Spirit of a Fighter – Chapter 233
सुबह होते ही मैं उठा। माँ ने पूछा नहीं कहाँ जा रहा है। बस चूल्हे से रोटी उठाकर मेरे हाथ में रख दी और कहा, "गरम है, धीरे खाना।"
मैंने रोटी जेब में रखी। गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी थी।
"आज नहीं," मैंने कहा। "आज अकेले जाना है।"
उसके होंठ कुछ बोलने को खुले, फिर बंद हो गए। वो सिर्फ़ इतना बोली, "लाल धागा बाँध लेना।"
मैंने कलाई देखी। धागा अब भी था, रंग हल्का पड़ गया था।
नहर का पुराना पुल गाँव से आधा कोस दूर है। ज़माने पुराना पुल, जिसके नीचे पानी सूख चुका है और अब सिर्फ़ मिट्टी और टूटी ईंटें बची हैं। कहते हैं पहले वहाँ से गाड़ियाँ गुज़रती थीं। अब सिर्फ़ चरवाहे गुज़रते हैं, भेड़ें लेकर।
मैं पहुँचा तो सूरज निकल चुका था, पर धूप में अभी वो गरमी नहीं थी। पुल के एक सिरे पर व्हीलचेयर खड़ी थी। पीछे एक आदमी खड़ा था — लंबा, चौड़ा, सिर पर साफ़ा, हाथ में छाता। मैंने उसे पहले नहीं देखा था।
मैं दूर ही रुक गया। पैर काँप रहे थे। अजीब बात है न — जो आदमी मैदान में भैरव जैसे से नहीं डरा, वो एक बूढ़े आदमी की कुर्सी देखकर काँप रहा था। पर ये डर और था। ये वो डर था जो माँ के पैर छूते वक़्त होता है।
मैंने दूर से ही हाथ जोड़ लिए।
रणवीर सिंह ने मुझे देखा। फिर ऊपर से नीचे तक देखा। मेरी टूटी चप्पल, मेरी धोती जो घुटनों तक गीली थी — नहर पार करते वक़्त कीचड़ में पैर धँस गए थे — मेरे कंधे, मेरे हाथ, मेरा चेहरा। कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले, "तू वही लड़का है जो दीवार के बाहर खड़ा रहता था?"
मैंने सिर झुका लिया। कुछ बोल नहीं पाया।
"आँखें उठा।"
मैंने आँखें उठाईं। उनकी आँखें गीली थीं — नमी थी, आँसू नहीं। जैसे बरसात के बाद की ज़मीन, जो सूखी लगती है पर अंदर से भीगी होती है।
वो मुझे देखते रहे। बहुत देर। इतनी देर कि मुझे लगा मेरी आँखें झुक जाएँगी। पर मैंने नहीं झुकाईं।
फिर उनके होंठ हिले। पहले हल्की-सी मुस्कान आई, फिर वो फैली। और उन्होंने कहा, "अंदर आ जा।"
मैं कुछ समझा नहीं। "सर, ये तो पुल है…"
"पुल के नीचे आ।" उन्होंने व्हीलचेयर घुमाई। "यहाँ धूप लगेगी। मुझे धूप नहीं लगती, पर तुझे लगेगी। और तेरे पास धोती एक ही है।"
मैं उनके पीछे-पीछे चला। पुल के नीचे घुसते वक़्त झुकना पड़ा। अंदर छाँव थी, और मिट्टी की ठंडी गंध। वहाँ एक पुरानी चौकी रखी थी, और उस पर एक टीन का डिब्बा। साफ़ दिख रहा था कि इसे आज ही लाया गया है — मिट्टी पर डिब्बे के कोने की ताज़ा लकीर थी।
वो आदमी जो पीछे खड़ा था, चुपचाप दूर जाकर पुल के दूसरे सिरे पर खड़ा हो गया। उसने छाता बंद कर दिया। समझ गया — हमें अकेला छोड़ रहा है।
रणवीर सिंह ने कुर्सी से हाथ बढ़ाया। मैंने सोचा कुछ माँग रहे हैं, आगे बढ़ा। पर उन्होंने मेरा कंधा पकड़ लिया।
उनका हाथ भारी था। गरम था। उँगलियों में वो गाँठें थीं जो पहलवानों के हाथों में होती हैं — मुट्ठी बनाने से पड़ी हुई लकीरें।
बीस साल पहले ये हाथ किसी को मिट्टी में पछाड़ते थे। आज ये हाथ मेरे कंधे पर थे, और मुझे लगा जैसे मेरे पापा का हाथ है। मेरे असली पापा का या जगदीश पापा का — पता नहीं। बस पापा का।
मेरी आँखें भर आईं। मैंने तेज़ी से नीचे देखा, ताकि वो न देखें।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं चौकी के किनारे बैठ गया। धोती ठीक की। चुप रहा।
"तेरे पापा रघुवीर," उन्होंने शुरू किया, "मेरे साथ अखाड़े में उतरते थे। एक बार हम दोनों ने मिलकर पूरे इलाक़े के पहलवानों को पछाड़ा था। तीन दिन का मुकाबला था। तीसरे दिन हम दोनों के शरीर पर मिट्टी सूख चुकी थी, और हमें भूख भी नहीं लग रही थी।" वो रुके। "वो दिन याद है मुझे। बीस साल से रोज़ याद है।"
"सर…"
"मुझे सर मत कह।" उनकी आवाज़ में वो गरज आई जो अब भी बची थी। "मैं तेरा सर नहीं हूँ। मैं वो आदमी हूँ जिसने तेरे पापा को अखाड़े में खींचा। अगर मैंने उस दिन उसे न बुलाया होता, तो वो ज़िंदा होता। तेरी माँ चक्की न चलाती। तू दीवार के बाहर खड़ा न होता।"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्या कहता? कि माफ़ करता हूँ? झूठ होता। कि गुस्सा हूँ? वो भी झूठ होता। सच ये था कि मैं उलझा हुआ था — इस आदमी से नफ़रत भी नहीं कर पा रहा था, और माफ़ भी नहीं कर पा रहा था।
"मैं बीस साल से इस कुर्सी पर बैठा हूँ," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी हो गई, जैसे कोई भारी चीज़ ज़मीन पर रख रहा हो। "और मुझे पता है कि मुझे ज़हर दिया जा रहा है। हर सुबह। वो 'दवा' जो भैरव खुद लाकर देता है। मुझे पता है उसमें क्या है।"
मेरी साँस रुक गई। मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"आप… आप जानते हैं?" मेरी आवाज़ फटी।
"जानता हूँ।" उन्होंने आँखें बंद कर लीं। "पहले महीने में पता चल गया था। जब मेरे पैरों में वो एहसास आया जो किसी चोट से नहीं आता। जैसे कोई मेरी हड्डियों में रेत भर रहा हो। फिर मैंने एक बार दवा छुपाई। भैरव ने दूसरे दिन मीरा को बुलाया, कहा — 'तेरे पापा की तबीयत खराब है, इसे अस्पताल ले चल।' और मैंने देखा कि वो मीरा के सामने ऐसे बोल रहा था जैसे फ़िक्र कर रहा हो। तभी समझ गया।"
"तो आपने छुपाई क्यों?" मेरे मुँह से निकला, और आवाज़ में इल्ज़ाम था। "आप चुप क्यों रहे? बीस साल?"
"क्योंकि मेरी बेटी अकेली है," उन्होंने आँखें खोलकर कहा।
बस इतना कहा। और मैं चुप हो गया।
कुछ देर सिर्फ़ पानी की आवाज़ आती रही — नहर सूखी थी, पर दूर कहीं पुल के नीचे से पानी की पतली धार बह रही थी। मिट्टी सूख रही थी उस आवाज़ से।
"मैं उसे लेकर भाग सकता था," उन्होंने फिर कहा। "शहर जा सकता था। पर भैरव का हाथ गाँव के हर दरवाज़े तक है। गाँव के बाहर भी। जिस दिन मैं भागता, वो मीरा को उठा लेता, और मुझे बीच रास्ते में खबर मिलती। इसीलिए मैं रुका। मैंने उसे अपने सामने रखा। मैंने ज़हर पीया, ताकि वो मेरी बेटी को न छुए।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "अब बोल, मैं क्या करता?"
मैंने कुछ नहीं कहा। मेरा गला सूख गया था।
"हर सुबह," उन्होंने धीरे से कहा, "जब वो दवा लाता है, मैं उसे देखता हूँ। उसकी आँखों में। वो मुस्कुराता है। कहता है — 'चाचा, दवा ले लो।' चाचा। मेरे ही भाई का बेटा मुझे 'चाचा' कहकर ज़हर पिलाता है।" उनके हाथ ने मेरा कंधा दबाया। "और मैं पी लेता हूँ। क्योंकि अगर नहीं पीया, तो वो कुछ और करेगा। और मुझे नहीं पता वो क्या करेगा।"
मेरी आँखों से पानी बह रहा था। मैंने पोंछा नहीं। पोंछता तो हाथ काँपते, और वो देख लेते।
"रो," उन्होंने कहा। "रो ले। यहाँ कोई नहीं देख रहा। और जो रोता है, उसके हाथ बाद में मज़बूत होते हैं।"
मैं रोया। कितनी देर, पता नहीं। पुल के नीचे, सूखी नहर की मिट्टी पर बैठा, मैंने आँसू बहाए। उन आँसुओं में माँ की चक्की थी, जगदीश पापा की अधूरी कुश्ती थी, रघुवीर पापा की वो रात थी जो मुझे याद नहीं और जो मेरे साथ हर रोज़ ज़िंदा है। उसमें गुड़िया की फटी कॉपी थी और मीरा की टूटी घड़ी थी।
जब रुका, तो रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ पानी की बोतल बढ़ाई। मैंने पिया। पानी में मिट्टी की गंध थी, जैसे बोतल बहुत पुरानी हो।
"अब सुन," उन्होंने कहा। "डिब्बा यहाँ है।"
उन्होंने चौकी पर रखे टीन के डिब्बे की तरफ़ इशारा किया।
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