Spirit of a Fighter – Chapter 21
भैरव मुस्कुरा रहा था। मीठी मुस्कान। पर मैंने उसकी आँखों में देखा, जैसे लुट्टन ने कहा था। और मुझे अन्दर तक ठंडक लग गई।
आँखें कुएँ जैसी थीं। गहरी। अंधेरी। जिनमें अगर कोई गिर जाए तो आवाज़ तक न आए।
"पी," उसने फिर कहा। "सुबह की पहली चुस्की है। पचास साल से यही पानी यहाँ मेहमानों को देता आया हूँ।"
मैंने गिलास अपने होंठों के पास लाया। एक इंच। दो इंच। पानी की ठंडक होंठों पर लगी।
और मेरा हाथ रुक गया।
अपने आप। जैसे नदी के बहाव में गया कोई आदमी अचानक पत्थर देखकर रुक जाए।
"क्या हुआ?" भैरव ने पूछा।
"कुछ नहीं सर," मैंने धीरे से कहा। "बस…"
"बस?"
"मुझे प्यास नहीं है।"
शब्द मेरे मुँह से निकले और हवा में लटक गए। भैरव का चेहरा वैसे ही रहा, पर मुस्कान के पीछे कुछ सरक गया। जैसे दरवाज़े के पीछे कोई खड़ा हो और साँस रोक ले।
उसने गिलास मेरे हाथ से लिया। धीरे से। अपने हाथ में रखा। फिर उसने उसे अपने होंठों से लगाया। नहीं पिया। बस सूँघा। जैसे कोई जानता हो कि उसमें क्या है और फिर भी स्वाद ले रहा हो।
"अच्छा," उसने कहा। "कोई बात नहीं। कल सुबह आ जाना। मिट्टी में उतरना।"
मैंने सिर हिलाया।
"पहली बार है ना?" उसने पूछा। "अखाड़े के अंदर?"
"जी सर।"
"मिट्टी कैसी लगी?"
मैंने अपने पैरों के नीचे देखा। लाल मिट्टी। गीली। जिस पर मेरे नंगे पैरों के निशान अभी ताज़ा थे।
"अच्छी लगी सर," मैंने कहा।
"अच्छी लगी?" वो हँसा। गुड़ जैसी हँसी। "ये मिट्टी सिर्फ़ अच्छी नहीं लगती, बेटा। ये मिट्टी अपनी होती है। पर जानते हो फर्क क्या है?"
"क्या सर?"
"ताकत तो सबमें है। तेरे में भी। मेरे में भी। उस लुट्टन में भी, जो तुझे यहाँ तक ले आया।" उसने गिलास मेज़ पर रखा। "फर्क सिर्फ़ यह है कि किसकी ताकत किसके हाथ में है।"
वो अपनी कुर्सी पर बैठ गया। कुर्सी चरमराई। उसने अपनी बड़ी तेल लगी मूँछों पर हाथ फेरा।
"तेरे पापा जगदीश को मैं जानता था," उसने कहा। "अच्छा पहलवान था। पर उसकी एक कमी थी।"
मेरा पेट सिकुड़ गया। मैंने अपना चेहरा वैसा ही रखा।
"क्या कमी?"
"बोलता बहुत था।" भैरव ने अपनी अंगूठी घुमाई। "पहलवान का काम बोलना नहीं, बेटा। पहलवान का काम चुप रहकर मिट्टी में पसीना गिराना है। जो ज़्यादा बोलता है, वो मिट्टी से जल्दी थक जाता है।"
वो मेरी तरफ़ झुका। उसकी सोने की चेन झूली।
"तू बोलता है बहुत?"
"नहीं सर," मैंने कहा। "मैं तो चुप ही रहता हूँ।"
"अच्छा लड़का।" उसने मेरी तरफ़ देखा। लंबा। जैसे कोई तराज़ू पर तौल रहा हो। "तेरे कंधे चौड़े हैं। हड्डियाँ मजबूत हैं। भूखा है, ये अलग बात है। पर भूख तो अच्छी चीज़ है, बेटा। भूखा आदमी जीतने के लिए ज़्यादा भूखा होता है।"
वो उठा। मेरे पास आया। उसका हाथ मेरे कंधे पर पड़ा। भारी हाथ। गरम।
"कल सुबह चार बजे आ जाना। मिट्टी गूंधनी है। जो पहलवान मिट्टी गूंधना सीख जाता है, वो आधा कुश्ती जीत जाता है।"
"जी सर।"
"और वो पानी…" उसने मेज़ पर पड़े गिलास की तरफ़ इशारा किया। "वो तो मैंने तुझे पहचान परखने के लिए दिया था। तूने नहीं पिया। अच्छा किया। अखाड़े का पानी हर किसी के लिए नहीं होता। हर किसी की नाक नहीं होती।"
मेरे पेट में एक झटका लगा। जैसे किसी ने मेरी नाक के ठीक नीचे उँगली रख दी हो।
"मुझे समझ नहीं आया सर," मैंने कहा।
"आ जाएगा।" वो हँसा। "कल से समझ आ जाएगा।"
मैं पलटा। दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। मेरे पैर मिट्टी में से उठ रहे थे। धीरे। जैसे मिट्टी मुझे जाने नहीं देना चाहती हो।
दरवाज़े तक पहुँचा तो पीछे से आवाज़ आई। धीमी। जो मेरे लिए नहीं थी। जो मेरे पीछे किसी और के लिए थी। पर मेरी नाक ने हवा में उसका पहला शब्द ही पकड़ लिया।
"लुट्टन…"
मैं दरवाज़े पर रुका। बाहर नहीं गया। दीवार से सटकर खड़ा हो गया।
"इस लड़के की नाक कुछ ज़्यादा तेज़ है।"
मेरी साँस रुक गई।
"सर?" लुट्टन की आवाज़। घबराई हुई।
"मुझे इस पर नज़र चाहिए। हर पल। क्या खाता है, क्या पीता है, किससे बोलता है।"
"जी सर।"
"और वो पानी…" भैरव की आवाज़ में अब वो मिठास नहीं थी। "वो गिलास धो देना। अच्छे से। दो बार।"
"जी सर।"
मैं बाहर निकला। लाल मिट्टी से बाहर। अखाड़े के गेट से बाहर। मेरे हाथ काँप रहे थे।
टिंकू गेट के बाहर इंतज़ार कर रहा था। मेरी शक्ल देखकर वो दौड़ा आया।
"क्या हुआ?" उसने मेरा हाथ पकड़ा। "क्यों ऐसा दिख रहा है? कुछ कहा उसने?"
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने बस चलना शुरू किया। तेज़। नहर की तरफ़। टिंकू मेरे पीछे-पीछे आया, और पूरे रास्ते वो कुछ न कुछ बोलता रहा — "भाई, तू डर गया? अरे वो तो बूढ़ा है, तू जवान है, तेरी नाक…" पर मैं एक शब्द नहीं बोला।
नहर पर पहुँचकर मैं घास पर बैठ गया। पानी बह रहा था। ठंडा पानी। मैंने मुँह धोया। दो बार। तीन बार।
"वो जानता है," मैंने कहा।
टिंकू मेरे पास बैठ गया। उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी टोपी टेढ़ी थी, पर उसने उसे सीधा नहीं किया। यही उसकी आदत थी — जब बात गंभीर हो, तो टोपी भूल जाता था।
"क्या जानता है?"
"मेरी नाक।" मैंने अपनी नाक छुई। "उसने कहा — इस लड़के की नाक कुछ ज़्यादा तेज़ है।"
टिंकू कुछ देर चुप रहा। फिर वो बोला, "तो?"
"तो? टिंकू, वो मुझ पर नज़र रखवा रहा है। लुट्टन को कहा है कि क्या खाता हूँ, क्या पीता हूँ, किससे बोलता हूँ। वो जानता है कि मैं उसके पानी को पहचान सकता हूँ।"
टिंकू ने अपनी जेब से एक छोटी डिब्बी निकाली। उसमें लड्डू थे। उसने एक मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"खा," उसने कहा। "एक घंटे पहले बनाया है।"
"टिंकू, अभी—"
"खा भाई।" उसकी आवाज़ में वो हल्की डाँट थी जो माँ की होती है। "तेरा चेहरा देख रहा हूँ। सफ़ेद पड़ा है। तूने सुबह से कुछ नहीं खाया। और भूखे आदमी के दिमाग़ में डर बैठता है, समझदारी नहीं।"
मैंने लड्डू लिया। मुँह में रखा। शक्कर और घी मिलकर पिघल गए।
"अच्छा है," मैंने कहा।
"बस अच्छा है?" वो मुस्कुराया। "भाई, ये मेरी मिठाई है। इसमें अच्छा नहीं, 'बहुत अच्छा' होता है।"
मैं हँसा। पहली बार उस दिन। हँसी छोटी थी, पर आई।
"बहुत अच्छा है," मैंने कहा।
"अब बता," टिंकू ने अपनी टोपी सीधी की। "उसने और क्या कहा?"
मैंने उसे सब बताया। गिलास। पानी। प्यास नहीं है वाली बात। भैरव का हँसना। फिर मेरी तरफ़ झुककर कहना — "तूने नहीं पिया। अच्छा किया।"
टिंकू ने सुनते-सुनते अपने हाथों को घुटनों पर रख लिया। जब मैंने आख़िरी बात बताई — "इस लड़के की नाक कुछ ज़्यादा तेज़ है" — तो उसने अपनी ओर देखा। सीधा।
"भाई," उसने कहा। "ये ख़तरनाक है।"
"मुझे पता है।"
"नहीं, तू नहीं समझा।" वो उठ खड़ा हुआ। नहर के किनारे चलने लगा। "भैरव ने तुझे आज पानी दिया। तूने मना किया। वो तेरे घर से दूर है, यहाँ तक। पर वो जान गया कि तू कुछ और है। और भैरव को जो 'कुछ और' होता है, उसे वो या तो अपना बनाता है, या ख़त्म करता है।"
मेरे हाथ की मुट्ठी बंध गई।
"तो मैं क्या करूँ?" मैंने कहा। "छुप जाऊँ? कल सुबह न जाऊँ?"
टिंकू रुका।
"नहीं," उसने कहा। "अगर तू नहीं गया, तो वो समझेगा कि तू डर गया। और डरे हुए आदमी पर हमला करना सबसे आसान होता है। तुझे जाना है। मिट्टी गूंधनी है। उसकी हर बात सुननी है। पर…"
"पर?"
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