Spirit of a Fighter238 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 238

6 min read November 5, 2026

“मैंने उसे वहाँ रखा था, बेटा,” रणवीर सिंह ने कहा। “क्योंकि वो जगह भैरव कभी नहीं छुएगा। वो उस कब्र से डरता है। वो जानता है कि तेरी माँ उस रात मेरे कमरे में आई थी, जब उसने मुझे पहली खुराक दी थी। उसने कुछ देखा था। और अगले महीने वो बुखार से मर गई।”

मीरा की आँखें भर आईं। उसने अपना मुँह अपने हाथ से ढक लिया।

“तो माँ भी…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

“मुझे नहीं पता,” रणवीर सिंह ने कहा। “बीस साल से मुझे नहीं पता। पर मुझे शक है। और वही शक मेरे सीने में आग की तरह जलता है।”

मैंने अपनी आँखें नीची कर लीं। मीरा की सिसकियाँ धीमी थीं, पर साफ़। रणवीर सिंह ने उसका कंधा पकड़ा।

“अब रो मत,” उन्होंने कहा। “अब वक़्त है कि हम वो डिब्बी निकालें। क्योंकि जो उसमें है, वो शायद भैरव के खिलाफ़ हमारा सबसे बड़ा हथियार है।”

“क्या है उसमें?” मैंने पूछा।

“मुझे नहीं पता,” रणवीर सिंह ने कहा। “मैंने कभी नहीं खोली। रघुवीर ने कहा था — ‘तू मत खोलना। मेरा बेटा खोलेगा।’”

मेरे हाथ फिर काँपने लगे। मैंने उन्हें घुटनों पर रख दिया।

“तो चलिए,” मैंने कहा। “अभी चलिए।”

“नहीं।” रणवीर सिंह ने सिर हिलाया। “आज नहीं। आज भैरव के आदमी हर जगह होंगे। वो जानता है कि हम कुछ करने वाले हैं। उसने खुद कहा था — तीन दिन।”

“तीन दिन बाद मुकाबला,” मीरा ने कहा। “तो तीन दिन में…”

“तीन दिन में हमें वो डिब्बी निकालनी है,” रणवीर सिंह ने कहा। “और तेरे पापा के ज़हर की आख़िरी खुराक को भी रोकना है।” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। “तेरी माँ के शरीर में ज़हर की जड़ बाकी है। अगर भैरव उसे आख़िरी खुराक दे देगा, तो…”

“तो क्या?” मेरी आवाज़ सूखी थी।

“तो कोई वैद्य, कोई डॉक्टर, कोई दवा उसे नहीं बचा सकेगी।” रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। “सिर्फ़ एक चीज़ बचा सकती है। और वो है तहखाने की असली मिट्टी।”

मैंने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर तभी…

पुल के पीछे, झाड़ियों की तरफ़ से, किसी के भागने की आवाज़ आई।

मैं उठ खड़ा हुआ। मीरा ने भी सिर उठाया। रणवीर सिंह ने अपना हाथ कुर्सी की बाँह पर कसकर रखा।

“कौन?” मैंने पुकारा।

कोई जवाब नहीं। सिर्फ़ सूखी पत्तियों की आवाज़, जो दूर जाती गई।

और फिर मैंने सुना — चप्पल की आवाज़। एक आदमी, दो पैर, तेज़ कदम। और उसके साथ एक गंध। पसीने की। और उस पसीने के अंदर… भैरव की बोतल वाली वो कड़वाहट।

मेरी नसें खिंच गईं।

“कोई सुन रहा था,” मैंने धीरे से कहा।

रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में डर नहीं था — बस एक ठंडी, पुरानी शांति, जैसे एक पहलवान जानता है कि मुकाबला शुरू हो चुका है।

“कितने देर से?” उन्होंने पूछा।

“शायद शुरू से,” मैंने कहा। “या शायद…” मैंने पुल के नीचे झाँका। “शायद जब से आपने वो डिब्बी का ज़िक्र किया।”

मीरा उठ खड़ी हुई। उसका चेहरा सख़्त था।

“तो अब भैरव को पता चल जाएगा,” उसने कहा।

“हाँ,” मैंने कहा।

“और वो कब्र तक पहुँचने की कोशिश करेगा।”

“हाँ।”

रणवीर सिंह ने अपनी मुट्ठी कुर्सी की बाँह पर मारी। आवाज़ छोटी थी, पर उसमें वो पुरानी ताकत थी जो अभी मरी नहीं थी।

“तो फिर हमें उससे पहले पहुँचना होगा,” उन्होंने कहा। “आज रात। जब अंधेरा हो।”

“पर भैरव के आदमी…”

“मैं जानता हूँ,” रणवीर सिंह ने कहा। “इसीलिए हम सीधे नहीं जाएँगे।” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। “वीर सिंह, तुझे कब्रिस्तान की मिट्टी पहचाननी है। क्या तेरी नाक ऐसा कर सकती है?”

मैंने एक पल सोचा। कब्रिस्तान की मिट्टी में वो गंध होती है जो कहीं और नहीं — नमी, पुरानी लकड़ी, फूलों की सूखी पंखुड़ियाँ, और… और कुछ और भी। जो मैं कभी नहीं भूला।

“हाँ,” मैंने कहा। “मैं पहचान लूँगा।”

“तो ठीक है,” रणवीर सिंह ने कहा। “आज रात। तू, मैं और मीरा।”

“और मैं?” — पीछे से आवाज़ आई।

मैं पलटा। सीढ़ियों पर टिंकू खड़ा था। टोपी उसके हाथ में थी, जो उसने मुझे दी थी। और उसके पीछे… गुड़िया।

मेरा दिल धक से रह गया।

“गुड़िया?” मेरी आवाज़ तेज़ हो गई। “तू यहाँ क्या कर रही है?”

“तुम्हें देखने आई,” गुड़िया ने कहा, और उसकी ठुड्डी ऊपर थी, जैसे उसे कोई डर ही न हो। “तुम रात भर से घर नहीं आए। माँ परेशान थीं। और टिंकू भैया लड्डू नहीं बना रहे थे, तो मुझे कुछ गड़बड़ लगी।”

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसने अपने कंधे उचकाए।

“मैंने उसे रोका,” उसने कहा। “पर तेरी बहन तेरी बहन है। जब उसने कहा कि अगर मैं उसे साथ नहीं ले जाऊँगा, तो वो अकेली चली जाएगी, तो मुझे लाना पड़ा।”

गुड़िया ने अपनी थैली मेरी तरफ़ बढ़ाई। उसमें कुछ भारी था।

“ये क्या है?”

“रोटी,” उसने कहा। “और माँ की दवा।” उसने मेरी आँखों में देखा। “भैया, माँ ने कहा कि तुम्हें भूखा नहीं रहना है। जो लड़ता है, वो खाली पेट नहीं लड़ता।”

मेरा गला भर आया। मैंने थैली ली और गुड़िया का सिर सहलाया।

रणवीर सिंह ने हम सबको देखा। उनकी आँखों में कुछ बदल रहा था — जैसे एक बूढ़ा पहलवान अचानक समझ जाए कि उसकी अकेली लड़ाई अब अकेली नहीं रही।

“ठीक है,” उन्होंने कहा। “सब आज रात चलेंगे।”

“पर पापा…”

“मीरा,” रणवीर सिंह ने कहा। “मैंने बीस साल अकेले लड़ने की कोशिश की। और मैं हारता रहा। अब मैं अकेले नहीं लड़ूँगा।”

उन्होंने अपनी कुर्सी घुमाई। “अब जाओ, सब। आज रात की तैयारी करो। भैरव के आदमी ने हमें सुना है, तो वो भी तैयारी करेगा। हमें उससे पहले पहुँचना है।”

मैंने सिर हिलाया। टिंकू ने टोपी फिर पहन ली। गुड़िया ने अपनी थैली संभाली। मीरा ने अपने पिता का हाथ फिर पकड़ा, एक पल के लिए, और फिर छोड़ दिया।

हम पुल से उतरने लगे।

पत्थर फिसल रहे थे। मैं सबसे पीछे था, ताकि कोई गिरे तो पकड़ सकूँ। जब मैं आख़िरी सीढ़ी पर पहुँचा, तो मेरी नज़र झाड़ियों की तरफ़ गई।

वहाँ कुछ नहीं था। सिर्फ़ एक टूटी डाली, और उस पर… एक छोटा-सा काग़ज़ बँधा हुआ।

मैं रुक गया। दिल की धड़कन तेज़ हो गई।

“क्या हुआ?” टिंकू ने पूछा।

मैंने काग़ज़ खोला। उस पर कोयले से लिखा था, वही लिखाई जो मेरे घर की दीवार पर थी —

“कब्र खोदने वाले को कब्र में जगह मिलेगी। आज रात।”

मेरे हाथ से काग़ज़ गिर गया। और उस वक़्त, दूर नहर के पार, मुझे एक जलती हुई लालटेन दिखी, जो धीरे-धीरे अंधेरे में आगे बढ़ रही थी — कब्रिस्तान की तरफ़।

॥

मैं दौड़ा।

पुल के नीचे से निकलकर सीधे झाड़ियों की तरफ़। पैर पत्थरों पर फिसल रहे थे, पर मैं रुका नहीं। टिंकू पीछे से चिल्लाया — "वीर, रुक, अंधेरा है!" — पर मैंने सुना नहीं।

झाड़ियों तक पहुँचा। हाँफ रहा था। इधर-उधर देखा। कुछ नहीं। सिर्फ़ हवा और नहर की दूर से आती आवाज़।

फिर मेरी नज़र नीचे गई।

झाड़ी की जड़ों के पास, मिट्टी पर, एक चप्पल पड़ी थी। टूटी चप्पल। एक तरफ़ का पट्टा उखड़ा हुआ, और उस पर सूखी मिट्टी जमी थी। मैंने उसे उठाया। उसमें वो गंध थी जो मैं अब भूल नहीं सकता था — चमड़े की पुरानी बू, पसीना, और उसके ऊपर भैरव के कमरे की वो मीठी कड़वी महक, जो पहलवानों की साँस में बसती है।

ये लुट्टन की चप्पल थी।

"क्या मिला?" — मीरा की आवाज़ पीछे से आई।

मैंने चप्पल उसकी तरफ़ बढ़ाई। उसने देखा, और उसका चेहरा कठोर हो गया।

"वो यहीं था," मीरा ने कहा। "हमारी बातें सुन रहा था।"

"सुन रहा था नहीं," मैंने कहा। "सुन चुका।"

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