Spirit of a Fighter237 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 237

6 min read November 5, 2026

रणवीर सिंह का हाथ कुर्सी की बाँह से फिसल गया। उन्होंने अपने होंठ कसकर बंद कर लिए, और मैंने देखा कि उनके जबड़े की मांसपेशी काँप रही है।

“मुझे शक था,” उन्होंने धीरे से कहा, जैसे खुद से बोल रहे हों। “बीस साल से शक था। पर पक्का नहीं था। मैंने सोचा — शायद कोई असली दवा है। शायद भैरव… शायद उसमें इतनी भी इंसानियत बची है कि वो मेरी बेटी को मारते हुए भी रुक जाए।”

उन्होंने अपनी आँखें मुँछों से छुपाने की कोशिश की, पर मैंने देख लिया। उनकी पलकें गीली थीं।

मैंने कुछ नहीं कहा। कुछ कहने लायक कुछ था भी नहीं।

पुल के नीचे से एक नाव गुज़री, और उसके जाने की आवाज़ ने उस चुप्पी को और गहरा कर दिया।

तभी पीछे पत्थरों पर पैरों की आवाज़ आई।

मैं पलटा। सीढ़ियों की तरफ़।

मीरा चढ़ रही थी। हाथ में एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था, और उसका चेहरा ऐसा था जैसे वो कई रातों से सोई न हो। उसने मुझे देखा, फिर अपने पिता को देखा।

“पापा।”

रणवीर सिंह ने अपना चेहरा ठीक किया। पर देर हो चुकी थी।

“तुम यहाँ?” उनकी आवाज़ में हैरानी थी।

“मुझे सुक्खी बुआ ने बताया कि आप सुबह-सुबह नहर की तरफ़ निकले हैं।” मीरा ऊपर आ गई। उसने मेरी तरफ़ देखा। “और ये भी पता था कि भैया कहाँ मिलेंगे।”

मैंने उसकी तरफ़ देखा। “मैंने कुछ नहीं बताया।”

“मुझे बताने की ज़रूरत नहीं थी,” उसने कहा। “तुम जहाँ भी होते हो, तुम्हारी उँगलियाँ मुट्ठी में बंधी होती हैं। गुड़िया ने बताया कि तुम रात भर जागते रहे। और जब तुम जागते हो, तो पुल पर आते हो।”

मैं चुप हो गया।

मीरा ने अपने पिता के सामने काग़ज़ रखा। रणवीर सिंह ने उसे देखा, फिर मेरी तरफ़।

“ये क्या है?”

“लैब की रिपोर्ट,” मीरा ने कहा। “भैरव के कमरे के मटके का पानी।” उसने एक गहरी साँस ली। “पापा, इसमें एक चीज़ मिली है जो नशा है। दर्द मिटाती है, ताकत बढ़ाती है, पर शरीर के अंदर की उम्र खा जाती है। जो पीता है वो बाहर से जवान दिखता है और अंदर से बूढ़ा हो जाता है।”

रणवीर सिंह ने काग़ज़ अपने हाथ में लिया। उनके हाथ काँप रहे थे, और काग़ज़ काग़ज़ ही था — हल्का — पर उनके हाथों में वो जैसे ईंट हो गया।

वो पढ़ते रहे। एक लाइन, दूसरी लाइन, तीसरी। उनके होंठ धीरे-धीरे सफ़ेद पड़ते गए।

मीरा उनके पास बैठ गई। उसने अपना हाथ उनके घुटने पर रखा।

“पापा।”

रणवीर सिंह ने काग़ज़ नीचे कर दिया। उन्होंने आसमान की तरफ़ देखा, जहाँ सुबह की पहली किरण पेड़ों के ऊपर फैल रही थी।

और फिर मैंने वो देखा जो मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं देखूँगा।

एक आँसू उनकी आँख से निकला। धीरे-धीरे, बहुत धीरे। उन्होंने उसे मुँछों से छुपाने की कोशिश की, हाथ ऊपर उठाया, पर हाथ बीच में ही रुक गया। जैसे उन्हें खुद भी यकीन नहीं आ रहा था कि उनके अंदर इतना पानी बचा है।

“बीस साल,” उन्होंने कहा। आवाज़ फटी हुई थी। “बीस साल मैंने ये पानी पिया। बीस साल मैंने सोचा कि ये मेरा इलाज है।”

“पापा, अब…”

“और मैंने अपनी बेटी को भी इसी आदमी के पास छोड़ा।” उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में जो था वो मैं शब्दों में नहीं बता सकता। “मैंने सोचा, अगर मैं बोलूँगा, तो ये तुझे मार देगा। और मैं चुप रहा। और उसने तुझे दवा के नाम पर…”

वो पूरा वाक्य खत्म नहीं कर पाए।

मीरा ने उनका हाथ पकड़ा। “पापा, मैंने वो नहीं पिया। एक घूँट भी नहीं। भैरव कल शीशी लेकर आया था, पर मैंने उसे दराज़ में बंद कर दिया।”

रणवीर सिंह ने उसकी तरफ़ देखा।

“मैंने सोचा,” मीरा की आवाज़ धीमी थी, “कि अगर मैं इसे पी लूँगी, तो शायद आप ठीक हो जाएँगे।” उसने अपना सिर झुका लिया। “पर वीर ने सब बता दिया। और मैंने शीशी नहीं खोली।”

रणवीर सिंह ने बहुत देर तक मीरा को देखा। फिर उन्होंने अपना हाथ उठाया और उसका सिर सहलाया। एक बार। दो बार। जैसे कोई पुराना आदमी अपनी अंगूठी पर धूल से साफ़ करता हो।

“तू मेरी बेटा है,” उन्होंने धीरे से कहा। “बेटी नहीं। बेटा। मेरी हड्डी, मेरा खून। भैरव ने मेरी टाँगें लीं, पर मेरी रीढ़ नहीं। वो तू है।”

मीरा की आँखें भर आईं। उसने अपना चेहरा अपने पिता के कंधे पर रख दिया। और रणवीर सिंह ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

मैं वहाँ बैठा था, हाथ जोड़े, और मुझे लग रहा था कि मैं किसी ऐसी चीज़ के बीच में आ गया हूँ जो सिर्फ़ उन दोनों का है। मैं उठने ही वाला था कि रणवीर सिंह ने आँखें खोलीं।

“बैठ, वीर सिंह,” उन्होंने कहा। “तू भी इस घर का हो गया है। अब जब तक सच नहीं खुलता, तू यहाँ से नहीं जाएगा।”

मैं फिर बैठ गया।

कुछ देर हम तीनों चुप बैठे रहे। नहर बहती रही। दूर किसी खेत से बैल की घंटी आ रही थी। मीरा ने अपना सिर अपने पिता के कंधे से उठाया और अपनी आँखें पोंछीं। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।

“तुमने क्यों नहीं बताया?” उसने पूछा। “कल रात। जब भैरव दवा लेकर आया था। तुमने मुझे क्यों नहीं बताया कि ये ज़हर है?”

“मैंने तुझे बताया था,” मैंने कहा। “तूने माना नहीं।”

“मैंने माना नहीं क्योंकि मेरे पास सबूत नहीं था।” उसकी आवाज़ में वो पुरानी ज़िद लौट आई थी। “सबूत के बिना आरोप नहीं।”

“अब है,” मैंने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया।

मीरा ने अपने होंठ कसे। फिर धीरे से कहा, “अब है।”

रणवीर सिंह ने अपनी कुर्सी सीधी की। उनकी आवाज़ में वो गरज लौट आई थी जो सिर्फ़ अखाड़े के मालिक की होती है।

“अब सुनो, दोनों,” उन्होंने कहा। “मैं तुम्हें कुछ बताने वाला हूँ। और ये बात मैंने आज तक मीरा को भी नहीं बताई।”

मीरा ने उनकी तरफ़ देखा। “पापा?”

“ये बात बीस साल पुरानी है,” रणवीर सिंह ने कहा। “और अगर ये बाहर निकली, तो भैरव के पास कोई रास्ता नहीं बचेगा। वो या तो भागेगा, या…”

वो रुक गए।

“या क्या?” मैंने पूछा।

“या वो वो करेगा जो उसने कभी नहीं किया।” रणवीर सिंह ने मेरी आँखों में देखा। “वो पूरे गाँव के सामने अपना असली चेहरा दिखा देगा। और जब भैरव अपना असली चेहरा दिखाता है, तो पहले खून होता है, बाद में सवाल।”

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर अपने पिता की तरफ़।

“तो बताइए,” उसने कहा। “क्या बात है?”

रणवीर सिंह ने एक गहरी साँस ली। उन्होंने अपने हाथ कुर्सी की बाँहों पर रखे, और मुझे लगा कि वो अपने अंदर कुछ बहुत भारी चीज़ ढो रहे हैं, जिसे उन्होंने बीस साल से किसी को नहीं दिखाया।

“तेरे पापा रघुवीर ने,” उन्होंने धीरे से शुरू किया, “मरने से एक रात पहले मुझे एक चीज़ दी थी। एक छोटी डिब्बी। और कहा था — ‘रणवीर, अगर मेरे साथ कुछ हो जाए, तो ये डिब्बी मेरे बेटे को देना। पर तभी देना, जब वो खुद इसे लेने लायक हो जाए।’”

मेरी साँस रुक गई। “डिब्बी?”

“वो डिब्बी आज भी मेरे पास है,” रणवीर सिंह ने कहा। “अखाड़े में नहीं। उस जगह पर, जहाँ भैरव के हाथ नहीं पहुँच सकते।”

“कहाँ?” मीरा ने पूछा।

रणवीर सिंह ने अपनी आँखें मीरा पर टिकाईं।

“तेरी माँ की कब्र के नीचे,” उन्होंने कहा।

मीरा सन्न रह गई। उसका चेहरा एक पल के लिए पूरा खाली हो गया।

“माँ की कब्र?” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट थी।

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