Spirit of a Fighter – Chapter 244
मैंने यही पल देखा था। मैं मीरा के पीछे था, और मेरा हाथ अब भी मुंदरी में बंद था। मैंने धीरे से उसे अपनी जेब में डाला और अपना हाथ आगे बढ़ाया।
"लुट्टन," मैंने कहा। "एक बात सुन। भैरव ने तुझे बताया होगा कि तू उसका है। पर उसने तुझे ये नहीं बताया होगा कि वो खुद किसका है।"
लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा।
"वो अपनी माँ का था," मैंने कहा। "और उसने अपनी माँ को भुला दिया। जो आदमी अपनी माँ को भूल जाए, वो किसी का नहीं होता, लुट्टन। वो सिर्फ़ खुद का होता है। और जो सिर्फ़ खुद का हो, वो किसी को बचाता नहीं। वो सिर्फ़ इस्तेमाल करता है।"
लुट्टन की लाठी धीरे से नीचे आई। एक इंच। बस एक इंच।
और तभी अंधेरे में से एक और लाठी आई।
वो सीधे लुट्टन के हाथ पर पड़ी। ज़ोर से। लुट्टन चीखा और लाठी छोड़कर पीछे हटा। उसके आदमी पलटे, पर तभी उनके सामने एक आदमी आकर खड़ा हो गया — लंबा, चौड़ा, चेहरे पर दाढ़ी, आँखों में वो आग जो सिर्फ़ बदले की होती है।
"अपनी बहन पर लाठी?" उसने कहा। उसकी आवाज़ गरज रही थी। "शर्म नहीं आती?"
लुट्टन ने उसे देखा और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"बलवंत?" वो फुसफुसाया। "तू… तू यहाँ?"
बलवंत। हरनाम का भाई। भैरव का आदमी। पर अभी, इस वक़्त, वो भैरव का आदमी नहीं लग रहा था।
मैंने मीरा का हाथ पकड़ा और उसे अपने पीछे किया। "बलवंत," मैंने कहा। "तू यहाँ क्यों आया?"
बलवंत ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो आग थी, पर उसमें कुछ और भी था — दर्द। जैसे किसी ने उसकी छाती से कुछ निकाल लिया हो।
"मेरे भाई ने," वो बोला, और उसकी आवाज़ काँपी, "आज सुबह मुझे बताया कि भैरव ने उसके बेटे को मार डाला। मुन्ना को। मेरे भतीजे को।" उसने लुट्टन की तरफ़ देखा। "और मैंने बीस साल तक उसी भैरव की वर्दी पहनी। बीस साल।"
उसने अपनी लाठी उठाई। "अब तू जाकर भैरव से कह — अगली लाठी उसकी छाती पर पड़ेगी।"
लुट्टन के आदमी पीछे हटे। लुट्टन ने अपना हाथ पकड़ा, जो लाल हो रहा था। उसने एक बार मीरा को देखा, एक बार मुझे, और फिर वो पलटकर भागा। उसके आदमी भी भागे।
मंदिर में सिर्फ़ हम बचे — मैं, मीरा, टिंकू, कालू काका, और बलवंत।
बलवंत ने लाठी नीचे रखी। उसकी साँसें भारी थीं। वो मेरी तरफ़ आया और उसने मेरी आँखों में देखा।
"मुझे नहीं पता," वो बोला, "कि तू मुझ पर भरोसा करेगा या नहीं। मैंने तेरे साथ धोखा किया था। तेरे पीछे पड़ा था। पर अब मैं…"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
वो रुका।
"तेरी साँस में अब वो गंध नहीं है," मैंने कहा। "वो कड़वाहट। जो भैरव के आदमियों की साँस में होती है। तूने पीना छोड़ दिया है।"
बलवंत हँसा — एक टूटी हुई हँसी। "नहीं छोड़ा। भैरव ने आज सुबह मुझे भी गिलास दिया था। पर मैंने उसे ज़मीन पर गिरा दिया। क्योंकि मुन्ना मरे हुए दो दिन हो गए थे, और भैरव ने उसके लिए एक भी आँसू नहीं बहाया।"
मीरा ने मेरा हाथ छोड़ा और बलवंत के पास गई। उसने उसका हाथ देखा — कलाई, उँगलियाँ, नाखून।
"तू अभी भी ठीक हो सकता है," वो बोली। "पर तुझे अभी से रुकना पड़ेगा। और तुझे रोज़ तहखाने की मिट्टी में बैठना पड़ेगा।"
बलवंत ने उसे देखा। "तहखाने की मिट्टी? वो तो भैरव…"
"वो मिट्टी भैरव की नहीं है," कालू काका ने कहा। वो आगे आए। "वो मिट्टी उस मंदिर की है जो इस अखाड़े से पहले यहाँ था। और वो किसी की जागीर नहीं है। जो उसमें बैठे, वो ठीक हो जाए।"
बलवंत की आँखें भर आईं। उसने सिर झुकाया।
टिंकू ने अपना डंडा नीचे रखा और लंबी साँस छोड़ी। "अच्छा," वो बोला, "तो अब मैं किसे मारूँ?"
सब हँसे। डर के बीच भी। मेरे पेट से हँसी निकली — वो हँसी जो इंसान तब हँसता है जब उसे लगता है कि अब ज़िंदा रहेगा।
मैंने बक्सा उठाया। काग़ज़, चाबी, मुंदरी — सब अंदर रखा और उसे अपनी छाती से लगाया।
"अब?" कालू काका ने पूछा।
"अब भैरव के पास जाना है," मैंने कहा। "और उसे उसकी माँ का नाम याद दिलाना है।"
बाहर निकले तो आसमान साफ़ था। सितारे दिख रहे थे। मीरा मेरे बगल में चल रही थी, और उसका कंधा मेरे कंधे से टकरा रहा था — हर कदम पर। मैंने उसे रोका नहीं।
नहर के मोड़ पर रणवीर सिंह मिले। उन्होंने हमें देखा, फिर बलवंत को देखा, और उनका चेहरा बदल गया।
"ये…" वो बोले।
"अब ये हमारा है," मैंने कहा। "पापा।"
रणवीर सिंह ने बलवंत को देखा। बलवंत ने सिर झुकाया। और रणवीर सिंह ने — मुझे यकीन नहीं हुआ — अपना हाथ बढ़ाया और बलवंत का कंधा थामा।
"तेरे भाई का बेटा," वो बोले। "उसकी आत्मा को शांति मिले।"
बलवंत की आँखों से पानी बहा। उसने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली।
और तभी पीछे से, अखाड़े की तरफ़ से, एक आवाज़ आई — भैरव की आवाज़। वो दीवार पर चढ़ा खड़ा था, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। घबराहट।
"वीर सिंह!" वो चिल्लाया। "तूने मेरी माँ का बक्सा खोला?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरे हाथ में बक्सा था।
"हाँ," मैंने कहा। "और तेरी माँ ने तुझे एक नाम दिया था। याद है?"
भैरव की मुट्ठी दीवार पर कस गई। मैंने देखा — उसके हाथ काँप रहे थे।
"वो नाम मेरा नहीं है," वो बोला। पर उसकी आवाज़ में वो यकीन नहीं था।
"शांतनु," मैंने कहा। धीरे से। इतना धीरे कि सिर्फ़ वो सुन सके। "तेरी माँ तुझे शांतू बुलाती थी।"
भैरव दीवार पर खड़ा रहा। एक पल। दो पल। तीन पल।
और फिर उसने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।
वो रोया। दीवार पर खड़ा, जंगल का जानवर, बीस साल का ज़हर बनाने वाला — और वो रोया। किसी बच्चे की तरह।
मैंने बक्सा मीरा को दिया और दीवार की तरफ़ बढ़ा।
"अभी भी वक़्त है," मैंने कहा। "नीचे आ। हम सब बात करें। तेरी माँ ने कहा है — तू मेरा बेटा है।"
भैरव ने हाथ नीचे किए। उसका चेहरा गीला था। आँखें लाल थीं। पर उनमें वो ठंडक अभी भी थी — कम, पर थी।
"मेरी माँ," वो बोला, और उसकी आवाज़ फटी हुई थी, "मर गई। जिस दिन मैंने पहला ज़हर बनाया, उस दिन वो मर गई।"
"नहीं," कालू काका ने कहा। वो आगे आए। "वो उस दिन मरी जिस दिन उसने तुझे भैरव होते देखा। वो मरने से पहले मुझसे कह गई थी — 'कालू, मेरा शांतू अभी ज़िंदा है। उसे जगाना।'"
भैरव ने कालू काका को देखा। उसकी आँखों में कुछ टूटा।
"तू झूठ बोल रहा है," वो बोला। "तू हमेशा से…"
"मैं झूठ नहीं बोलता," कालू काका ने कहा। "मैं मिट्टी सींचता हूँ। मिट्टी झूठ नहीं बोलती।"
भैरव ने एक कदम पीछे किया। उसका पैर फिसला। वो दीवार पर लड़खड़ाया।
और उस पल में, मुझे लगा कि वो गिरेगा। मैंने अपना हाथ बढ़ाया।
पर वो नहीं गिरा। उसने खुद को सँभाला। और फिर उसने वो किया जो मुझे उम्मीद नहीं थी — उसने अपनी जेब से एक चाबी निकाली और मेरी तरफ़ फेंकी।
चाबी हवा में घूमी और मेरे पैरों के पास गिरी।
"ये अलमारी की पहली चाबी है," भैरव ने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी। "दूसरी तेरे पास है। अब जा और खोल। जो देखना है देख ले।"
वो पलटा और अंधेरे में चला गया। उसकी आवाज़ दूर से आई — "पर वीर सिंह, एक बात याद रख। मैंने तुझे चाबी दी है, अपनी माँ नहीं।"
हम सब वहीं खड़े रहे। चाबी ज़मीन पर पड़ी थी, चाँदनी में चमक रही थी।
टिंकू ने पहले कुछ नहीं कहा। फिर बोला, "ये आदमी पागल है।"
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