Spirit of a Fighter – Chapter 23
"और?"
"और भैरव वही चमक देखकर डर गया।" उन्होंने धीरे से कहा। "भैरव को ताकत से डर नहीं लगता। उसे उस चमक से डर लगता है। क्योंकि चमक कभी बुझती नहीं।"
मैंने मिट्टी में अपनी मुट्ठी भींची। गीली मिट्टी उँगलियों के बीच से बाहर निकली।
"काका," मैंने कहा। "मुझे वो चमक चाहिए।"
कालू काका मुस्कुराए। उनकी सफ़ेद दाढ़ी हिली।
"तेरे पास है बेटा," उन्होंने कहा। "तू आज सुबह आया, ये ही इसका सबूत है। डरे हुए आदमी सुबह चार बजे नहीं आते।"
तभी पीछे से आवाज़ आई। वो मीठी आवाज़। गुड़ जैसी।
"अच्छा, तो मेहमान से पहले ही मिट्टी गूंध रहे हो?"
कालू काका सीधे हो गए। मैं पलटा।
भैरव आ रहा था। लाल धोती। सोने की चेन। हाथ में वो गिलास। फिर।
"कालू," उसने कहा। "तू जानता है मेरी मिट्टी के नियम। नया आदमी पहले मेरे सामने हाथ जोड़ता है। फिर मिट्टी छूता है।"
कालू काका ने अपना सिर झुका लिया।
"गलती हो गई सर," उन्होंने कहा। "मैंने सोचा—"
"तू मत सोच।" भैरव की आवाज़ में वो मिठास थी, पर उसके नीचे कुछ और। "तेरा काम सींचना है। सोचना मेरा काम है।"
कालू काका पीछे हट गए। उनका सिर झुका रहा।
मुझे गुस्सा आया। पुराने आदमी को इस तरह डाँटा जा रहा था। जो पचास साल से इस मिट्टी को सींच रहा था। मैंने अपनी मुट्ठी भींची।
पर माँ की बात याद आई। गुस्सा बाँधकर रखना। मैंने साँस ली। धीरे।
"सर," मैंने हाथ जोड़े। "मैं आ गया। मिट्टी गूंधने के लिए।"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। लंबा। फिर उन्होंने कालू काका की तरफ़। फिर वापस मेरी तरफ़।
"अच्छा," उन्होंने कहा। "आ। मैं तुझे सिखाता हूँ।"
वो मिट्टी में उतरे। उनके भारी शरीर के नीचे मिट्टी धँसी। उन्होंने अपने पैर से मिट्टी दबाई। ज़ोर से। पर मिट्टी नहीं दबी। सख़्त रही।
"अजीब," उन्होंने धीरे से कहा। उन्होंने फिर दबाया। फिर। मिट्टी नहीं दबी।
मैंने देखा। कालू काका ने भी देखा। उनके चेहरे पर कुछ आया। छोटा-सा।
भैरव ने अपना पैर उठाया। मिट्टी की तरफ़ देखा। फिर उन्होंने अपनी मुट्ठी भींची। गुस्से से। और मिट्टी पर मुक्का मारा।
"ये मिट्टी," उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी। ख़तरनाक। "कालू, तूने इसमें क्या मिलाया?"
"कुछ नहीं सर," कालू काका ने कहा। "रोज़ की तरह पानी डाला है।"
"तो ये ऐसी क्यों है?" भैरव ने फिर मुक्का मारा। "ये मिट्टी मेरा हुक्म नहीं मान रही।"
मैंने अपनी नाक से सूँघा। मिट्टी में वो गंध थी जो आज सुबह मैंने सूँघी थी। ईमानदारी। पसीना। पर कुछ और भी था। ताज़ा। जैसे अभी-अभी किसी ने इसे छुआ हो। किसी ऐसे ने जिसका पसीना इमानदार था।
मैंने अपने पैरों की तरफ़ देखा। जहाँ मैं खड़ा था, वहाँ मिट्टी नरम थी। जहाँ भैरव खड़ा था, वहाँ सख़्त।
मेरे पेट में एक झटका लगा।
मिट्टी मेरा हुक्म मान रही थी। भैरव का नहीं।
मैंने अपना चेहरा नीचे रखा। कहीं भैरव मेरी आँखों में ये बात न पढ़ ले।
भैरव ने अपना मुक्का फिर मारा। इस बार ज़ोर से। उनका चेहरा लाल हो गया। तेल लगी मूँछें काँपीं।
"कालू," उन्होंने कहा। "आज मिट्टी बदल। नई मिट्टी ला। बाहर से। नहर के किनारे से।"
"सर, वो मिट्टी…" कालू काका की आवाज़ काँपी। "वो अखाड़े की नहीं है। वो नदी की है।"
"तो क्या हुआ?" भैरव ने अपना पैर मिट्टी से निकाला। "जो मेरा हुक्म माने, वो मेरी। जो न माने, वो किसी की नहीं।"
वो पलटे। जाने लगे। फिर रुके। मेरी तरफ़ देखा।
"वीर," उन्होंने कहा। आवाज़ में फिर वो मिठास आ गई। जैसे कुछ हुआ ही न हो। "तू आज मिट्टी मत गूंध। कल आ। कालू नई मिट्टी लाएगा। फिर तू उसमें उतरना।"
"जी सर।"
वो चले गए। उनके जाने के बाद कालू काका ने अपना सिर उठाया। उनकी आँखों में पानी था। बूढ़े आदमी की आँखों में। जो पचास साल से इस मिट्टी को सींच रहा था।
"काका," मैंने कहा। मेरी आवाज़ भारी थी। "वो नई मिट्टी…"
"वो मिट्टी मरी हुई है, बेटा।" उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं। "नहर के किनारे की मिट्टी में दम नहीं। वो बहती है। जो बहती है, वो जमती नहीं। जो जमती नहीं, वो पहलवान को पकड़ती नहीं।"
"तो फिर?"
"तो फिर भैरव आज पहली बार हारा है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक थी जो कुछ देर पहले छुपी थी। "और उसे पता नहीं कि वो हारा है। उसे लगता है कि मिट्टी खराब हो गई। उसे लगता है कि कालू ने कुछ मिलाया है। उसे कभी नहीं लगेगा कि ये मिट्टी खुद फ़ैसला करती है — कि किसके पैर के नीचे नरम होना है, और किसके नीचे सख़्त।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"वीर," कालू काका ने मेरा हाथ पकड़ा। "आज तू घर जा। माँ के पास। उससे पूछ — कि जब भैरव का पानी रघुवीर को नहीं मार पाया, तो क्या हुआ था? क्योंकि मुझे याद है — रघुवीर ने पाँच महीने पानी पिया। पाँच महीने। और वो नहीं बीमार पड़ा। बाद में कुछ और हुआ।"
मेरी साँस रुकी।
"क्या और हुआ काका?"
कालू काका ने अपना सिर हिलाया। धीरे। बहुत धीरे।
"वो तुझे माँ बताएगी," उन्होंने कहा। "मैं नहीं बोल सकता। मैंने बीस साल पहले चुप रहने की क़सम खाई थी। उस क़सम में एक ही छेद है — मैं तेरे पापा के बेटे को बता सकता हूँ। पर बोलने का हक़ तेरी माँ के पास है। वो जानती है। वो बताएगी।"
मैं घर लौटा। सूरज ऊपर आ रहा था। आसमान में लाल रंग फैल रहा था। जैसे अखाड़े की मिट्टी आसमान पर बिखर गई हो।
माँ आँगन में बैठी थीं। चक्की के पास। आटा छान रही थीं। छलनी से आटा गिरता रहा। सफ़ेद। शांत।
मैं उनके सामने बैठ गया।
"माँ," मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। छलनी हाथ में रही।
"बता," उन्होंने कहा। जैसे उन्हें पता था कि मैं क्या पूछने आया हूँ।
"कालू काका ने कहा कि रघुवीर पापा ने पाँच महीने भैरव का पानी पिया। पाँच महीने।" मेरी आवाज़ काँपी।
माँ ने छलनी रख दी। उनके हाथ आटे से सफ़ेद थे। उन्होंने उन्हें अपनी साड़ी पर पोंछा। धीरे-धीरे। जैसे वक़्त खरीद रही हों।
"तेरे पापा," उन्होंने कहा। "वो पानी पीते थे, पर पीते ही नहीं थे।"
मैं समझा नहीं। "मतलब?"
"मतलब ये कि हर घूँट के साथ वो भैरव को एक सवाल पूछते थे।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "भैरव का पानी ताकत देता है ना? तो ताकत के साथ सच भी पीना पड़ता है। तेरे पापा कहते थे — भैरव, ये पानी किस चीज़ से बनता है? भैरव हँसकर टाल देता। पर हर दिन। हर महीने। पाँच महीने तक। और एक दिन भैरव से नहीं रहा गया। उसने सच बोल दिया।"
"क्या बोला?"
माँ ने अपनी आँखें बंद कीं। जैसे बीस साल पुराना दृश्य उनके सामने चल रहा हो।
"तेरे पापा ने एक दिन अखाड़े में सबके सामने भैरव से कहा — भैरव, तेरा पानी असली नहीं है। तू ताकत बेचता है, पर वो ताकत तेरी नहीं है। तू तो बस नल है। जिसके हाथ में नल, उसी के हाथ में पानी। और वो दिन भैरव की आँखों में वही ठंडक आई थी जो कुएँ में होती है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने आज सुबह अपनी आँखों में वही ठंडक देखी थी। गिलास पकड़े हुए।
"फिर?" मेरी आवाज़ फूटी।
"फिर तेरे पापा अगले दिन अखाड़े से लौटे ही नहीं।" माँ की आवाज़ सपाट थी। जैसे ये बात उन्होंने खुद को सौ बार सुनाई हो। "कहा गया कि कुएँ के पास फिसल गए। सिर पर चोट लगी। पर मैंने उनका सिर देखा था, वीर। कुएँ में गिरने से कोई सिर के पीछे नहीं लगता। पीछे तो कोई हाथ लगता है।"
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