Spirit of a Fighter – Chapter 240
"हाँ," कालू काका ने कहा। "बलवंत सिंह की बीवी। जो इस गाँव में आई थी, बीस साल पहले, एक बक्सा लेकर। और फिर मर गई — यहाँ, इसी गाँव में, किसी को बताए बिना। भैरव ने उसे कब्रिस्तान के उस कोने में दफनाया जहाँ कोई नहीं जाता। और चाबी उसने खुद अपने हाथ से उस कब्र की मिट्टी में दबाई थी।"
"आपको कैसे पता?" मैंने पूछा।
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें अंधेरे में चमक रही थीं — जैसे पुरानी किताब के पन्ने आग की रोशनी में।
"क्योंकि मैं वहाँ था," उन्होंने कहा। "उस रात। बारिश हो रही थी। भैरव ने मुझे कंधे पर कुदाल रखकर बुलाया था। कहा — 'कालू, आज तू मेरे साथ चल।' और मैं गया। क्योंकि उस वक़्त मैं डरता था। आज भी डरता हूँ।"
उनकी आवाज़ रुकी। उन्होंने अपनी लाठी पर हाथ रखा।
"बीस साल से मैं वो रात ढो रहा हूँ," उन्होंने कहा। "हर बार जब मैं कब्रिस्तान के उस कोने से गुज़रता हूँ, मुझे लगता है कि वो मिट्टी मुझसे कुछ कह रही है। पूछ रही है — 'कालू, तू कब बोलेगा?'"
उन्होंने सीधे मेरी तरफ़ देखा।
"आज मैं बोल रहा हूँ," उन्होंने कहा। "आज रात। उस कब्र के पास। तीनों चीज़ें एक जगह मिलेंगी — चाबी, सच, और वो बक्सा जो उसकी माँ लेकर आई थी।"
"बक्सा?" मैंने कहा। "कब्र में?"
"कब्र के नीचे," कालू काका ने कहा। "भैरव ने उसे मिट्टी में दबाया था, अपनी माँ के साथ। क्योंकि उसमें वो था जो उसकी माँ उसके खिलाफ़ जानती थी।"
टिंकू ने टोपी उतार दी। उसका चेहरा गंभीर था — पहली बार मैंने उसे इतना गंभीर देखा।
"काका," उसने कहा, "उस बक्से में क्या है?"
कालू काका ने एक पल सोचा। फिर उन्होंने कहा, "जो मैंने बीस साल से किसी को नहीं बताया।"
वो पलटे। उन्होंने अपनी लालटेन उठाई। और फिर बिना पीछे देखे, धीरे-धीरे चलने लगे।
"अब आओ," उन्होंने कहा। "रात बहुत नहीं बची है।"
हम सब एक-दूसरे को देखने लगे। गुड़िया ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा। मीरा ने अपने पिता की कुर्सी पकड़ी। टिंकू ने टोपी फिर पहनी, और उसके हाथ में जो थैली थी — खीर की — उसे उसने कसकर सीने से लगा लिया।
मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। उन्होंने मुझे देखा, और बहुत हल्के से सिर हिलाया। बस इतना — जैसे कह रहे हों, "अब तेरी बारी।"
मैं आगे बढ़ा। कालू काका के पीछे-पीछे।
कब्रिस्तान का रास्ता नहर के किनारे से जाता था — वो रास्ता जिस पर दिन में कोई नहीं चलता, और रात में तो बिलकुल नहीं। दोनों तरफ़ ऊँची घास, और बीच में पतली-सी पगडंडी। चाँद बादलों के पीछे था, पर इतनी रोशनी थी कि पगडंडी दिख जाए।
कालू काका की लालटेन जल उठी। उन्होंने उसे ऊँचा उठाया। पीली रोशनी घास पर फैल गई, और घास में कुछ चमका — शायद ओस, शायद कुछ और।
"काका," मैंने धीरे से कहा, उनके बिलकुल पास चलते हुए, "आपने इतने साल चुप क्यों रहे?"
वो कुछ कदम चले। फिर बोले, बिना मेरी तरफ़ देखे, "डर से, बेटा।"
"इतना डर?"
"तू नहीं जानता," उन्होंने कहा। "भैरव सिर्फ़ ज़हर नहीं देता। वो पहले डर देता है। और डर ऐसा होता है जो खून में घुल जाता है। मैंने अपनी बीवी को खोया, अपने बेटे को खोया — नहीं, मरने से नहीं, पर उन्होंने मुझसे दूर जाना चुना क्योंकि मैं उन्हें बचा नहीं सका।" उनकी आवाज़ में कड़वाहट थी। "और मैं चुप रहा। बीस साल। हर सुबह मिट्टी सींचता रहा, और हर शाम अपने आप से कहता रहा — 'कल बोलूँगा।' चालीस साल का बेटा बूढ़ा हो गया, और कल कभी नहीं आया।"
मेरा गला भर आया। मैंने कुछ नहीं कहा। कुछ कहने की ज़रूरत भी नहीं थी।
हम कब्रिस्तान के फाटक पर पहुँचे। लोहे का पुराना फाटक, जिसकी एक कुंडी टूटी थी, जो हवा में हल्की-हल्की चरमराती थी।
कालू काका रुके। उन्होंने लालटेन ऊपर उठाई।
"वो कोना," उन्होंने कहा, और उन्होंने दाहिनी तरफ़ इशारा किया — जहाँ घास सबसे ऊँची थी और पेड़ सबसे पुराने। "वहाँ कोई नहीं जाता। गाँव वाले कहते हैं वहाँ भूत है। पर भूत नहीं है।" उन्होंने एक गहरी साँस ली। "सिर्फ़ एक औरत है, जो अपने बेटे का इंतज़ार कर रही है — और वो बेटा कभी नहीं आया।"
हम अंदर गए।
घास हमारे घुटनों तक थी। कहीं-कहीं तो कमर तक। टिंकू ने गुड़िया का हाथ पकड़ लिया। मीरा अपने पिता की कुर्सी को धकेल रही थी, और कुर्सी के पहिए घास में फँस रहे थे। मैंने पीछे जाकर कुर्सी उठाने में हाथ बँटाया।
फिर मुझे वो गंध आई।
पहले हल्की — जैसे किसी ने दूर से फूलों की टोकरी खोली हो। फिर तेज़। फिर ऐसी कि मेरी साँस रुक गई।
"रुको," मैंने कहा।
सब रुके।
मैंने आँखें बंद कीं। गहरी साँस ली। और मेरे अंदर कुछ बोला — वो आवाज़ जो सिर्फ़ मेरे सीने से आती है, जो मुझे रास्ता दिखाती है।
नमी। पुरानी लकड़ी। सूखे फूल। और…
और एक गंध जो मैंने कभी नहीं सूँघी थी, पर पहचान ली। जैसे कोई बंद कमरे में बहुत दिनों से रखी मिट्टी की गंध। जैसे किसी ने अपनी साँस अंदर रोक ली हो, बहुत सालों से।
"यहाँ," मैंने कहा। मैंने आँखें खोलीं और बाईं तरफ़ इशारा किया। "इस तरफ़। दस कदम।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था — हैरानी, और उसके पीछे, बहुत गहरे में, डर।
"तू पहचान गया," उन्होंने धीरे से कहा।
"मैं पहचान गया," मैंने कहा।
हम चले। दस कदम। और फिर वहाँ, घास के बीच, मिट्टी का एक छोटा-सा टीला दिखा — जैसे किसी ने जल्दी में कब्र बनाई हो और फिर उसे भूल गया हो।
उस पर कोई पत्थर नहीं था। कोई नाम नहीं। बस मिट्टी, और उस पर उगी घास।
मैं उस टीले के पास घुटनों के बल बैठ गया।
"काका," मैंने कहा, "चाबी कहाँ है?"
कालू काका मेरे बगल में बैठे। उन्होंने लालटेन नीचे रखी। फिर अपनी उँगली से कब्र के बिलकुल बीच की तरफ़ इशारा किया।
"वहाँ," उन्होंने कहा। "जहाँ मिट्टी सबसे ऊँची है। उसके नीचे। पर…"
"पर?"
"उसने कहा था," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ फुसफुसाहट बन गई, "कि जो इस चाबी को निकालेगा, उसे पहले उस औरत से माफ़ी माँगनी होगी। क्योंकि वो चाबी उसने अपने बेटे के खिलाफ़ इसीलिए दबाई थी कि कोई आए और उसके बेटे को रोके। वो अपने बेटे को नहीं बचा सकी। तो वो चाहती थी कि कोई और उसे बचाए।"
मैंने मिट्टी को देखा। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"मैं माफ़ी नहीं माँगूँगा," मैंने कहा।
सब चौंके। मीरा ने कुछ कहना चाहा, पर रणवीर सिंह ने हाथ उठाकर रोक दिया।
"माफ़ी उससे माँगनी चाहिए जिसने गलती की हो," मैंने कहा। "उस औरत ने क्या गलती की? उसने कोशिश की। उसने चाबी छिपाई, ताकि कोई आए। हम आए। तो माफ़ी नहीं — धन्यवाद।"
मैंने अपनी हथेली मिट्टी पर रखी।
मिट्टी ठंडी थी। पर अंदर से गर्म। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरा हाथ थाम लिया हो।
"शुक्रिया, माँ," मैंने धीरे से कहा। "अब हम उसे रोकेंगे।"
और फिर मैंने मिट्टी हटानी शुरू की।
मेरे नाखून मिट्टी में घुसे। पीछे से टिंकू ने कुछ कहा — शायद "मैं भी मदद करूँ" — पर मैंने सुना नहीं। मेरा पूरा ध्यान मिट्टी पर था। मिट्टी जैसे मुझसे बात कर रही थी — बता रही थी कि कहाँ खोदना है, कहाँ नहीं।
तीन मुट्ठी, चार, पाँच…
और फिर मेरी उँगली किसी सख्त चीज़ से टकराई।
लोहा। ठंडा लोहा।
मैंने धीरे से मिट्टी हटाई। एक छोटी-सी लोहे की डिब्बी निकली — जितनी मेरी हथेली जितनी बड़ी। जंग लगी, पर मज़बूत। उस पर कोई ताला नहीं था।
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