Spirit of a Fighter – Chapter 235
"पर मुझे अच्छा नहीं लग रहा।"
"अच्छा नहीं लग रहा, तो मत कर।" उन्होंने चाकू रखा। "पर सोच ले। अगर तू बताएगा, और भैरव को पता चला कि मीरा को सब पता है — तो वो मीरा को उठा लेगा। फिर तेरे पास सिर्फ़ दो रास्ते बचेंगे। या तू उससे लड़ेगा, या वो तुझे तोड़ेगा। और मुकाबले से पहले अगर तू टूट गया, तो मुकाबला कौन लड़ेगा?"
मैं चुप रहा।
"चुप्पी भी एक हथियार है," उन्होंने कहा। "पर सिर्फ़ तब, जब उसका वक़्त पता हो। मैंने बीस साल इसका इस्तेमाल किया। तुझे बीस साल नहीं करने। तुझे सिर्फ़ तीन दिन करने हैं। तीन दिन बाद, सबके सामने, सब बोल देना।"
मैंने सिर हिलाया। और चल पड़ा।
टिंकू की दुकान अब पहले जैसी नहीं थी। जली हुई टीन की छत पर नई चादर बँधी थी, पर नीचे की लकड़ी काली पड़ी थी। दुकान खुली थी। टिंकू बैठा था, सामने एक थाली में लड्डू रखे थे। उनकी खुशबू दूर तक जा रही थी।
मुझे देखते ही वो उठा। "भाई! तू आ गया। सुन, मैंने नया हिसाब लगाया है — अगर तू जीता, तो मैं तीन दिन लगातार लड्डू बनाऊँगा। रात-दिन। और तेरे मुँह में पहला लड्डू मैं डालूँगा।"
"टिंकू…"
"और सुन — मैंने दुकान का नाम बदलने का सोचा है। 'टिंकू मिष्ठान भंडार' नहीं। अब होगा — 'वीर के लड्डू'।" वो मुस्कुराया, फिर रुका। "क्या हुआ? तेरा चेहरा कैसा है?"
मैं बैठ गया। "रणवीर सिंह से मिला।"
"क्या बात हुई?"
मैंने बताया। डिब्बा, सबूत, शर्त। मीरा को न बताने की बात। टिंकू सब सुनता रहा। एक लड्डू उसने अपने हाथ में लिया, उसे बार-बार घुमाता रहा, न खाया।
जब मैं रुका, तो उसने लड्डू वापस थाली में रखा।
"भाई," उसने कहा, "मुझे एक बात समझ नहीं आई। भैरव रणवीर सिंह को ज़हर देता है — ये तो पता था। पर वो उसे मारता क्यों नहीं? एक साथ? जब मार ही डालना है, तो बीस साल क्यों?"
मैं ठिठक गया। ये सवाल मेरे दिमाग में आया ही नहीं था।
"क्योंकि," मैंने धीरे से कहा, "मरा हुआ आदमी दर्द नहीं सहता।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें बड़ी हो गईं।
"भैरव उसे ज़िंदा रखना चाहता है," मैंने कहा, "ताकि वो रोज़ ज़हर पीता रहे। रोज़ जानता रहे कि वो किसी के हाथ में है। यही बदला है। भैरव को रणवीर का दर्द चाहिए, मौत नहीं।"
टिंकू ने एक लंबी साँस ली। "तो मीरा को क्यों नहीं बताया जा रहा?"
"क्योंकि रणवीर डरते हैं," मैंने कहा। "डरते हैं कि भैरव मीरा को उसी तरह न ज़िंदा रखे, जैसे रणवीर को रखा है।"
टिंकू कुछ पल चुप रहा। फिर उसने थाली से लड्डू उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"खा," उसने कहा। "तेरे हाथ काँप रहे हैं।"
मैंने लड्डू लिया। खाया। शक्कर कम थी, पर मैंने कुछ नहीं कहा।
"तीन दिन," टिंकू ने कहा। "तीन दिन में क्या करेगा?"
"मेहनत," मैंने कहा।
"अकेले?"
"कालू काका हैं न।"
टिंकू उठा। उसने अपनी टोपी ठीक की। कान के पीछे की पेंसिल निकालकर जेब में रखी।
"मैं भी आऊँगा," उसने कहा।
"टिंकू, तेरी दुकान…"
"दुकान जल चुकी है एक बार।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "इस बार अगर तू जल गया, तो दुकान किसके नाम पर चलेगी? 'वीर के लड्डू' के मालिक को तो ज़िंदा रहना पड़ेगा।"
मैं हँसा। और इस बार हँसी में कुछ और था — वो जो रणवीर सिंह के हाथ से आई थी।
हम निकले। रास्ते में टिंकू बोलता रहा — कि कल से वो कसरत करेगा, सच में, अबकी बार पक्का। मैं चुपचाप सुनता रहा। उसकी बातें सुनकर अच्छा लग रहा था। जैसे किसी पुरानी रस्सी को हाथ में लेकर उसे खींचने से घर का रास्ता याद आ जाता है।
अखाड़े के पास पहुँचे, तो दूर से दिखा — गेट पर ताला नहीं था। खुला था। और अंदर से किसी के मिट्टी गूंधने की आवाज़ आ रही थी।
हम अंदर गए। मैदान के बीचोबीच, उसी गड्ढे के पास, कालू काका घुटनों के बल बैठे थे। उनके हाथ मिट्टी में थे, और वो मिट्टी को धीरे-धीरे सहला रहे थे, जैसे कोई बीमार बच्चे का सिर सहला रहा हो।
"काका," मैंने कहा।
उन्होंने सिर उठाया। उनकी आँखें लाल थीं।
"आ गया," उन्होंने कहा। "मैं तेरा ही इंतज़ार कर रहा था।"
"क्या हुआ?"
"ये देख।" उन्होंने मिट्टी की तरफ़ इशारा किया।
मैंने देखा। गड्ढे की मिट्टी अब पहले जैसी नहीं थी। उसमें कुछ मिला हुआ था — छोटे-छोटे सफ़ेद दाने, जैसे नमक के कण। मैंने गोद में बैठकर सूँघा।
और मेरा दिल धक से रह गया।
वो गंध मैंने पहले भी सूँघी थी। भैरव की बोतलों में। मुंशीजी की साँस में। लुट्टन के पसीने में।
"ज़हर," मैंने फुसफुसाया। "मिट्टी में ज़हर है।"
कालू काका ने सिर हिलाया। "आज सुबह देखा।
कालू काका ने मुट्ठी में मिट्टी ली और उसे मेरी हथेली पर उलट दिया।
“देख,” उन्होंने कहा। “ये मिट्टी अब मिट्टी नहीं रही।”
मैंने दानों को उँगली से छुआ। वो ठंडे थे, पर जलते थे। जैसे बर्फ़ के टुकड़े हों जिनके अंदर आग हो।
“काका, ये पूरे अखाड़े में है?”
“पूरे में।” कालू काका ने अपने घुटनों को सहारा दिया और धीरे से उठे। उनकी हड्डियों से आवाज़ आई। “जब से अखाड़ा बना है, ये गड्ढा यहीं है। यहीं से हम पानी निकालते हैं। यहीं से मिट्टी लेते हैं। और यहीं से…”
वो रुक गए। उनका गला भर आया, पर उन्होंने उसे साफ़ किया और कुछ और कहा।
“तेरे पापा इसी मिट्टी में पले थे,” उन्होंने कहा। “मेरे साथ। रोज़ सुबह। उन्हें इस मिट्टी की गंध इतनी पसंद थी कि वो कहते थे — काका, ये मिट्टी तो हमारी माँ है।”
मेरे हाथ से दाने फिसल गए।
“तो ज़हर कब से है?”
“पता नहीं।” कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। “पर मैं एक बात जानता हूँ। भैरव यहाँ आता था। कई बार। अखाड़े के बाहर, उस कोठरी में बैठकर वो घंटों रहता था। मैंने सोचा — नया सरपंच है, अखाड़े का हाल पूछने आता होगा। मैं मूर्ख था।”
“काका, आप मूर्ख नहीं हैं।”
“मूर्ख वही है जो अपनी पीठ के पीछे गड्ढा खुदता देखे और उसे कुआँ समझे।” उन्होंने अपनी लाठी उठाई। “कल से हम यहाँ नहीं पहलवानी करेंगे।”
टिंकू आगे बढ़ा। “तो कहाँ करेंगे?”
“अभी कहीं नहीं।” कालू काका ने लाठी को मिट्टी में गाड़ दिया। “पहले समझेंगे, ये ज़हर अखाड़े में कैसे पहुँचा। पानी से? मिट्टी से? या किसी आदमी के हाथ से?”
मैंने उसी वक़्त फ़ैसला किया। “मैं कल सुबह यहाँ आऊँगा, सूरज निकलने से पहले। पानी के टैंक की तरफ़ से देखूँगा।”
“अकेले नहीं,” टिंकू ने कहा।
“अकेले,” मैंने कहा। “अगर भैरव के आदमी ने हम दोनों को देख लिया, तो सब पता चल जाएगा।”
टिंकू मुझे घूरता रहा, फिर उसने टोपी उतारी और मेरे हाथ में पकड़ा दी।
“ये तेरे पास रहेगी,” उसने कहा। “जब तक तू वापस आएगा, मैं लड्डू नहीं बनाऊँगा।”
“टिंकू, ये तो…”
“मुझे पता है ये क्या है।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “यही तो कह रहा हूँ।”
मैं घर की तरफ़ चला, तो रास्ते में एक बूढ़ा आदमी मिला। कमर झुकी हुई, हाथ में लाठी, सिर पर पुरानी गमछा। उसने मेरा रास्ता रोका।
“रणवीर सिंह ने कहा,” उसने धीरे से कहा, जैसे कोई पुरानी याद सुना रहा हो, “कल सुबह नहर के पुराने पुल पर आ जाना। अकेले।”
वो इतना कहकर मुड़ा और चला गया। मैंने पीछे से पुकारा — “कौन हो तुम?” — पर वो न रुका। उसकी लाठी की आवाज़ गली में गूँजती रही।
रात मैं सो नहीं पाया। टिंकू की टोपी तकिये के नीचे रखी थी, और बार-बार मेरा हाथ उसे छूता रहा।
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