Spirit of a Fighter – Chapter 236
सुबह मैं नहर के पुल पर पहुँचा, तो सूरज अभी निकला नहीं था। पुल पुराना था, पत्थरों के जोड़ ढीले, और नीचे पानी की आवाज़ ऐसी जैसे कोई धीरे-धीरे रो रहा हो।
वहाँ वो थे। व्हीलचेयर पर बैठे। पीछे एक आदमी खड़ा था, हाथ कुर्सी के पीछे टिकाए। रणवीर सिंह का चेहरा सुबह की रोशनी में और भी पीला लग रहा था।
मैंने दूर से ही हाथ जोड़ लिए। मेरे पैर काँप रहे थे, और मुझे शर्म आ रही थी कि काँप रहे हैं।
रणवीर सिंह ने मुझे देखा। ऊपर से नीचे तक। जैसे कोई दुकानदार कपड़ा परखता हो।
“तू वही लड़का है जो दीवार के बाहर खड़ा रहता था?” उन्होंने पूछा।
मैंने सिर झुका लिया।
“आँखें उठा।”
मैंने आँखें उठाईं। उनकी आँखें धुँधली थीं, पर उनमें कुछ ऐसा था जो मुझे देखकर हिल गया। जैसे कोई बहुत दिनों से सूखी नदी हो और अचानक पानी देख ले।
वो कुछ पल देखते रहे। फिर मुस्कुराए।
“अंदर आ जा।”
मैं सीढ़ी चढ़ने लगा। पत्थर फिसल रहे थे। जब मैं ऊपर पहुँचा, तो रणवीर सिंह ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा।
एक पल के लिए मुझे लगा — ये मेरे पापा का हाथ है। वही वज़न। वही गर्मी। मेरी आँखों में पानी आ गया, और मैंने तेज़ी से पलकें झपकीं ताकि वो देख न लें।
“बैठ,” उन्होंने कहा।
मैं उनके पास बैठ गया। नीचे नहर बह रही थी।
“मैं बीस साल से इस कुर्सी पर बैठा हूँ,” रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। “और मुझे पता है कि मुझे ज़हर दिया जा रहा है।”
मेरी साँस रुक गई।
“रोज़। थोड़ा-थोड़ा। खाने में, पानी में, दवा में।” उन्होंने अपने हाथों को देखा। “मैं चुप हूँ। क्योंकि मेरी बेटी अकेली है। अगर मैं बोलूँगा, तो मेरे बाद उसका नंबर आएगा।”
मेरे गले में कुछ अटक गया।
“आपको पता है?” मैंने पूछा। आवाज़ मेरी अपनी नहीं लगी।
रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी मुस्कान गायब हो गई थी।
“मुझे सब पता है, वीर सिंह।” उन्होंने धीरे से कहा। “मुझे ये भी पता है कि तेरी नाक ज़हर पहचान सकती है।”
मेरा चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
॥
मेरा चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
उँगलियाँ ठंडी हो गईं। मैंने अपने घुटनों पर हाथ रखा ताकि काँपना रुक जाए, पर रुका नहीं। रणवीर सिंह मेरी तरफ़ देख रहे थे — वैसे ही, जैसे एक बूढ़ा पहलवान देखता है कि नया लड़का डरा है या तैयार है।
मैंने कुछ बोलने की कोशिश की, पर आवाज़ गले में ही अटक गई। नीचे नहर का पानी बह रहा था, और उसकी आवाज़ अचानक बहुत तेज़ लग रही थी।
“कैसे?” मैंने आख़िर पूछा। “कैसे पता आपको?”
रणवीर सिंह ने अपना हाथ कुर्सी की बाँह पर रखा। उनकी उँगलियाँ सूजी हुई थीं, जोड़ों पर गाँठें उभरी हुईं।
“तेरे पापा रघुवीर मेरे दोस्त थे,” उन्होंने कहा। “दोस्त नहीं — भाई। उस दौर के सारे पहलवान मेरे दुश्मन थे, पर वो नहीं था। वो मेरे साथ मिट्टी में बैठता था, मेरे घाव धोता था।”
उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा।
“एक रात वो मेरे पास आया। आधी रात। मैं उस वक़्त भी इसी कुर्सी पर नहीं बैठा था, पर पैरों में दर्द शुरू हो चुका था। वो मेरे पास बैठा और बोला — ‘रणवीर, मेरे बेटे की नाक में खुदा का करिश्मा है।’”
मेरी साँस रुक गई।
“मैंने हँसकर कहा — तू पागल हो गया है। तो वो बोला — ‘कल रात मैंने इसे आँगन में खड़ा देखा। आँखों पर पट्टी बाँधी थी। और ये बता गया कि रसोई से कौन-सी चीज़ जल रही है।’”
मेरी आँखें भर आईं। वो रात मुझे याद थी। मैं दस साल का था। माँ ने पूछा था कि आँखों पर पट्टी क्यों बाँधी है, और मैंने कहा था — खेल रहा हूँ।
“तेरे पापा ने कहा था,” रणवीर सिंह ने आवाज़ भारी करके कहा, “‘रणवीर, इस बात को किसी से मत कहना। ये नाक इसके लिए नहीं है कि लोग इसका मज़ाक उड़ाएँ। ये नाक इसके लिए है कि एक दिन ये उन लोगों को पहचान ले जो मिट्टी में ज़हर घोलते हैं।’”
मेरे हाथों से पसीना बहने लगा। मैंने उसे पोंछा, पर पसीना फिर आया।
“पर आपने मुझे अखाड़े से दूर क्यों रखा?” मेरी आवाज़ में कुछ टूटा हुआ था। “मैं सालों दीवार के बाहर खड़ा रहा। आपने कभी अंदर नहीं बुलाया।”
रणवीर सिंह ने अपनी आँखें बंद कीं। जब खोलीं, तो उनमें वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी किसी आदमी की आँखों में नहीं देखी थी — शर्म।
“क्योंकि मैं डरा हुआ था, बेटा,” उन्होंने कहा। “अगर भैरव को पता चल जाता कि रघुवीर का बेटा उसकी अखाड़े की मिट्टी में खड़ा है, तो वो तुझे उसी दिन खत्म कर देता। जैसे उसने तेरे पापा को किया।”
“मेरे पापा को?”
“हाँ।” रणवीर सिंह की आवाज़ सख़्त हो गई। “तेरे पापा जानते थे कि भैरव पहलवानों को क्या पिलाता है। और वो ये भी जानते थे कि इसे रोकना है। पर उन्होंने जल्दबाज़ी की। बिना सबूत के, सिर्फ़ अपनी आँखों के भरोसे, पंचायत के सामने बोल दिया।”
मैंने अपने हाथ मुट्ठी में बाँध लिए। नाखून हथेली में धँस गए।
“और भैरव ने?” मैंने पूछा।
“भैरव ने उस रात उन्हें अपने घर बुलाया।” रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। “सुलह के नाम पर। और एक गिलास पानी दिया।”
मेरी आँखों के आगे वो दृश्य घूम गया — पापा, जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा, पर जिनकी गंध मैं सालों से अपने अंदर ढो रहा था। एक गिलास पानी। और बाद में अस्पताल की सफ़ेद चादर।
“मैं उस वक़्त शहर में था,” रणवीर सिंह ने कहा। “किसी मुकाबले में। जब लौटा, तो सब खत्म हो चुका था। और फिर मुझे भी यही पानी दिया जाने लगा।” उन्होंने अपनी टाँगों की तरफ़ देखा। “बीस साल से।”
“तो आप चुप क्यों रहे?” मैं उठ खड़ा हुआ। मुझे अपनी आवाज़ में गुस्सा आ रहा था और मैं उसे रोक नहीं पा रहा था। “आपके पास नाम था, आपके पास गुस्सा था, आपके पास सब कुछ था — पर आप चुप रहे?”
रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं था। सिर्फ़ एक बूढ़े आदमी की थकान।
“मीरा उस वक़्त तीन साल की थी,” उन्होंने कहा। “उसकी माँ नहीं थी। अगर मैं मर जाता, तो वो किसके पास जाती? भैरव के पास? उस अखाड़े में, जहाँ हर दीवार पर खून का दाग है?”
मैं फिर बैठ गया। मेरे गुस्से का रंग बदल रहा था — अब वो रणवीर सिंह पर नहीं, अपने ऊपर आ रहा था।
“तो सबको क्यों नहीं बताते?” मैंने पूछा। “कालू काका को, गाँव को, पंचायत को। सब जानते हैं कि अखाड़े में कुछ गड़बड़ है। अब हरनाम के पास डायरी है, मेरे पास गंध है, आपके पास नाम है। फिर क्यों नहीं?”
रणवीर सिंह ने धीरे से सिर हिलाया।
“क्योंकि सबूत नहीं है, बेटा,” उन्होंने कहा। “गंध अदालत में नहीं चलती। काग़ज़ चलता है। और भैरव के पास… भैरव के पास मेरी बेटी की दवा है।”
“दवा?” मैंने उनकी आँखों में देखा। “सर, वो दवा नहीं है।”
रणवीर सिंह रुक गए।
“मैंने उसे सूँघा है,” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। “मीरा की लैब में। उस पानी में वो चीज़ है जो ताकत बढ़ाती है, पर अंदर से उम्र खा जाती है। जो पीता है वो ठीक नहीं होता। बस रुक सकता है।”
रणवीर सिंह की आँखें बड़ी हो गईं। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
“और माँ के शरीर में भी वही है,” मैंने आगे कहा। “भैरव ने खुद कहा था — माँ के अंदर ज़हर की जड़ बाकी है। और उसके पास ‘दवा’ नाम की आख़िरी खुराक है। सर, वो खुराक भी ज़हर है। मैंने उसे पहचाना है।”
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