैं भी हँसा। उसकी आवाज़ में इतनी जान थी, जितनी मुझमें नहीं थी।
दीवार के एक कोने में गुड़िया उछल रही थी, हाथ हिला रही थी। और दूर, नीम के पेड़ के नीचे, माँ खड़ी थीं — आँखें बंद, हाथ जुड़े। वो दुआ माँग रही थीं, और मुझे पता था कि वो क्या माँग रही थीं — वो ये नहीं माँग रही थीं कि मैं जीतूँ। वो ये माँग रही थीं कि मैं लौट आऊँ।
अखाड़े के किनारे, चबूतरे पर, मीरा खड़ी थी। उसने कंधे से किताबों का बैग उतारा और नीचे रख दिया। फिर उसने अपने बाल पीछे किए और सीधी मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कोई मुस्कान नहीं थी, कोई डर भी नहीं। बस एक बात थी — जैसे वो कह रही हो, "जो किया है, ठीक किया है। अब कर।"
और फिर ताली बजी।
भैरव सिंह लाल धोती में मैदान के बीच आया। उसकी मूँछों पर तेल चमक रहा था। गले की सोने की चेन धूप में अंधा कर रही थी। उसने भीड़ की तरफ़ हाथ उठाया, जैसे कोई राजा अपनी प्रजा को आशीर्वाद देता हो।
"आज का मुकाबला," उसकी आवाज़ गूँजी, "रामपुर के वीर सिंह और अखाड़े के बब्बर के बीच है।" वो रुका, और उसने मेरी तरफ़ देखा। "जीतने वाले को अखाड़े का दरवाज़ा हमेशा के लिए खुला रहेगा। और हारने वाले को…" उसने कंधे उचकाए। "हारने वाले को भगवान भरोसे छोड़ देंगे।"
भीड़ में फुसफुसाहट फैली। मैंने अपने पैरों को ज़मीन पर कसा।
बब्बर आया। दो सिर मेरे से ऊँचा, गले में तांबे का ताबीज, कलाई पर मोटा कड़ा। उसकी आँखों में वो ठंडक थी जो पहलवानी में नहीं होती — जो गुंडई में होती है। पर जब वो मेरे पास आया और पास आया, तो मैंने साँस ली।
ताज़ा कसरत की बू — पसीना, मिट्टी, तेल। पर उसके नीचे, उसके बालों में सूख रहे पसीने में, एक और बू थी। कड़वी। हल्की। जो कल तक नहीं थी।
वो शीशी माँ ने उबाल दी थी। पर बब्बर ने पहले ही कुछ पी लिया था। शायद सुबह। शायद मुझसे मिलने से पहले।
मेरे मन में सवाल उठा — क्या भैरव ने उसे भी पिला दिया? क्या वो अपने ही आदमी को ज़हर देकर उसे मजबूर कर रहा है?
भैरव ने ताली बजाई। दोनों मिट्टी में उतरे।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno