Spirit of a Fighter242 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 242

7 min read November 5, 2026

सामने से आवाज़ आई — "रुक जा।"

भैरव की आवाज़। मैं रुका। मेरे पीछे लालटेन की रोशनी कहीं बहुत दूर थी। मेरे और उसके बीच सिर्फ़ अंधेरा था, और उस अंधेरे में उसकी साँसें सुनाई दे रही थीं। भारी। थकी हुई नहीं — गुस्से से भरी।

"तू अकेला है," वो बोला। "मुझे तेरे पीछे कोई नहीं दिखा।"

"मैं अकेला हूँ," मैंने कहा। "तेरे जैसा नहीं, जो पाँच आदमी लेकर एक कब्र के पीछे छिपता है।"

एक पल चुप्पी। फिर उसकी आवाज़ में वो चीज़ आई जो मैंने पहले नहीं सुनी थी — हल्की सी हँसी। "तेरे पापा भी ऐसे बोलते थे। सीधा मुँह पर। और मैं उनसे चिढ़ता था। बहुत चिढ़ता था।"

"तो तुझे पता है मैं क्यों आया हूँ।"

"हाँ।" उसकी आवाज़ आगे बढ़ी। "तू मुझे रोकने आया है, ताकि कोई और भाग सके। और तू सोचता है कि मैं तेरे पीछे भागूँगा।"

मेरा दिल धक से रह गया।

"नहीं," वो बोला, और अब उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो माँस को जमा दे। "मैं तेरे पीछे नहीं भागूँगा। मैं उस औरत के पीछे भागूँगा जो मेरी अलमारी की तरफ़ गई है। और तू यहाँ खड़ा रह जाएगा, क्योंकि तू अकेला है।"

उसने सीटी बजाई। पैरों की आवाज़ें मेरे चारों तरफ़ से हटकर पीछे की तरफ़ मुड़ गईं।

मैंने आँखें बंद कीं। मेरा पूरा प्लान एक ही बात पर टिका था — कि वो मेरे पीछे आएगा। वो नहीं आया। वो मुझसे भी चालाक निकला।

तभी पीछे से एक आवाज़ आई — बूढ़ी, हल्की, पर इतनी साफ़ जैसे कान के पास बोली गई हो।

"भैरव," कालू काका बोले, "तेरी माँ की कब्र कहाँ है, ये तुझे याद है न?"

पैरों की आवाज़ें रुक गईं। पूरा कब्रिस्तान रुक गया।

"कालू?" भैरव की आवाज़ बदल गई। "तू ज़िंदा है?"

"हाँ," काका बोले। "और मैं तुझे बताने आया हूँ कि उस अलमारी की दूसरी चाबी कहाँ है।"

भैरव हँसा। "मेरे पास चाबी है।"

"वो पहली है," काका बोले। "दूसरी तेरी गर्दन में नहीं है, भैरव। वो तेरी माँ की कब्र के पास दबी है। और मुझे पता है कौन-सी कब्र है।"

अंधेरे में मैंने भैरव की साँस रुकते सुनी। पूरी तरह रुकते सुनी।

और उस एक पल में, मुझे एहसास हुआ कि खेल अब बदल गया है — अब मैं उसे रोकने नहीं आया था। अब वो मुझे रोकने आएगा।

॥

"तो अब तक क्यों नहीं बताया?"

मेरी आवाज़ कर्कश निकली। कब्रिस्तान की ठंडी हवा में वो टूटकर फैल गई। मुझे अपनी मुट्ठी में कुछ चुभ रहा था — कालू काका की दी हुई चाबी। पीतल की, छोटी, जैसे किसी संदूक की नहीं, किसी दुआ की हो।

कालू काका ने लालटेन थोड़ी ऊपर की। उनका चेहरा आधा रोशनी में था, आधा अंधेरे में। सफ़ेद दाढ़ी में पीली रोशनी अटकी हुई। "क्योंकि बेटा," वो धीरे बोले, "जो उस बक्से को छूता है, उस पर भैरव की माँ का श्राप लगता है। गाँव में यही कहा जाता है। और मैंने बीस साल से यही सोचकर अपना मुँह बंद रखा।"

"श्राप?" मैंने लालटेन के पास अपना हाथ बढ़ाया। "काका, मैंने आज तक एक भी श्राप नहीं देखा। जो देखा है, वो भैरव का ज़हर है। और वो श्राप से ज़्यादा खतरनाक है।"

कालू काका कुछ बोलने ही वाले थे कि पीछे से आवाज़ आई।

"मैं भी नहीं डरती।"

मीरा आगे आई। उसके हाथ में वो छोटी शीशी थी — जो भैरव ने रणवीर सिंह की "दवा" कहकर दी थी। उसने उसे कालू काका की लालटेन के सामने उठाया। शीशी में तेल जैसा कुछ था, जो रोशनी में हल्का हरा दिख रहा था।

"श्राप से डरने वाले लोग," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो कोर्ट में बहस करते वक़्त आती होगी, "चाबी की तलाश में नहीं निकलते। वो घर बैठकर पूजा करते हैं। मैंने अपने पिता को बीस साल ज़हर पीते देखा है, काका। अब मुझे किसी श्राप का डर नहीं।"

कालू काका ने उसे देखा। फिर मुझे देखा। फिर वो हँसे — ऐसी हँसी जो सत्तर साल की छाती से निकली हो, धीमी और काँपती हुई।

"अच्छा," वो बोले। "तो आज रात चलो। पर एक बात पहले सुन लो — वो मंदिर अखाड़े के पीछे पुराने बरगद के नीचे है। बाहर से टूटा दिखेगा। अंदर सिर्फ़ एक पत्थर की मूर्ति है, और उसके पीछे एक छोटा बक्सा। बक्से को छूने से पहले मेरी बात माननी है।"

"क्या बात?" मैंने पूछा।

"बक्सा उठाने से पहले वहाँ जो मिट्टी है, उसे हाथ में लेना।" उन्होंने मेरी तरफ़ उँगली उठाई। "तू मिट्टी सूंघता है न? तो उसे सूंघना। अगर मिट्टी कहे कि वो बक्सा तेरा नहीं है, तो उसे वापस रख देना। चाहे जो हो जाए।"

मैंने सिर हिलाया।

अंधेरे में, कहीं दूर, भैरव की आवाज़ आई — "कालू!"

कालू काका ने लालटेन बुझा दी।

"भागो," उन्होंने फुसफुसाया। "अभी। ये रास्ता मेरे पीछे।"

हम भागे। झाड़ियों में से, घास में से, कब्रों के बीच से। मेरा पैर एक बार किसी पत्थर से टकराया और मैं लड़खड़ाया, पर मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी हथेली ठंडी थी, पर पकड़ मज़बूत।

पीछे से भैरव की आवाज़ आ रही थी — "कालू! तू मेरी माँ की कब्र के पास क्यों गया था? कालू!"

हम नहर के किनारे तक पहुँचे, जहाँ रणवीर सिंह व्हीलचेयर पर बैठे इंतज़ार कर रहे थे। टिंकू उनके पीछे खड़ा था, हाथ में एक डंडा पकड़े, जैसे किसी लड़ाई के लिए तैयार हो।

"क्या हुआ?" रणवीर सिंह ने पूछा। उनकी आवाज़ में वो घबराहट थी जो वो छुपाने की कोशिश कर रहे थे।

"कुछ नहीं," कालू काका ने कहा। "पर अब कब्रिस्तान सुरक्षित नहीं है। भैरव को पता चल गया कि हम यहाँ हैं।"

"तो अब?" टिंकू ने पूछा। उसका डंडा काँप रहा था, पर वो उसे नीचे नहीं रख रहा था।

"अब मंदिर," मैंने कहा।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। रणवीर सिंह ने भी। और उनके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था — डर नहीं, कुछ और। जैसे कोई पुरानी बात याद आ रही हो।

"मंदिर?" रणवीर सिंह ने धीरे से दोहराया। "वो मंदिर जहाँ भैरव की माँ की मूर्ति है?"

"नहीं," कालू काका ने कहा। "वो मंदिर जहाँ भैरव की माँ ने खुद अपनी मूर्ति बनवाई थी। मरने से पहले। उसने कहा था — 'मेरे बेटे के हाथ में जो चीज़ है, वो मेरे पास लौटानी है।' और फिर वो मर गई। और भैरव ने उस दिन से उस मंदिर की तरफ़ देखा तक नहीं।"

मेरी साँस रुक गई। "तो वो बक्सा… भैरव की माँ ने खुद रखा था?"

कालू काका ने सिर हिलाया। "उसने मुझे उस रात बुलाया था। कहा था — 'कालू, जिस दिन मेरा बेटा अपनी माँ को भूल जाए, उस दिन ये बक्सा खुलेगा।' मैंने पूछा था कि अगर वो कभी न भूला तो? तो वो हँसी थी। बोली थी — 'वो मुझे भूल जाएगा, कालू। ज़हर बनाने वाले अपनी माँ को भी नहीं बख्शते।'"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मीरा ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा। इस बार उसने कुछ नहीं कहा। बस रखा।

"चलो," मैंने कहा। "अभी।"

अखाड़े के पीछे का बरगद पेड़ मैंने सैकड़ों बार देखा था। पर उसके नीचे का मंदिर — वो मैंने कभी नहीं देखा था। शायद इसलिए कि वो इतना टूटा हुआ था कि कोई उसे मंदिर समझता ही नहीं। दीवार पर काई जमी थी, छत आधी गिरी हुई थी, और दरवाज़े पर जो लकड़ी थी वो सिर्फ़ एक तरफ़ टिकी थी।

हम चारों रात के ग्यारह बजे वहाँ पहुँचे। कालू काका के हाथ में लालटेन थी, टिंकू के हाथ में डंडा, मेरे हाथ में चाबी, और मीरा के हाथ में वो शीशी — जो उसने किसी कारण से छोड़ी नहीं थी।

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