Spirit of a Fighter234 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 234

7 min read November 5, 2026

"इसमें वो सब है जो मैंने बीस साल में जोड़ा। चिट्ठियाँ, पर्चियाँ, हिसाब की कॉपियाँ। जो कुछ भैरव ने लिखा, जो कुछ बलवंत ने लिखा। ये डिब्बा मेरी जान से भी ज़्यादा कीमती है। और आज से ये तेरे पास रहेगा।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। "मेरे पास?"

"मेरे घर में भैरव आता-जाता है। मेरी अलमारी में उसके आदमी का हाथ है। ये डिब्बा वहाँ नहीं सुरक्षित। तेरे घर में… उसे कोई नहीं ढूँढेगा। कोई सोचेगा भी नहीं कि मैं अपनी जान का सबूत एक मज़दूर के घर में रखूँगा।"

मैंने डिब्बा उठाया। भारी था। टीन की ठंडक मेरी हथेली में उतर गई।

"पर एक बात," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ बदल गई। "जब तक मैं न कहूँ, इसे खोलना नहीं। बस पता होना चाहिए कि ये तेरे पास है। समझा?"

"क्यों?" मैंने पूछा।

"क्योंकि इसमें एक चिट्ठी है जो मीरा को तोड़ देगी," उन्होंने कहा। "और जब तक वो तैयार न हो, उसे पता नहीं चलना चाहिए।"

मैंने डिब्बा गोद में रख लिया। "ठीक है।"

वो मुस्कुराए। इस बार मुस्कान में थकान नहीं थी। कुछ और था — जैसे किसी ने बीस साल बाद भार उतारकर रख दिया हो।

फिर उन्होंने मेरी आँखों में देखा। गहराई तक। और मैंने महसूस किया कि बात अभी खत्म नहीं हुई है। कुछ बाकी है।

"वीर सिंह," उन्होंने धीरे से कहा, "मुझे सब पता है।"

"सब?" मेरे हाथ डिब्बे पर कसे।

"तेरी माँ क्या चुप है — पता है। तेरे पापा रघुवीर ने क्या देखा — पता है। भैरव का असली नाम बलराज है — पता है। रणवीर सिंह उसका चाचा है — ये भी पता है।" वो रुके। "और ये भी पता है… कि तेरी नाक ज़हर पहचान सकती है।"

मेरा चेहरा सफ़ेद पड़ गया। मैंने महसूस किया खून चेहरे से उतर रहा है। हाथों से डिब्बा फिसलने लगा, मैंने कसकर पकड़ा।

"क्या?" मेरी आवाज़ ही नहीं निकली। बस होंठ हिले।

"तेरी नाक," उन्होंने दोहराया। "जो तुझे सबने मज़ाक में कहा — कुत्ता, कुत्ता। मैंने वो सब सुना है। गाँव में हर बात मेरे कान तक आती है। पर मैं जानता हूँ कि वो मज़ाक नहीं है। मैंने तुझे मैदान में खड़ा देखा है — तू हवा में साँस लेता है, और तेरी आँखें बंद हो जाती हैं, जैसे कोई पुरानी किताब के पन्ने पलट रहा हो। मैंने वो देखा है।" उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर कहा, "मैंने तेरे पापा को भी देखा था। रघुवीर। उसके पास भी यही था।"

मेरा दिल धक-धक कर रहा था। "आप… आपने माँ से कहा?"

"नहीं।" उन्होंने सिर हिलाया। "और न किसी से कहूँगा। ये तेरा राज़ है। मैं इसे नहीं छीनूँगा। पर एक बात सुन।" वो सीधे हो गए। "जिस दिन तू भैरव के सामने इसका इस्तेमाल करेगा, उस दिन तू उसे हथियार की तरह इस्तेमाल करना। खिलौने की तरह नहीं। और उस दिन — उस दिन मैं तेरे साथ खड़ा रहूँगा। क्योंकि जो तेरे पापा नहीं कर पाए, वो हम दोनों मिलकर करेंगे।"

मेरी आँखें फिर भर आईं। पर इस बार आँसू नहीं आए। कुछ और आया — एक गरमी, जो छाती से पेट तक फैली। जैसे किसी ने अंदर लालटेन जला दी हो।

"एक बात पूछूँ, सर?" मैंने कहा। फिर याद आया, "सर नहीं। चाचा?"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "चाचा भी मत कह। वो नाम भैरव ने खराब कर दिया। मुझे… रणवीर कह। मेरे साथ अखाड़े में जो लड़ते थे, वो रणवीर कहते थे।"

"रणवीर," मैंने कहा। नाम मुँह से निकलते ही अजीब लगा, जैसे किसी बड़े पहाड़ को नाम से पुकार रहा हूँ। "मीरा को कब पता चलेगा?"

वो कुछ पल चुप रहे। फिर बोले, "जब वो खुद ढूँढ ले। मीरा लड़की है, वो ढूँढ लेगी। वो अपने पापा को जितना जानती है, उतना ही वो मुझे भी जानती है। वो जानती है कि मैं कुछ छुपा रहा हूँ। बस वो सबूत का इंतज़ार कर रही है। जिस दिन सबूत मिलेगा, वो खुद आएगी। मेरी बेटी है।"

मैं मुस्कुराया। पहली बार उस दिन।

"अब चल," उन्होंने कहा। "मुझे भी लौटना है। और तुझे भी।" उन्होंने एक पल रुककर कहा, "तीन दिन बाद मुकाबला है। भैरव ने तीन दिन का वक़्त दिया है। उसमें तुझे मेहनत करनी है। पर शर्त याद है न?"

"कौन-सी?"

"मीरा को अभी कुछ नहीं।"

"याद है।"

"और एक बात।" उनकी आँखें फिर गंभीर हो गईं। "अगर तुझे लगे कि मैं गलत हूँ — कि मीरा को पता होना चाहिए — तो तू बता देना। मैं तुझे नहीं रोकूँगा। मैं बीस साल से चुप हूँ, वीर। मैं नहीं चाहता कि तू भी मेरी तरह चुप हो जाए।"

मैंने सिर हिलाया। "मैं बताऊँगा। जब वक़्त आएगा।"

"अच्छा।" वो व्हीलचेयर घुमाने लगे, फिर रुके। "एक आख़िरी बात। जब तू अखाड़े में उतरे, तो भैरव की आँखों में देखना। मैंने तुझे पहले भी कहा था। पर अब सुन — उसकी आँखों में तू कुछ नहीं पाएगा। न डर, न गुस्सा, न कोई हिचक। बस एक चीज़ पाएगा। भूख। जिस आदमी को भूख लगी हो, वो कुछ भी कर सकता है। और उस भूख का इलाज सिर्फ़ एक है — उसे खाना देना नहीं, उससे खाना छीन लेना।"

"कैसे?"

"जिस चीज़ की उसे भूख है, उसे उसके सामने जलाकर।" उन्होंने कहा। "वो तेरे पापा से बदला ले रहा है। अगर तुझे पता चले कि बदला लेने की भूख कैसे बुझती है — तो बता देना।"

वो चले गए। मैं पुल के नीचे अकेला रह गया, डिब्बा गोद में लिए।

थोड़ी देर बाद मैं भी उठा। डिब्बे को धोती के अंदर छुपाया। पुल से बाहर निकला तो सूरज सिर पर था। गरमी बढ़ गई थी।

रास्ते में सोचता चला आया। भैरव को रणवीर से बदला है — ये बात तो पता थी। पर रणवीर ने जो कहा, वो अलग था। बदले की भूख। बदला लेने की भूख। मतलब — भैरव सिर्फ़ पैसा नहीं चाहता। सिर्फ़ ताकत नहीं चाहता। वो कुछ और चाहता है। क्या?

घर पहुँचा तो माँ आँगन में बैठी थीं, सब्ज़ी काट रही थीं। मैंने डिब्बा चुपचाप चारपाई के नीचे रख दिया। वो कुछ नहीं बोलीं। पर जब मैं पानी पीने गया, तो पीछे से आवाज़ आई, "पुल पर हवा अच्छी थी?"

मैं पलटा। उनकी आँखें सब्ज़ी पर थीं, हाथ चल रहे थे।

"आपको कैसे पता?" मैंने पूछा।

"तेरी चप्पल पर नहर की मिट्टी है," उन्होंने कहा। "और नहर के पुल पर ही वो पुरानी मिट्टी है जो सूखकर सफ़ेद पड़ जाती है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "बैठ। बता, रणवीर सिंह ने क्या कहा?"

मैं उनके पास बैठ गया। सारी बात बताई। डिब्बा, बुधिया, रणवीर का ज़हर पीना, मीरा को न बताने की शर्त। सब।

माँ ने सब सुना। सब्ज़ी काटती रहीं। जब मैं रुका, तो वो रुकीं। चाकू चौकी पर रखा।

"कल से चक्की मैं नहीं चलाऊँगी," उन्होंने कहा।

मैं चौंका। "क्यों?"

"क्योंकि अब तेरे पास डिब्बा है," उन्होंने कहा। "और जिस घर में सबूत हो, उस घर की औरत को चक्की नहीं चलानी चाहिए। उसे चौकन्ना रहना चाहिए।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "सुबह से शाम तक मैं आँगन में बैठूँगी। दरवाज़े पर आँख रखूँगी। कोई आए, मैं देख लूँगी। तू अपना काम कर।"

मेरा गला भर आया। "माँ, आप…"

"मैं कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "अब उठ। टिंकू की दुकान पर जा। उसे बता कि तीन दिन बाद मुकाबला है। और उससे कहना — उसकी मिठाई की ज़रूरत पड़ेगी।"

"मिठाई?"

"हाँ।" माँ ने सब्ज़ी फिर काटनी शुरू की। "जीत के बाद अखाड़े में सबको खिलाना है। और भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा। अगर तू जीतेगा, तो पहले उन्हें खिलाना जो तेरे साथ खड़े थे।"

मैं उठा। जाते-जाते रुका। "माँ, एक बात। रणवीर ने कहा — मीरा को अभी नहीं बताना।"

माँ ने सिर हिलाया। "वो ठीक कह रहे हैं।"

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