Spirit of a Fighter24 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 24

7 min read November 5, 2026

आँगन में सन्नाटा छा गया। चक्की भी रुक गई। माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो पानी था जो बीस साल से रुका हुआ था।

"मैंने किसी को कुछ नहीं बताया," उन्होंने कहा। "क्योंकि मेरे पास तेरे पापा के सिवा कुछ नहीं था। और तेरे पापा के बाद तू था। मैं तुझे भैरव के सामने नहीं लाना चाहती थी। पर तू अखाड़े की मिट्टी में खेलने लगा। और मैंने सोचा — मिट्टी तेरे पापा की है। मिट्टी तुझे बचाएगी।"

वो उठीं। मेरे सिर पर हाथ रखा। उनका हाथ काँप रहा था।

"मैं तुझे बीस साल बचाती रही, वीर। आज तेरे हाथ में वो गिलास आया और तूने नहीं पिया।" माँ की आवाज़ टूटी। "तेरे पापा बीस साल पहले रुक नहीं पाए थे। तू रुक गया।"

मेरी आँखें भर आईं। मैंने उनका हाथ पकड़ा। आटे की गंध, पसीने की गंध, और उनके हाथ की गर्मी — तीनों एक साथ।

"माँ," मैंने कहा। "मैं वो पानी नहीं पीऊँगा। और मैं उस मिट्टी में उतरूँगा जो मुझे मानती है।"

उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरा हाथ दबाया। और मैं समझ गया कि यही उनका हाँ था।

शाम को मैं अखाड़े लौटा। मन में एक ही बात थी — कि भैरव को पता चलना चाहिए कि उसका पानी अब किसी को नहीं मारेगा।

पर वो पहले से जानता था। मुझे नहीं पता था कि वो जानता था।

मैं जैसे ही गेट से अंदर पैर रखने वाला था, भैरव की आवाज़ आई। वो अंधेरे में खड़े थे। बस मिट्टी के पास। कालू काका के कंधे पर हाथ रखा था।

"इस लड़के की नाक कुछ ज़्यादा तेज़ है," भैरव ने धीरे से कहा। "इस पर नज़र रख।"

मैं जम गया। मेरा पैर दहलीज़ पर ही रुका रहा। मेरी साँस मेरे सीने में रुक गई।

कालू काका ने कुछ नहीं कहा। पर मैंने उनका कंधा देखा। वो काँप रहा था।

और भैरव पलटे। अंधेरे में उनका चेहरा नहीं दिख रहा था, पर मुझे लगा जैसे वो मेरी तरफ़ ही देख रहे हैं। मेरी तरफ़ नहीं — मेरी नाक की तरफ़। जैसे वो उसे नाप रहे हों।

फिर वो बोले, आवाज़ में वही मिठास। "वीर! आ गया? अच्छा किया। कल सुबह नई मिट्टी आएगी। तू उसमें उतरेगा। और मैं तेरा पहला दाँव देखूँगा।"

मैंने गला साफ़ किया। "जी सर।"

पर मेरा दिल कह रहा था — भैरव, तूने आज अपना सच बोल दिया। और अब मुझे पता है कि तू कैसे हारता है। तू ताकत बेचता है। और मैं वो ताकत खरीदने नहीं आया।

॥

जब मैं घर की तरफ़ मुड़ा, तो पैर मेरे कहे नहीं चल रहे थे। भैरव की आवाज़ अब भी कान में बज रही थी — "तू उसमें उतरेगा, और मैं तेरा पहला दाँव देखूँगा।" कहने में बड़ी बात लगती है। पर उसकी आवाज़ में जो मिठास थी, वो मुझे चीनी से ज़्यादा ज़हर लग रही थी।

रास्ते में नहर का मोड़ आया। चाँद निकल आया था, पानी में उसकी चमक काँप रही थी। मैंने हाथ धोने के लिए झुकना चाहा ही था कि सामने से कोई आ रहा है, तेज़ कदमों से।

मीरा।

उसके कंधे पर वही किताबों का बैग था, हाथ में एक छोटी टॉर्च। मुझे देखकर उसके कदम रुके। फिर वो और पास आई, टॉर्च थोड़ी नीची की ताकि मेरी आँखों में न लगे।

"तुम्हें क्या हुआ?" उसने पूछा। "तुम्हारा चेहरा ऐसा क्यों है?"

"कुछ नहीं।"

"झूठ मत बोलो।" उसकी आवाज़ वैसी ही थी — कोर्ट में बहस वाली, सीधी, बिना घुमाए। "तुम अभी अखाड़े से आ रहे हो। मैंने तुम्हें गेट से निकलते देखा। तुम अंदर गए थे?"

मैंने हाँ में सिर हिलाया।

उसका चेहरा बदल गया। टॉर्च की रोशनी में भी मैंने देखा — माथे पर दो लकीरें, होंठ कसे हुए। "क्या तुमने भैरव का पानी पिया?"

"नहीं।"

उसने एक लंबी साँस छोड़ी। जैसे वो साँस बहुत देर से रोककर रखी हुई थी। फिर उसके कंधे थोड़े ढीले पड़े।

"अच्छा किया," वो बोली, और फिर झिड़क दिया। "उस आदमी से दूर रहो, वीर। जितना दूर रह सको।"

"क्यों?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ में जो सवाल था, वो सिर्फ़ उत्सुकता नहीं थी। उसमें वो सब था जो मैं आज जान चुका था — रघुवीर, कुआँ, और सिर के पीछे लगा वो हाथ।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो वो बोलना चाहती थी। उसने होंठ खोले ही थे कि पीछे से गाड़ी की आवाज़ आई। एक जीप, रोशनी की दो तेज़ किरणें, और फिर वो रुकी।

मीरा का मुँह बंद हो गया। उसने टॉर्च नीची कर ली। "मुझे जाना है," वो जल्दी से बोली। "कल सुबह। अखाड़े के पीछे, कुएँ के पास नहीं — नहर के उस मोड़ पर, जहाँ बबूल का पेड़ है। मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगी। और वीर —" वो रुकी। "जो पानी भैरव देता है, वो पीना मत। कभी मत पीना। तुम्हें नहीं पता कि वो क्या करता है।"

"मुझे पता है," मैंने कहा।

उसने मेरी तरफ़ एक पल देखा। फिर वो पलटी और तेज़ी से चली गई, जीप की तरफ़ नहीं — बाज़ार की गली में। जीप वाला शायद कोई और था।

मैं घर पहुँचा तो आँगन में चक्की की आवाज़ नहीं थी। दरवाज़े पर गुड़िया खड़ी थी, हाथ में कॉपी और मुँह में पेंसिल दबाए हुए।

"भैया!" वो मुझ पर ऐसे झपटी जैसे कई दिन बाद मिली हो। "तू आ गया। माँ कह रही थीं कि तू देर से आएगा। कल तू अखाड़े में उतरेगा ना? सच में?"

मैंने उसके बालों में हाथ फेरा। "हाँ।"

"तो मैं कल स्कूल नहीं जाऊँगी।"

"जाएगी।"

"भैया!"

"जाएगी," मैंने दोहराया, और मुस्कुरा दिया। "और लौटकर सबको बताएगी कि तेरे भैया ने क्या किया।"

उसने मुँह बनाया, पर फिर हँस पड़ी। उसकी हँसी में वो बात थी जो मेरे अंदर अब भी ज़िंदा थी — वो बात जो कहती है, तू कर लेगा।

आँगन में माँ थीं। चक्की के पास बैठी थीं, पर चक्की रुकी हुई थी। उनके सामने आटे की परात थी, और वो हाथ में नमक का डिब्बा पकड़े बैठी थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और कुछ नहीं कहा। बस नमक डाला — और आज नमक ठीक मात्रा में डला। मुझे पता था। मैंने चखा भी नहीं, पर पता था।

वो उठीं, दाल की हाँडी पर ढक्कन रखा, और मेरे पास से गुज़रते हुए मेरे कंधे पर हल्का हाथ रखा। उनके हाथ से हल्दी, आटा और पसीने की गंध आई।

"सुबह जल्दी उठना है," वो बस इतना बोलीं। और आगे बढ़ गईं। उन्होंने आज मुझसे नहीं पूछा कि अखाड़े में क्या हुआ। उन्होंने मुझे रोका नहीं। उन्होंने डराया नहीं। और यही उनका सबसे बड़ा हौसला था।

रात का खाना चुपचाप खाया। गुड़िया मेरे पास ही बैठी रही और अपनी रोटी के टुकड़े मेरी थाली में डालती रही — ये उसकी पुरानी आदत थी, जैसे उसे लगता हो कि मैं कभी पूरा नहीं खाता। माँ ने दो बार मेरी थाली में दाल और डाली। बस।

सोने से पहले गुड़िया ने मेरे पास आकर धीरे से पूछा, "भैया, डर लग रहा है?"

मैं चुप रहा। फिर बोला, "थोड़ा।"

"मुझे भी।" उसने अपनी थैली से कुछ निकाला। लाल मिट्टी। "ये आज मैंने दीवार के पीछे से लाई थी। जब डर लगे तो हाथ में ले लेना। मैंने देखा है — जब तू मिट्टी को हाथ लगाता है, तेरी आँखें बदल जाती हैं।"

मैंने वो मिट्टी ली। ठंडी थी, और उसमें वो गंध थी जो मुझे बचपन से जानी लगती थी। "तू सो जा," मैंने कहा। "कल स्कूल जाना है।"

वो गई। पर मैं नहीं सोया।

रात के दो बजे मैं उठा। माँ की साँस चल रही थी — धीमी और गहरी, थकी हुई। मैंने चप्पल पहनी और बाहर निकल गया।

अखाड़े की तरफ़ जाते हुए मुझे लगा कि मैं कोई चोरी कर रहा हूँ। पर चोरी नहीं थी। मैं आख़िरी बार देखना चाहता था। कल सुबह जब मैं अंदर उतरूँगा, तो भैरव मेरी तरफ़ ऐसे नहीं देखेगा जैसे किसी अजनबी को देखता है। वो पहले से जानता होगा कि मैं उसका पानी नहीं पीने वाला।

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