Spirit of a Fighter – Chapter 245
"नहीं," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ में कुछ था जो मैं समझ नहीं पाया। "ये आदमी टूट रहा है। और टूटता हुआ आदमी सबसे खतरनाक होता है।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली अब गर्म थी।
"कल सुबह अलमारी खोलेंगे?" उसने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा। "आज रात। अभी।"
मैंने चाबी उठाई। वो ठंडी थी। पर मेरी मुट्ठी में आते ही गर्म हो गई।
और जब हम अखाड़े की तरफ़ बढ़े, मैंने देखा — दीवार पर, जहाँ भैरव खड़ा था, वहाँ कुछ लिखा था। ताज़ा लिखा। कोयले से।
"शांतू मर गया। अब सिर्फ़ भैरव है।"
मेरी मुट्ठी कस गई।
तभी मीरा ने धीरे से कहा, "वीर, तेरी जेब से कुछ गिर रहा है।"
मैंने नीचे देखा। मुंदरी मेरी जेब से फिसलकर ज़मीन पर गिर गई थी। और वो वहाँ नहीं पड़ी थी — वो लुढ़कती हुई दीवार के पास गई, और फिर रुक गई।
उसके पास एक और चीज़ पड़ी थी। एक छोटा काग़ज़। जो अभी वहाँ नहीं था।
मैंने उसे उठाया। उस पर सिर्फ़ तीन शब्द थे, भैरव की लिखाई में।
"अब खेल शुरू।"
॥
"अब खेल शुरू।"
मैंने काग़ज़ को उँगलियों में कस लिया। उसकी स्याही अभी गीली थी, उँगली पर लग गई।
"भैरव यहीं है," मैंने कहा। "दूर नहीं गया। वो हमें देख रहा है।"
कालू काका ने चारों तरफ़ नज़र घुमाई। मंदिर का आँगन खाली था, बस टूटी मूर्ति और उसके पैरों में ठंडी राख।
"नहीं," कालू काका ने कहा। "वो देख नहीं रहा। वो खेल रहा है। और खिलाड़ी देखता नहीं, दाँव खेलता है।"
तभी मंदिर की दीवार के पीछे से पैरों की आवाज़ आई। कई पैर। धूल उड़ती हुई आई और मेरी नाक में घुस गई।
लुट्टन आगे आया। उसके पीछे छह आदमी थे, हाथों में लाठियाँ, एक के हाथ में लालटेन। लुट्टन की आँखें लाल थीं। वो सुबह से नशे में लग रहा था।
"चाबी दे," लुट्टन ने कहा। आवाज़ में वो रौब नहीं था जो अखाड़े में था। आवाज़ काँप रही थी। "भैरव सर ने कहा है — चाबी नहीं दी, तो मीरा मैडम को उठाकर ले जाना है।"
मैंने मीरा के आगे कदम रखा।
"तू मेरी माँ को भी धमकाता है," मैंने कहा। "और मीरा को भी। तुझे शर्म नहीं आती?"
"शर्म?" लुट्टन हँसा। हँसी में दाँत दिखे, एक दाँत टूटा हुआ था। "शर्म उनके लिए है जिनके पास कुछ बचा हो। मेरे पास सिर्फ़ भैरव सर हैं।"
वो लाठी उठा ही रहा था कि पीछे से आवाज़ आई।
"लुट्टन।"
बलवंत आगे आया। वो हरनाम के साथ खड़ा था, पर अब उसने एक कदम आगे बढ़ाया और लुट्टन के सामने आ गया।
"मैं भैरव के लिए नहीं आया," बलवंत ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, भारी। "मैं अपने भाई के लिए आया हूँ। हरनाम ने मुझे बताया — भैरव ने उसके बेटे को मार डाला। मुन्ना को। मेरे भतीजे को।"
लुट्टन का हाथ रुक गया।
"बलवंत भाई," वो बोला, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ नरमी आई, "तुम ग़लत समझे हो। भैरव सर ने…"
"मैंने उसकी कॉपी देखी है," बलवंत ने कहा। "हरनाम ने मुझे दिखाई। भैरव की लिखाई में — 'मुन्ना, तीसरी खुराक।' तेरे भैरव सर ने मेरे भतीजे को खुराक लिखा है। खुराक, लुट्टन। जैसे कोई दवा हो।"
लुट्टन पीछे हटा। एक कदम। दो कदम।
"मैं… मैं नहीं जानता," वो बोला। "मैं तो बस…"
"तू बस क्या?" बलवंत ने कहा। "तू बस पीता है, यही ना? वो पानी। जो तुझे ताकत देता है और अंदर से खोखला कर देता है। देख अपनी आँखें — पीली पड़ गई हैं। देख अपने हाथ — काँप रहे हैं। तू मर रहा है, लुट्टन। और वो आदमी तुझे मरने दे रहा है।"
लुट्टन ने अपने हाथों को देखा। सच में काँप रहे थे।
पर फिर उसने सिर हिलाया। ज़ोर से। जैसे कोई सपने से जगा रहा हो।
"नहीं," वो बोला। "भैरव सर मेरे पिता जैसे हैं। उन्होंने मुझे सड़क से उठाया था।"
"उन्होंने तुझे सड़क से उठाया," कालू काका ने धीरे से कहा, "ताकि तू उनकी सड़क पर चले। और जिस दिन तू उनकी सड़क से हटेगा, उस दिन वो तुझे उसी सड़क पर छोड़ देगा।"
लुट्टन ने लाठी उठाई। उसके पीछे के आदमी भी आगे बढ़े।
"मारो," लुट्टन ने कहा। "सबको मारो।"
पहला वार मेरी तरफ़ आया। मैंने अपनी बाँह ऊपर की, लाठी बाँह पर पड़ी, दर्द की लहर सिर तक गई। पर मैं रुका नहीं। मैंने उस आदमी की कलाई पकड़ी और मरोड़ दी। लाठी गिरी। मैंने उसे उठाया।
बलवंत दो आदमियों से भिड़ गया था। उसका शरीर भारी था, वार भारी। कालू काका ने अपनी लाठी — जो उन्होंने कहीं से उठा ली थी — एक आदमी के पैरों पर दे मारी, और वो गिर पड़ा।
टिंकू दूर खड़ा था। उसके हाथ में कुछ नहीं था। फिर उसने अपनी जेब से एक डिब्बी निकाली — मिठाई की डिब्बी — और ज़ोर से एक आदमी के सिर पर दे मारी। मिठाई बिखर गई। आदमी चकराया, और टिंकू ने उसे धक्का देकर गिरा दिया।
"सॉरी भाई," टिंकू बोला, "पर ये खीर वाली डिब्बी थी। तूने बर्बाद कर दी।"
मीरा ने बक्सा सीने से लगाया हुआ था और पीछे खड़ी थी। उसकी आँखें डरी हुई नहीं थीं। वो गिन रही थी — कौन कहाँ है।
दो आदमी बचे थे। उन्होंने एक-दूसरे को देखा, और फिर लुट्टन की तरफ़ देखा।
लुट्टन अपनी लाठी पकड़े खड़ा था। पर वो आगे नहीं बढ़ा।
"तू आ," मैंने कहा। "अकेला।"
लुट्टन ने लाठी उठाई। पर फिर उसने मेरी आँखों में देखा। मुझे नहीं पता वो क्या देखा — शायद अपनी आँखों का पीलापन, शायद अपने काँपते हाथ, शायद वो सड़क जिस पर वो खड़ा था।
उसने लाठी नीचे कर दी।
"भैरव सर तुम सबको मिट्टी में मिला देंगे," वो बोला। आवाज़ में गुस्सा था, पर उस गुस्से में डर भी था। "तुम नहीं जानते वो क्या है। तुमने उसका असली चेहरा नहीं देखा।"
वो पलटा। भागते वक़्त उसका हाथ बक्से से टकरा गया — वो बक्सा जो मीरा ने नीचे रख दिया था। ढक्कन खुल गया।
लुट्टन भाग गया। उसके आदमी भी। उनके पैरों की आवाज़ दूर गई, और फिर सिर्फ़ झींगुर बचे।
मैंने साँस रोकी हुई थी। अब छोड़ी। मेरी बाँह जल रही थी।
बलवंत ने अपनी कोहनी पकड़ी हुई थी। खून नहीं था, बस सूजन।
"बलवंत भाई," मैंने कहा, "तू हमारे साथ आया। क्यों?"
वो कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "मैंने भैरव का पानी पीना छोड़ दिया है। दो हफ़्ते से। और जबसे छोड़ा है, मुझे नींद आती है। सच में आती है। बीस साल में पहली बार।" उसने अपनी हथेली खोली, देखी, फिर बंद कर ली। "मैं उसका दिया हुआ हूँ। पर मैं उसका बना हुआ नहीं हूँ। ये फर्क समझ ले।"
कालू काका ने बक्से की तरफ़ देखा। ढक्कन खुला था।
"बेटा," उन्होंने कहा, "बक्सा।"
मैं बक्से के पास गया। अंदर जो था, वो मैंने उम्मीद नहीं किया था।
एक पुरानी कुंजी थी। लोहे की, जंग लगी, पर मोटी — अलमारी वाली चाबी से बड़ी। और उसके साथ एक सूखा हुआ फूल। पीला फूल, जो दबकर काग़ज़ जैसा हो गया था।
मीरा ने कुंजी उठाई। उसने उसे उँगलियों में घुमाया, रोशनी में देखा।
"ये तो बहुत पुरानी है," वो बोली। "मेरे पापा की अलमारी की चाबी ऐसी नहीं है। ये किसी और चीज़ की है।"
कालू काका ने कुंजी मीरा के हाथ से ली। उन्होंने उसे अपनी आँखों के पास लाया, जैसे कोई पुराना अक्षर पढ़ रहे हों।
उनके हाथ रुक गए।
"यही है," उन्होंने धीरे से कहा। "अलमारी की दूसरी चाबी।"
"पर ये तो बक्से में थी," मैंने कहा। "भैरव ने खुद कहा कि दूसरी चाबी तेरे पास है।"
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