Spirit of a Fighter – Chapter 22
"पर माँ की बात याद रखना। जो डरता है, वो नहीं जीतता। और जो ज़्यादा बहादुर बनता है, वो भी नहीं जीतता। जीतता है वो, जो ठीक समय पर झुकता है और ठीक समय पर खड़ा होता है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा वैसा ही था — मुस्कान, टोपी, कान के पीछे पेंसिल। पर आँखों में कुछ और था। कुछ पक्का।
"तू ये बातें कहाँ से सीखता है?" मैंने पूछा।
"मिठाई बनाने से," उसने कहा। "जब तू सत्तर बार एक जैसी चीज़ बनाता है, तो एक चीज़ सीख जाता है — चीनी ज़्यादा डालो तो मिठाई खराब, कम डालो तो भी खराब। सही वक़्त पर सही मात्रा। वही बात आदमी पर भी लागू है।"
मैं हँसा। इस बार हँसी बड़ी थी।
"तू ठीक है टिंकू," मैंने कहा।
"मैं ठीक नहीं हूँ भाई," उसने लड्डू की डिब्बी बंद की। "मैं तो मोटा होने वाला हूँ। चल, घर चल। तेरी माँ इंतज़ार कर रही होगी।"
हम घर चले। रास्ते में टिंकू ने दो लड्डू और खिलाए। मैंने मना नहीं किया। मेरा पेट भर रहा था, और मेरा दिमाग़ शांत हो रहा था। यही तो मिठाई का काम है — पेट को पूरा करता है और दिल को नरम। मेरी माँ कहती है, "मीठा खाओ, दिमाग़ ठंडा रहता है।" आज समझ आया।
घर पहुँचा तो आँगन में गुड़िया बैठी थी। उसकी कॉपी खुली थी, पर वो उसमें नहीं देख रही थी। वो बाहर की तरफ़ देख रही थी। मेरी तरफ़। मेरा इंतज़ार कर रही थी।
मुझे देखते ही वो उठ खड़ी हुई। दौड़ी आई।
"भैया!" उसने मेरा हाथ पकड़ा। "क्या हुआ? तेरा चेहरा कैसा है?"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस सुबह से भूखा था। टिंकू ने लड्डू खिलाए।"
"झूठ," उसने कहा। सीधा। बिना झिझक। "तेरा चेहरा भूख का नहीं है। डर का है।"
मैं रुक गया।
"गुड़िया—"
"मुझे पता है भैया।" उसने अपनी कॉपी उठाई। उसके बीच में वो लाल मिट्टी की थैली थी जो वो रोज़ भरकर रखती थी। "मैं छोटी हूँ, बेवकूफ़ नहीं हूँ। जब तू रात को उठकर अखाड़े की तरफ़ देखता है, मुझे पता चल जाता है। जब तू सुबह जल्दी उठता है और माँ से छुपकर नहाता है, मुझे पता चल जाता है।"
वो मेरे सामने खड़ी थी। बारह साल की। दुबली। दो चोटियाँ। और उसकी आँखें — माँ जैसी।
"अब सच बता," उसने कहा। "क्या हुआ?"
मैं बैठ गया। आँगन की मिट्टी पर। गुड़िया मेरे सामने बैठी।
मैंने उसे बताया। भैरव का गिलास। पानी। रुका हुआ हाथ। भैरव का "इस लड़के की नाक कुछ ज़्यादा तेज़ है।"
गुड़िया सुनती रही। एक शब्द नहीं बोली। जब मैंने कहानी ख़त्म की, तो वो उठी। अपनी कॉपी के बीच से वो लाल मिट्टी की थैली निकाली। और मेरे हाथ में रख दी।
"ये मैंने आज सुबह अखाड़े की दीवार के पीछे से ली है," उसने कहा। "भैया, ये मिट्टी तेरे पापा की है। उनकी मेहनत की है। इसमें ज़हर नहीं है। इसमें पसीना है।"
मैंने थैली पकड़ी। मिट्टी की गंध आई। वो गंध जो आज सुबह मैंने अखाड़े में सूँघी थी। ईमानदार गंध। पसीने और मेहनत की।
"गुड़िया," मैंने कहा। "तू कितनी बड़ी हो गई है।"
"मैं पहले से बड़ी थी," उसने कहा। "तुझे फ़ुर्सत नहीं थी देखने की।"
और वो पलटकर स्कूल की कॉपी खोलकर बैठ गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर मैंने देखा — उसकी कलम काँप रही थी। वो भी डरी हुई थी। बस बोल नहीं रही थी।
माँ बाहर आईं। उनके हाथ में आटा था। माथे पर हल्दी का टीका। मेरी तरफ़ देखा और रुक गईं।
"हो गई बात?" उन्होंने पूछा।
"हो गई," मैंने कहा।
"क्या कहा उसने?"
"कहा कि कल सुबह चार बजे आना। मिट्टी गूंधनी है।"
माँ मेरे पास आईं। उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों में पकड़ा। सूखे हाथ। चक्की चलाने वाले। गरम।
"वो जानता है?" उन्होंने पूछा। उनकी आवाज़ धीमी थी। बहुत धीमी।
"कुछ जानता है," मैंने कहा। "पूरा नहीं।"
माँ ने आँखें बंद कीं। फिर खोलीं।
"मैंने तुझे रोका नहीं," उन्होंने कहा। "मैंने कहा था — अब तेरे पेट में आग है। पर बेटा, आग को सँभालकर रखना। जो आग घर को जलाए, उससे बेहतर है चूल्हे की आग, जो रोटी पकाए।"
"जी माँ।"
"कल सुबह जाने से पहले एक काम करना।"
"क्या?"
"चक्की पर बैठ जाना।" उन्होंने मेरा माथा चूमा। "दो सौ बार घुमाना। जब हाथ दुखने लगें, तब समझ जाना कि मन में कितना गुस्सा है। और गुस्से को बाँधकर रखना सीखना। भैरव के सामने गुस्सा आया तो तू हार गया, बेटा। वो आदमी गुस्से से नहीं, दिमाग़ से लड़ता है।"
रात को मैंने ऐसा ही किया। चक्की पर बैठा। दो सौ बार घुमाया। हाथ दुखने लगे। पसीना आया। और मैंने महसूस किया — मेरे अंदर गुस्सा था। बहुत। भैरव के लिए। उसके पानी के लिए। उसकी मीठी आवाज़ के लिए।
पर जब चक्की घूमती थी, तो सिर्फ़ आटा नहीं निकलता। मन का बोझ भी पिस जाता है। माँ यही कहती हैं ना।
मैंने चक्की रोकी। पसीना पोंछा। और सो गया।
सुबह चार बजे उठा। माँ से पहले। ये पहली बार हुआ। माँ उठीं तो देखा कि चक्की पर मैं बैठा हूँ। वो मुस्कुराईं। बिना कुछ कहे। बस एक लोटा पानी मेरे पास रखा और अपनी तरफ़ बढ़ गईं।
मैं अखाड़े पहुँचा। अंधेरा था। लालटेनें जल रही थीं। मिट्टी गीली थी, पर अभी सींची नहीं गई थी।
कालू काका वहाँ थे। मिट्टी के बीच खड़े। कुबड़े। सफ़ेद दाढ़ी। हाथ में लोटा।
"आ गया," उन्होंने कहा। जैसे उन्हें पता था कि मैं आऊँगा।
"काका," मैंने हाथ जोड़े। "आप यहाँ?"
"मैं यहीं रहता हूँ, बेटा।" उन्होंने लोटा मिट्टी पर उलट दिया। पानी फैल गया। "पचास साल से। ये मिट्टी मेरी बेटी है। इसे रोज़ नहलाता हूँ।"
"मुझे भैरव सर ने बुलाया है," मैंने कहा। "मिट्टी गूंधनी है।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें छोटी थीं, पर उनमें कुछ था। जो मैंने पहले कुएँ के पास देखा था। पहचान।
"जूते उतार," उन्होंने कहा।
"मैंने उतार दिए हैं काका।"
"नहीं, पूरे। नंगे पाँव आ। मिट्टी से मिल।" उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया। "हाथ दो।"
मैंने हाथ दिया। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। ठंडा हाथ। पर मजबूत।
"अब मेरे साथ चल," उन्होंने कहा। "मैं तुझे सिखाऊँगा कि मिट्टी कैसे गूंधते हैं। भैरव सर आएँ तो हम कह देंगे कि हमने पहले ही शुरू कर दिया था।"
वो मुझे मिट्टी के बीच ले गए। मिट्टी गीली थी। ठंडी। पैरों के नीचे दबती थी। मैंने पहली बार महसूस किया — ये मिट्टी मेरी है। इसमें मेरे पापा ने पसीना गिराया है। इसमें उनकी मेहनत है।
"देख," कालू काका ने कहा। "उँगलियाँ ऐसे रख। पैर की उँगलियों से नहीं। पूरे पैर से।" उन्होंने अपने पैर से मिट्टी दबाई। "दबा। छोड़। दबा। छोड़। साँस की तरह।"
मैंने किया। पहली बार में ही मिट्टी नरम हुई।
"अच्छा," कालू काका ने कहा। "तेरे पैर को ये मिट्टी पहले से जानती है।"
"कैसे काका?"
"तेरे खून को याद है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तेरे पापा रघुवीर भी ऐसे ही गूंधते थे। पहली बार में ही मिट्टी नरम। जैसे उन्होंने पहले कभी नहीं, बल्कि हमेशा इसे छुआ हो।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने अपना सिर नीचे रखा। मिट्टी पर।
"काका," मैंने धीरे से कहा। "आपने मेरे पापा को देखा है?"
"देखा है बेटा। देखा है।" उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा। "वो आया था। इक्कीस साल पहले। मुझसे भी छोटा। भूखा। दुबला। पर आँखों में वो चमक थी जो पीढ़ियों में एक बार आती है।"
"कैसी चमक?"
कालू काका ने लंबी साँस ली।
"जो आदमी अपने लिए नहीं, अपने पीछे आने वालों के लिए लड़ता है, उसकी आँखों में वो चमक होती है। रघुवीर वो चमक लेकर आया था। और…" उनकी आवाज़ रुकी।
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