Spirit of a Fighter – Chapter 25
अखाड़े की दीवार वही थी। ईंटों के बीच वो छेद भी वही था, जिससे मैंने बचपन में सैकड़ों बार झाँका था। पर आज मैंने छुपकर झाँका। मेरी साँस धीमी थी, और मेरे हाथ दीवार को टटोल रहे थे, जैसे वो भी मुझे पहचानना चाह रहे हों।
अंदर बत्ती जल रही थी। भैरव का कमरा। दरवाज़ा खुला था। मैंने आँख सिकोड़ी।
भैरव अंदर थे। उन्होंने लोहे की उस अलमारी का ताला खोला — वही अलमारी जिसकी चाबी हमेशा उनकी कमर में बंधी रहती थी। अंदर से उन्होंने एक बोतल निकाली। फिर दूसरी। फिर एक छोटा-सा काग़ज़ का पुड़िया निकाला।
मेरी नाक अपने आप हिलने लगी। मैंने गहरी साँस खींची। हवा में वो गंध आई — गुड़ जलने जैसी मिठास, और उसके नीचे वो कड़वाहट जो गले में चुभती है। वही गंध जो लुट्टन के पसीने में थी।
भैरव ने पुड़िया खोली और उसका कुछ पाउडर पानी में डाला। फिर उन्होंने बोतल हिलाई। धीरे-धीरे, पूरे मन से। जैसे कोई चाय बना रहा हो। जैसे कोई किसी को खाना खिलाने जा रहा हो।
मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई।
तभी मेरी नाक से पहली बूँद गिरी। गर्म। मैंने हाथ लगाया तो उँगली लाल हो गई। तीसरी बार नहीं — चौथी बार। इस महीने। मैंने आँखें बंद कर लीं।
अंदर से भैरव की आवाज़ आई। वो किसी से बात कर रहे थे, पर कोई और नहीं दिख रहा था। शायद अपने आप से। "अब बहुत हो गया," वो बोले। "एक-एक करके सबको पिलाना पड़ेगा। जो न पिए, उसे निकालना पड़ेगा। और रणवीर का खून…"
वो रुके। बोतल को रोशनी के सामने उठाया, और उसकी तरफ़ देखा। "तेरे पापा ने भी यही पिया था, बेटा। और तेरे पापा के पापा ने भी। ये खून में है।"
मेरा दिल किसी और की छाती में धड़क रहा था। या फिर मेरी छाती में कोई और धड़क रहा था।
मैंने खून पोंछा। गुड़िया की दी हुई मिट्टी मेरी जेब में थी। मैंने उसे हाथ में लिया। ठंडी, भुरभुरी, चुप।
"ये पानी किसी को भी नहीं पीना चाहिए," मैंने धीरे से कहा। अपने आप से। बस इतना कहने के लिए कि मेरी आवाज़ अभी भी मेरी है।
और तभी अंदर से भैरव की आवाज़ आई, साफ़ और सीधी, जैसे मेरे कान के ठीक पास से आई हो।
"कौन है बाहर?"
मेरी साँस थम गई।
मैं दीवार से चिपक गया। मेरे पैर जम गए। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे लगा भैरव उसे भी सुन लेंगे। मैंने मुँह खोला, पर आवाज़ नहीं निकली।
अंदर कुर्सी खिसकने की आवाज़ आई। फिर पैरों की। भैरव का दरवाज़ा और खुला। उनका भारी शरीर दहलीज़ पर आया।
"कालू?" भैरव की आवाज़ में अब मिठास नहीं थी। सिर्फ़ ठंडक। "कालू, तू है?"
मैं दीवार के साए में सरक गया। मेरे कंधे पर पुरानी चोट फिर उभर आई, और मेरी नाक से अभी भी खून रिस रहा था। मैंने धोती का कोना मुँह पर दबाया।
भैरव बाहर आए। मिट्टी पर उनके पैरों की आवाज़ सुनाई दी — धीमी, भारी, गिनती करते हुए। चार कदम। पाँच। छह। वो दीवार की तरफ़ बढ़ रहे थे।
मेरी पीठ दीवार से चिपकी थी। मैंने आँखें बंद कर लीं और भगवान को याद किया — नहीं, भगवान को नहीं, अपने पापा को। रघुवीर को। मैंने मन में कहा, पापा, अगर तुम सुन रहे हो, तो इस वक़्त मुझे बचा लो।
और फिर आवाज़ आई। अखाड़े के पिछले हिस्से से — कुएँ की तरफ़ से। कोई लकड़ी गिरी थी। एक झटका सा।
भैरव के कदम रुके। वो पलटे। "कौन?" वो बोले, और कुएँ की तरफ़ तेज़ी से बढ़ने लगे।
मैंने उस एक पल का फ़ायदा उठाया। मैं दीवार के साए से खिसककर पीछे की तरफ़ भागा — वही रास्ता, जो कुएँ से दूर, नहर की तरफ़ जाता था। मेरी चप्पल की आवाज़ मुझे डरा रही थी, पर मैं रुका नहीं।
पीछे से भैरव की आवाज़ आई, पर अब वो कुएँ के पास थी। "चल, चल। भाग। आज रात तो मैं तुझे छोड़ देता हूँ। सुबह तेरे लिए मैदान तैयार है।"
वो जानता था। वो मुझे जानता था। वो मेरी आवाज़ से नहीं — मेरी नाक से, मेरी गंध से। वो जानता था कि दीवार के उस पार कौन खड़ा था।
मैं घर पहुँचा तो मेरी साँस फूल रही थी। दरवाज़े पर माँ खड़ी थीं। वो सोई नहीं थीं। वो जानती थीं कि मैं गया हूँ। उन्होंने मेरा चेहरा देखा — खून से सना हुआ, और आँखों में वो डर जो मैं छुपा नहीं पाया।
वो कुछ नहीं बोलीं। बस पानी का लोटा लाईं, अपनी साड़ी का कोना भिगोया, और मेरा चेहरा पोंछा। उनके हाथ मेरे गाल पर वैसे ही रुके जैसे बचपन में बुखार में रुकते थे। "कल सुबह," वो बोलीं, "मैं भी चलूँगी।"
"माँ—"
"मैं चलूँगी," उन्होंने दोहराया। और उनकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो माँ की चक्की में थी — पत्थर से पत्थर की ज़िद। "जिस अखाड़े ने मेरे पति को खाया, मैं उसके मुँह में अपने बेटे को अकेले नहीं भेजूँगी।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। मेरी आँखें भर आईं — खून से नहीं, नींद से नहीं, किसी और चीज़ से जो अंदर से उठ रही थी। "माँ, मैं उसका पानी नहीं पीऊँगा।"
"मुझे पता है।" उन्होंने मेरा माथा चूमा। "तू तो पहली बार में ही रुक गया। बीस साल पहले तेरे पापा रुके नहीं। पर तू रुक गया।" और फिर उन्होंने धीरे से जोड़ा, "अब जाकर सो। सुबह जो होगा, उसके लिए ताकत चाहिए। और ताकत भूख से आती है।"
वो अंदर चली गईं। मैं आँगन में खड़ा रहा। चाँद ढल रहा था और आसमान में पहली सुबह की सुर्खी उभर रही थी। मेरी जेब में गुड़िया की मिट्टी थी, और मेरी धोती की कमर में पापा का वो पीला काग़ज़। मैंने उसे निकाला, एक बार देखा। कोयले से लिखी वो लाइन — "मेरे बाद कोई और न पीए।"
"नहीं पिएगा, पापा," मैंने धीरे से कहा। "आज से नहीं पिएगा।"
सुबह जब मैं अखाड़े पहुँचा, तो सूरज निकल चुका था। गेट पर कालू काका झाड़ू लगा रहे थे। मुझे देखा, झाड़ू रोक दी। उनकी आँखों में रात भर की जागी उनींद थी, और मुझे देखते ही उनके चेहरे पर कुछ बदला।
"तू आज रात भर जागा?" उन्होंने पूछा। हल्की मुस्कान, पर आँखें गंभीर।
मैंने सिर हिलाया।
"अच्छा किया," वो बोले। और फिर धीरे से जोड़ा, "जो सोता है, वो पहलवान नहीं होता। पर जो रात भर जागता है, वो भी नहीं होता। आज शाम को तेरी नींद मैं खुद पहरा दूँगा। पहले उतर, वो लड़ाई लड़, फिर सो जा जितनी देर सोनी हो।"
अंदर खेल का मैदान तैयार हो रहा था। नई मिट्टी आ चुकी थी — भैरव का हुक्म था। पर जब मैंने उस मिट्टी को देखा, तो मेरी नाक ने साफ़ बता दिया — ये मरी हुई मिट्टी थी। कोई गंध नहीं, कोई जान नहीं। फिर भी भैरव चाहते थे कि मैं इसमें उतरूँ।
कालू काका मेरे पास आए, धीरे से बोले, "ये मिट्टी गंगा किनारे से लाई है। इसमें कोई दम नहीं। उन्हें पता है। पर वो तुझे इसी में उतारेंगे। हार का डर है उन्हें।"
"तो मैं क्या करूँ?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक थी जो रात के अंधेरे में दीपक जैसी लगती है। "तू आज अंदर जाकर उस मिट्टी में उतर। पर जब तक सब बाहर देख रहे हों, तू मेरी बात ध्यान से सुन।"
वो मेरे कान के पास आए।
"तू आज उस मिट्टी में उतरेगा जो तुझे नहीं मानती। पर तेरे पैरों के नीचे मैं पुरानी मिट्टी की एक परत बिछा दूँगा — वो मिट्टी जिसमें तेरे पापा ने पसीना डाला था। वो परत भैरव की मिट्टी की जड़ में रहेगी। तू उस पर खड़ा होगा। तेरे पैर जब जानेंगे कि नीचे उनकी मिट्टी है, तो तेरा दाँव भैरव की मिट्टी से नहीं, अपनी मिट्टी से उठेगा।"
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