Spirit of a Fighter246 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 246

7 min read November 5, 2026

"हाँ," कालू काका ने कहा। "वो झूठ बोला। ठीक वैसे ही जैसे बीस साल से बोलता आया है।" उन्होंने कुंजी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये चाबी उसकी माँ ने बक्से में रखी थी। क्योंकि वो जानती थी कि जिस दिन ये चाबी उसके बेटे के हाथ लगेगी, वो उसी दिन अपने सारे राज़ खुद खोल देगा। और फिर कोई उसे रोक नहीं पाएगा।"

मैंने कुंजी ली। वो ठंडी थी, और हल्की। जंग उँगली पर लग गई।

सूखे फूल को मीरा ने उठाया। उसने उसे सूँघा — आदत से, आयुर्वेद की छात्रा होने की आदत से।

"ये फूल तो…" वो रुकी। उसने फिर सूँघा। "ये धतूरे का फूल नहीं है। ये कनेर का है।"

"कनेर?" मैंने कहा।

"हाँ। कनेर का फूल ज़हरीला होता है। बच्चे इसे मुँह में नहीं डालते। पर कनेर की जड़ से…" वो रुकी, और उसकी आँखें बड़ी हो गईं। "वीर, कनेर की जड़ वही चीज़ है जो भैरव अपने पानी में मिलाता है। मैंने लैब रिपोर्ट में देखा था — कनेर की जड़ का सत्व। इसीलिए वो पानी मीठा लगता है और अंदर ज़हर करता है।"

कालू काका ने फूल को देखा। उनका चेहरा बदल गया।

"भैरव की माँ," उन्होंने कहा, "इस फूल को पूजा में रखती थी। मंदिर में। हर सुबह। मैंने उसे एक बार पूछा था — 'बाई, ये सूखा फूल क्यों रखती हो?' और वो बोली थी — 'ये मेरे बेटे की पहली गलती है। मैं इसे सँभालकर रखती हूँ, ताकि जिस दिन ये बढ़ जाए, मैं इसे दिखा सकूँ कि शुरुआत कहाँ से हुई थी।'"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

"तो ये फूल…" मैंने कहा।

"ये गवाही है," कालू काका ने कहा। "भैरव की माँ ने इसे बक्से में रखा। ये कहने के लिए कि उसका बेटा ज़हर बनाने से पहले भी ज़हर था — बस तब वो जड़ में था, और अब पानी में है।"

बलवंत ने फूल की तरफ़ देखा। उसका चेहरा कठोर था।

"तो फेंक दे इसे," वो बोला। "इससे क्या होगा?"

"नहीं," मीरा ने कहा। उसने फूल को अपनी जेब में रखा। "ये सबूत है। पुलिस के सामने, पंचायत के सामने, सबके सामने — ये फूल दिखाएँगे तो भैरव की अपनी माँ उसके खिलाफ़ गवाही देगी। और मुर्दा औरत की गवाही पर भगवान भी सवाल नहीं उठाता।"

टिंकू ने अपनी बिखरी मिठाई ज़मीन से उठाई। एक-दो टुकड़े उसने अपनी जेब में डाले, बाकी छोड़ दिए।

"मेरी पहली जीत," उसने कहा, और मुस्कुराया। "एक आदमी को मिठाई से हराया।"

"तूने उसे मिठाई से नहीं, डिब्बे से हराया," मैंने कहा।

"बात तो सही है," टिंकू ने कहा, और हम सब हँसे। उस हँसी में डर की कमी नहीं थी, पर हँसी थी। उस रात हमें हँसी चाहिए थी।

हम लौट पड़े। रास्ते में बलवंत आगे चल रहा था, कालू काका के साथ, कुछ धीरे-धीरे बात करते हुए। टिंकू मिठाई के टुकड़े खाता जा रहा था और बीच-बीच में बोलता, "भैया, अगली बार डिब्बा भरकर लाऊँगा।"

मीरा मेरे साथ थी। उसकी चाल धीमी थी। चाँद नीचे आ रहा था, आसमान हल्का हो रहा था।

फिर उसने धीरे से कहा, "कल मुकाबला है।"

"हाँ।"

"और तूने अभी तक मुझे ये नहीं बताया कि तू लड़ेगा कैसे।"

मैं रुका। रास्ते की धूल मेरे पैरों पर जम रही थी। ठंडी हवा आई, और उसमें नहर की गंध थी, और घास की, और कहीं दूर से किसी के चूल्हे की गंध।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। चाँद उसके चेहरे पर पड़ रहा था। उसके बाल उलझे हुए थे, कुर्ते पर धूल थी, और उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो पूछ नहीं रही थी — कि कल के बाद ये रात बचेगी या नहीं।

"मैं लड़ूँगा नहीं," मैंने कहा। "मैं जीतूँगा।"

वो एक पल मेरी तरफ़ देखती रही।

"घमंडी," वो बोली।

"तेरे जैसा।"

वो हँसी। पहली बार उसकी हँसी में कोई हिसाब नहीं था, कोई सबूत नहीं था। बस हँसी थी।

"ठीक है," वो बोली। "जीत। पर एक शर्त है।"

"क्या?"

"जीतने के बाद मुझसे बात करना। उससे पहले नहीं।"

"ऐसी क्या बात है?"

"वो बात है," वो बोली, और उसकी आवाज़ नरम हो गई, "जो मैं हारने के बाद नहीं कहना चाहती।"

मैं कुछ नहीं बोला। क्योंकि जो मैं कहना चाहता था, उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं थे। और शायद उसके लिए भी नहीं थे, क्योंकि वो आगे बढ़ गई और उसने अपना हाथ मेरे हाथ से छुआ — बस एक पल के लिए — और फिर हटा लिया।

घर पहुँचा तो आँगन में लालटेन जल रही थी। माँ जाग रही थीं।

वो चूल्हे के पास बैठी थीं, और उनके सामने, साफ़ कपड़े पर, पापा की धोती रखी थी। इस्त्री की हुई। सलीके से तह की हुई। और उसके ऊपर एक पीली पर्ची।

मैंने पर्ची उठाई। माँ की लिखाई थी, फूहड़, टेढ़ी — जैसे उन्होंने जल्दी में लिखी हो, या जैसे उनके हाथ काँप रहे हों।

"कल सुबह मैं तेरे साथ अखाड़े चलूँगी, और इस बार तेरी माँ दीवार के बाहर नहीं, अंदर बैठेगी।"

मेरा गला भर आया। मैंने पर्ची को सीने से लगाया। काग़ज़ ठंडा था, पर उस पर माँ की उँगलियों की गंध थी — हल्दी और आटे की।

"माँ," मैंने कहा। "तू अंदर क्यों बैठेगी? वहाँ तो…"

"वहाँ तो भैरव बैठेगा," माँ ने कहा। उन्होंने चूल्हे में एक लकड़ी डाली और आग चटकी। "मुझे पता है। पर जिस दिन तेरे पापा पहली बार जीते थे, मैं दीवार के बाहर खड़ी थी। मैंने दीवार के छेद से देखा था।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें लालटेन में चमक रही थीं। "बीस साल बाद मैं उस दीवार के अंदर बैठूँगी। और जब तू जीतेगा, मैं ताली बजाऊँगी। ज़ोर से। इतनी ज़ोर से कि वो भैरव को सुनाई दे।"

मैंने धोती उठाई। वो भारी थी, मोटे कपड़े की, और उसमें वो गंध थी जो मैं भूल गया था — पापा की गंध। मिट्टी और पसीने की।

"इसे पहन," माँ ने कहा। "और जब पहन ले, तो मेरे पास आ। मैं तेरे माथे पर तिलक लगाऊँगी।"

गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी थी। उसकी आँखें आधी बंद थीं, पर वो जाग रही थी। उसने कुछ नहीं कहा। बस आई, और मेरी कलाई पर एक और लाल धागा बाँध दिया — पुराने के ऊपर।

"ये दूसरा है," वो बोली। "पहला टूट गया था ना?"

"नहीं टूटा था।"

"तो अब दो हैं। दो धागे, दो हाथ।"

मैंने उसका सिर सहलाया। वो मुस्कुराई और चली गई, नींग में, दीवार का सहारा लेकर।

मैं सो गया। शायद दो घंटे। शायद तीन। मुझे सपना नहीं आया। बस अंधेरा था, और उस अंधेरे में मिट्टी की गंध थी।

और फिर मेरी नींद खुली।

रात का तीसरा पहर था। आँगन में चाँद ढल रहा था। और कहीं से आवाज़ आ रही थी।

धीमी आवाज़। कोई गा रहा था।

"बलराज… बलराज…"

मैं उठ बैठा। मेरी रीढ़ में ठंडी लहर दौड़ी। वो नाम — बलराज — मैंने कभी नहीं सुना था। पर फिर भी, नींद में, मुझे लगा जैसे ये नाम मेरे अंदर से आ रहा है, मेरे खून से।

मैं उठा। दरवाज़ा खोला।

आँगन में बब्बर खड़ा था।

वो अखाड़े का पुराना मज़दूर था, भैरव का आदमी — चालीस के आस-पास, चौड़ा, बड़ी मूँछें, हमेशा चुप रहने वाला। मैंने उसे कभी बोलते नहीं सुना था।

उसके हाथ में वही हरी शीशी थी।

वो गाना बंद कर दिया। उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कोई नशा नहीं था, कोई गुस्सा नहीं। बस थकान थी।

"भैरव सर ने कहा," वो बोला। आवाज़ सूखी, रेत जैसी। "कल के मुकाबले से पहले इसे पी ले। वरना तेरी माँ सुबह नहीं उठेगी।"

मेरी मुट्ठी कस गई। शीशी में हरा पानी था, और चाँद की रोशनी में वो चमक रहा था, जैसे कोई चीज़ अंदर से जल रही हो।

"और अगर मैं न पिऊँ?" मैंने कहा।

बब्बर ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने शीशी नीचे की, अपने सीने के पास लाई, और धीरे से कहा, "तो मैं तुझे एक और बात बता दूँगा। जो भैरव सर ने नहीं कही।"

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