Spirit of a Fighter – Chapter 20
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर उनकी आवाज़ में नहीं।
"तू जा," उन्होंने कहा। "पर एक बात याद रखना। तेरे दो पापा हैं। एक ने तुझे ज़िंदगी दी। दूसरे ने उसे सँभाला। दोनों की इज़्ज़त एक साथ रखना।"
मैंने सिर हिलाया। गला इतना भरा था कि बोल नहीं सका।
रात को मैं सो नहीं पाया।
चारपाई पर करवट बदलता रहा। बाहर झींगुर बोल रहे थे। दीवार पर छिपकली चिपकी थी। मैंने काग़ज़ तकिये के नीचे रखा था। बार-बार हाथ बढ़ाकर छूता — कि काग़ज़ वहीं है। कि सब सपना नहीं है।
मेरे पापा का नाम रघुवीर था। मेरे दूसरे पापा का नाम जगदीश था। दोनों इसी अखाड़े में गए। दोनों वही पानी पीकर लौटे। दोनों अखाड़े से ठीक नहीं आए।
और मैं — मैं उसी अखाड़े के बाहर बीस साल से खड़ा था।
मैंने आँखें बंद कीं। माँ की आवाज़ कानों में गूँज रही थी — "तेरे पापा ताकतवर थे, बेटा।"
मैंने अपनी बाँह उठाई। अंधेरे में देखी। पतली। हड्डी दिख रही थी। चक्की के छाले। मज़दूरी की गाँठें।
"ताकतवर," मैंने खुद से कहा। आवाज़ रात में फैल गई।
फिर मैंने आँखें खोलीं और छत को घूरता रहा।
नींद आई तो सुबह हो रही थी।
उठा तो सूरज निकल चुका था। आँगन में चक्की चल रही थी — घर्र, घर्र। माँ वापस अपनी जगह पर थीं। जैसे कल कुछ हुआ ही न हो।
मैंने मुँह धोया। पानी ठंडा था। काग़ज़ को धोती की कमर में खोंसा। वो मेरी छाती से चिपका रहा। गीला-सा लगा।
गुड़िया स्कूल जाने की तैयारी कर रही थी। उसने मुझे देखा और पूछा, "भैया, आज क्या जीतोगे?"
मैं मुस्कुराया। "देखते हैं।"
"मैंने तुम्हारे लिए मिट्टी भर दी है," उसने कहा। "नई। कल वाली सूख गई थी।"
मेरा गला भर आया। इस छोटी बच्ची को क्या पता कि उसका भैया आज किसके सामने जा रहा है।
"गुड़िया," मैंने कहा। "एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"अगर कोई तुमसे कहे कि तुम्हारे दो पापा थे… तो तुम क्या सोचोगी?"
वो रुकी। अपनी चोटी सँभाली। फिर बोली, "तो मैं कहूँगी कि मेरी किस्मत अच्छी है। दो लोगों ने मुझे प्यार किया।"
मैंने उसे देखा। बारह साल की बच्ची। और मुझसे ज़्यादा समझदार।
"सही बोली," मैंने कहा।
वो हँसी। "मैं तो हमेशा सही बोलती हूँ। भैया, तुम्हें पता नहीं।"
फिर वो स्कूल भाग गई। कॉपी काँख में।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थीं। चक्की चला रही थीं। पर आँखें मुझ पर थीं। मैंने सिर हिलाया। उन्होंने भी। कोई शब्द नहीं। ज़रूरत भी नहीं।
फिर मैं निकल पड़ा।
इस बार रास्ता अलग था। पहाड़ी से नहीं। दीवार के छेद से नहीं। गाँव की पगडंडी से सीधे अखाड़े के सामने के गेट तक।
सुबह की धूप में अखाड़े की लाल मिट्टी की दीवार चमक रही थी। गेट बंद था। पर पहलवान खड़े थे। कुछ बैठे थे। कुछ कसरत कर रहे थे। ज़हरीले पानी के बाद भी उन्हें पता नहीं कि उनके शरीर में क्या चल रहा है।
मैं गेट के सामने खड़ा हुआ।
गेट पर लुट्टन था। मुझे देखते ही उसका चेहरा बदला। जैसे किसी ने उसे चुटकी काटी हो।
"तू?" उसने कहा। "तू यहाँ क्या कर रहा है?"
"मुझे भैरव सर से मिलना है।"
लुट्टन की आँखें फैल गईं। जैसे मैंने कोई गाली दी हो।
"भैरव… सर?" उसने कहा। आवाज़ में वो सब था जो वो छुपाना चाहता था। "तू… तू पागल हो गया है। तू अखाड़े के सामने से निकल।"
"मैं नहीं निकलूँगा।"
"वीर," लुट्टन मेरे पास आया। उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "मैं तुझे अच्छे से कह रहा हूँ। भैरव सर आज तूफ़ान में हैं। कल की बात से सब उलट-पुलट है। माई ने अखाड़ा बंद कर दिया। पहलवान बाहर। सब बोल रहे हैं। और तू…"
"तो मुझे और ज़रूरी है उनसे मिलना।"
"क्यों?" लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा। "क्यों तू जान देने पर उतरा है?"
मैंने अपनी धोती की कमर से काग़ज़ निकाला। पीला काग़ज़। हवा में लहराया। लुट्टन की नज़र उस पर पड़ी।
"ये क्या है?" उसने पूछा।
"मेरे पापा का दाख़िला।" मैंने कहा।
लुट्टन का मुँह खुला रह गया। वो काग़ज़ को देखता रहा। फिर मेरी तरफ़। फिर काग़ज़ को।
"तेरे पापा…" उसने धीरे से कहा। "जगदीश?"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"नहीं," मैंने कहा। "रघुवीर।"
लुट्टन पीछे हटा। एक कदम। दो कदम। उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
"रघुवीर…" उसने फुसफुसाया। "पर वो तो…"
वो रुक गया। जैसे कुछ कहते-कहते होंठ जम गए।
"वो तो क्या?" मैंने कदम बढ़ाया।
लुट्टन ने गेट की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। उसकी आँखों में डर था। सच्चा डर। मैंने उसे ऐसा पहले कभी नहीं देखा था।
"वो तो मर गया था," उसने धीरे से कहा।
"किसने कहा?"
लुट्टन ने कुछ नहीं कहा। उसने अपना मुँह फेर लिया।
"लुट्टन," मैंने कहा। मेरी आवाज़ शांत थी। पर अंदर से काँप रही थी। "तेरे शरीर में भी वही पानी है। तू भी बीमार पड़ेगा। तुझे पता है ना?"
वो मेरी तरफ़ पलटा। उसकी आँखों में पानी आ गया।
"मैंने क्या किया था?" उसने कहा। आवाज़ फटी हुई। "मैंने तो बस… सर ने कहा था… ताकत बढ़ेगी… मुझे क्या पता था…"
"अब पता है?"
"पता है।" उसने अपना सिर झुका लिया। "मेरी बाँह में कल से झुनझुनी हो रही है। रात को पसीना आता है। मैं अपनी माँ को क्या बताऊँ?"
मेरा दिल पसीजा। लुट्टन मेरा दुश्मन था। पर वो भी किसी का बेटा था। किसी की उम्मीद।
"लुट्टन," मैंने कहा। "भैरव से मिलना है। ज़रूरी है। अगर तू रोकेगा, तो भी मैं जाऊँगा। पर अगर तू खुद ले चले, तो शायद तेरे लिए भी कुछ निकल आए।"
लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा। लंबा। फिर उसने अपनी आँखें पोंछीं। अपनी वर्दी सीधी की।
"वो तेरे पीछे पड़ेगा," उसने कहा।
"मुझे पता है।"
"वो तुझे अंदर आते ही पहचान लेगा।"
"मुझे पता है।"
"तो फिर?"
मैंने काग़ज़ को अपनी छाती से लगाया। "मेरे दो पापा ने इस अखाड़े में अपनी जान दी," मैंने कहा। "मैं अब उनकी मौत का हिसाब लेने आया हूँ।"
लुट्टन ने लंबी साँस ली। फिर उसने गेट खोला।
"आ," उसने कहा। "मैं तुझे ले चलता हूँ। पर एक बात — भैरव सर के सामने उनकी मूँछों को मत देखना। उनकी आँखों में देखना। जो आँखों में देखता है, वो डरता नहीं।"
मैंने सिर हिलाया।
हम अंदर गए। लाल मिट्टी मेरे पैरों के नीचे दबी। मैंने महसूस किया — यही मिट्टी है। जिसमें मेरे पापा कुश्ती लड़े थे। जिसमें उनका पसीना गिरा था। जो उनकी बीमारी की गवाह बनी थी।
मैंने कदम बढ़ाए। भैरव का कमरा सामने था। दरवाज़ा खुला था।
उसके अंदर से आवाज़ आई — वही मीठी, गुड़ जैसी आवाज़।
"आ, वीर। मैं तेरा ही इंतज़ार कर रहा था।"
मैं रुका। मेरे पैर जम गए।
दरवाज़े पर भैरव खड़ा था। लाल धोती। चौड़ी छाती। तेल लगी मूँछें। हाथ में एक गिलास पानी।
"पी," उसने कहा। "सुबह की पहली चुस्की। बड़े काम की होती है।"
और मैंने उस पानी में सूँघा।
गुड़ जैसी मिठास।
॥
गुड़ जैसी मिठास। और उसके नीचे वो कड़वाहट, जो गले में जाकर चुभती है। जो पहली रात मैंने लुट्टन के हाथ से पीते हुए पहलवानों की गंध में सूँघी थी।
मैंने गिलास पकड़ा। उँगलियाँ ठंडी थीं। पानी हिला तो लहरें उठीं, और हर लहर के साथ वो बू और तेज़ हो गई।
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