Spirit of a Fighter – Chapter 257
भैरव ने एक कदम आगे बढ़ा। उसकी मुस्कान हल्की हो गई थी, जैसे घी कम पड़ जाए तो मिठाई की चमक चली जाती है।
"चाचा जी," उसने कहा, "ये बातें यहाँ नहीं। घर चलकर…"
"घर?" रणवीर सिंह ने कहा। "जिस घर में तूने मेरी दवा में ज़हर घोला, उसे घर कहूँ? जिस घर में तूने मेरे भाई को कुएँ में गिराया, उसे घर कहूँ?"
भैरव का चेहरा बदला। मुस्कान गई, और उसकी जगह वो चीज़ आई जो कुएँ में होती है — गहरी, अंधेरी, बिना तल की।
"सबूत?" उसने धीरे से कहा। "बीस साल पुरानी बातें, चाचा जी। किसके पास सबूत है?"
"मेरे पास।"
ये आवाज़ कालू काका की थी। वो दीवार के पास से हिले। उनकी कमर झुकी हुई थी, पर उनके पैर सीधे मिट्टी पर टिके थे। उन्होंने अपनी धोती की गाँठ से एक चीज़ निकाली। मैंने देखा — एक छोटी, पीली, मुड़ी हुई पर्ची।
"ये मुझे कुएँ के पत्थर के नीचे से मिली थी," उन्होंने कहा। "बीस साल पहले। उस रात। जिस रात रघुवीर को कुएँ में गिराया गया था। मैंने इसे छुपाया। डर के मारे।"
उनकी आवाज़ में कोई काँप नहीं थी। आज नहीं।
"आज डर खत्म हो गया," कालू काका ने कहा, और पर्ची रणवीर सिंह की तरफ़ बढ़ा दी।
भैरव ने एक कदम आगे बढ़ा, पर मैंने अपना हाथ बीच में कर दिया। मेरी छाती में धक-धक हो रही थी, पर मेरा हाथ नहीं काँपा।
"नहीं," मैंने कहा। "अब तू किसी चीज़ के करीब नहीं आएगा।"
रणवीर सिंह ने पर्ची पकड़ी। उनके हाथ काँप रहे थे, पर उन्होंने उसे खोला। उनकी आँखें उस पर चलीं, और फिर वो ऊपर उठीं और सीधी भैरव पर टिक गईं।
"ये रघुवीर की लिखाई है," उन्होंने कहा। "और ये तेरा नाम है। 'भैरव ने कुएँ के पानी में पुड़िया डालते देखा। मुझे डर है, रणवीर। अगर मैं कल तक न रहूँ, तो ये बात सबको बताना।'"
हवा रुक गई। मैदान में खड़े हर आदमी ने साँस रोक ली।
भैरव हँसा। पर वो हँसी नहीं थी — वो आवाज़ थी जो आदमी के गले से तब निकलती है जब उसके अंदर कुछ टूटता है।
"पुरानी पर्ची," उसने कहा। "बीस साल पुरानी। कोई नहीं मानेगा।"
"मैं मानूँगा।"
इस बार आवाज़ मीरा की थी। वो अपने पिता की कुर्सी के पास से आगे आई। उसके हाथ में वो लाल रंग की फ़ाइल थी जो उसने लैब से लाई थी। और उसके बाद वो पीली पर्ची, जो श्यामू की झोपड़ी की दीवार में छिपी थी।
"ये लैब रिपोर्ट है," मीरा ने कहा। "इस पानी में वो ज़हर है जो आदमी को ताकत देता है और उम्र खा जाता है। और ये पर्ची — इस पर भैरव की अपनी लिखाई है। 'बलवंत को तीसरी खुराक।'"
वो भीड़ की तरफ़ मुड़ी।
"आप में से कितने हैं," उसने कहा, "जिन्होंने भैरव का पानी पिया? कितनों की कमर में आज दर्द है? कितनों की साँस फूलती है?"
सन्नाटा। फिर एक आदमी हिला। फिर दूसरा।
"मैंने पिया था," एक बूढ़ा पहलवान बोला, आवाज़ काँपती हुई। "तीन बरस पहले। वो कहता था ताकत आएगी। आई भी। पर अब मैं दो कदम चलकर थक जाता हूँ।"
"मैंने भी," दूसरे ने कहा।
"मैंने भी।"
आवाज़ें उठने लगीं, एक-एक करके, जैसे बारिश की बूँदें पहले अलग-अलग, फिर साथ-साथ।
भैरव के चेहरे पर अब वो ठंडक नहीं थी। अब वहाँ खालीपन था। वो पलटा, देखा — लुट्टन दीवार के पास खड़ा था, उसके आदमी हथियार नीचे कर रहे थे। बलवंत अलग खड़ा था, आँखें झुकी हुईं। बब्बर मिट्टी में खड़ा था, अपनी कमर पर हाथ रखे।
किसी ने भी उसकी तरफ़ नहीं देखा।
भैरव ने एक गहरी साँस ली। फिर वो मुड़ा और रणवीर सिंह की तरफ़ बढ़ा। मैंने अपना हाथ थोड़ा और ऊपर किया, पर रणवीर सिंह ने अपनी उँगली उठाकर मुझे रोक दिया।
"छोड़ दे," उन्होंने कहा। "मैं उससे बात करूँगा।"
भैरव रुका। वो रणवीर सिंह के सामने खड़ा था, और उसकी तरफ़ देख रहा था — नीचे, कुर्सी पर बैठे आदमी की तरफ़। पर उसकी आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो जीतने वाले की आँखों में होती है।
"तू मेरा भतीजा है," रणवीर सिंह ने कहा, आवाज़ अब भी कमज़ोर, पर साफ़। "मैंने तुझे अपने हाथों से मिट्टी में उतारा था। चार साल का था तू, जब पहली बार अखाड़े में आया। मेरी उँगली पकड़कर चला था। तेरे पैर मिट्टी में धँसे थे और तू हँस रहा था।"
भैरव के होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"मैंने तुझे पहलवान बनाया," रणवीर सिंह ने कहा। "तूने मुझे कुर्सी पर बिठाया।"
उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। उसमें कुछ और था — वो चीज़ जो बीस साल से दबी थी और आज बाहर आ रही थी।
भैरव ने अपना मुँह खोला, जैसे कुछ कहना चाहता था। पर उससे पहले रणवीर सिंह ने अपना हाथ उठाया। उनका हाथ काँप रहा था, पर वो उठा। और उन्होंने उसे मेरी तरफ़ कर दिया।
"ये लड़का," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार भरी हुई थी, "मेरे अखाड़े की मिट्टी में खड़ा है। और आज से ये मेरा भी लड़का है।"
मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी ऐसे लगी जैसे गरम हो गई हो। मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने अपनी नज़र नीचे की, अपने पैरों पर, उस लाल मिट्टी पर जो मेरे नाखूनों में भरी थी।
मैंने सुना — दूर, दीवार के पास, किसी ने अपना मुँह दुपट्टे से ढका। मैंने सिर उठाया। माँ खड़ी थीं, दीवार के सहारे, और उनका दुपट्टा उनके मुँह पर था। उनकी आँखों से पानी बह रहा था, पर वो चुप थीं। सिर्फ़ उनके कंधे हिल रहे थे।
गुड़िया उनके पास खड़ी थी। उसने अपनी कॉपी सीने से लगाई हुई थी और वो ज़ोर-ज़ोर से हँस रही थी — वो हँसी जिसमें रोना छिपा होता है।
टिंकू ने अपनी थाली नीचे रख दी। उसके हाथ अब नहीं काँप रहे थे। वो मेरी तरफ़ देख रहा था और उसके होंठ हिल रहे थे — मैं जानता था वो क्या कह रहा था। "मैंने कहा था। मैंने कहा था न।"
रणवीर सिंह ने अपना हाथ नीचे किया।
"अब," उन्होंने भैरव से कहा, "तू जा। आज रात तक अखाड़े से बाहर रह। कल सुबह जो होगा, सबके सामने होगा।"
भैरव ने उनकी तरफ़ देखा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ चमका — कुछ ऐसा जो मैंने पहले नहीं देखा था। शायद डर। शायद वो चीज़ जो आदमी के अंदर तब जागती है जब उसके हाथ से सब कुछ फिसल रहा हो।
वो पलटा। उसने दो कदम लिए।
फिर रुका।
और वो पलटकर रणवीर सिंह की तरफ़ झुका। मैंने सोचा वो कुछ कहेगा, कोई धमकी, कोई आख़िरी बात। पर वो चुप था। वो रणवीर सिंह के कान के पास झुका, इतने पास कि उसकी मूँछें उनके गाल को छू गईं।
और उसने धीरे से कहा — इतना धीरे कि मैंने सुना भी तो बस इसलिए कि मैं सबसे करीब खड़ा था।
"चाचा जी, आप भूल गए? आपकी दवा अभी मेरे कमरे में रखी है। और आज रात की खुराक में मैंने कुछ नया मिलाया है।"
रणवीर सिंह का चेहरा बदला। एक पल में। जैसे किसी ने पत्थर पर पानी डाल दिया हो — सारा रंग बह गया। उनके होंठ सफ़ेद हो गए। उनकी उँगलियाँ कुर्सी के हत्थे पर कस गईं, इतनी कस कि नाखून सफ़ेद दिखने लगे।
भैरव सीधा हुआ। उसके चेहरे पर वो मुस्कान लौट आई थी — मीठी, गुड़ जैसी, कुएँ जैसी ठंडी।
"कल सुबह, चाचा जी," उसने कहा। "मैदान में।"
और वो चला गया। इस बार उसके कदमों की आवाज़ मिट्टी में दबी नहीं — वो साफ़ सुनाई दी। हर कदम। दीवार तक, दरवाज़े तक, बाहर तक।
मैं रणवीर सिंह के पास गया। उनका चेहरा अब भी सफ़ेद था।
"क्या कहा उसने?" मीरा ने पूछा। उसने अपने पिता का हाथ पकड़ लिया। "पापा, उसने क्या कहा?"
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