Spirit of a Fighter – Chapter 228
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर आँसू नहीं गिर रहे थे। वो रोने से रोक रही थी, और यही सबसे ज़्यादा चुभता है।
"तो क्या करें?" मैंने धीरे से पूछा।
मीरा ने एक लंबी साँस ली।
"पापा को सब बताओ," उसने कहा।
मेरा पेट गिर गया।
"नहीं।" मैंने हाथ पीछे खींच लिया। "वो मुझे अखाड़े से निकाल देंगे। मैं अभी-अभी अंदर आया हूँ। मैंने कुछ भी नहीं जीता। मेरे पास कुछ नहीं है। अगर वो निकाल देंगे, तो मैं क्या करूँगा? वापस चक्की चलाऊँगा?"
मीरा मुस्कुराई। वो मुस्कान वैसी नहीं थी जैसे कोई मज़ाक कर रहा हो। वो मुस्कान उस लड़की की थी जिसने बहुत कुछ देखा है।
"तो निकालें," उसने कहा। "पर पहले सुन तो लें।"
मैं रुका। नीम के पत्ते ऊपर हवा में खड़खड़ा रहे थे।
"तुम्हें पता है तेरे पापा ने क्यों कुछ नहीं बोला?" मीरा ने कहा। "बीस साल। क्यों चुप रहे?"
"क्योंकि सबूत नहीं था," मैंने कहा।
"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "क्योंकि उनके पास कोई नहीं था। कोई ऐसा नहीं जो उनकी बात सुनता। वो अकेले थे, वीर। बीस साल अकेले। मैं उनके साथ रहती थी, फिर भी वो अकेले थे — क्योंकि उन्हें लगता था कि मुझे बताएँगे तो मैं ख़तरे में पड़ जाऊँगी।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं तुम्हें अपने पापा से मिलाना चाहती हूँ।"
मेरे हाथ से मटका फिसल गया।
वो मटका वहीं रखा था — कालू काका का, पानी से भरा, जो हम पास में रखकर आए थे। वो गिरा और टूट गया। पानी ज़मीन पर फैल गया, मिट्टी सोखने लगी, और एक पल के लिए वहाँ वो गंध उठी — गीली मिट्टी की, अखाड़े की, पापा की।
मैं जमीन पर बैठ गया। घुटने मोड़कर, हाथ ज़मीन पर टिकाकर। मेरी साँस तेज़ थी, और मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे सीने पर पत्थर रख दिया हो।
"वीर?"
"मैं… मैं उनके सामने क्या कहूँगा?" मेरी आवाज़ निकली, पर वो किसी और की लगी। "वो बड़े पहलवान रहे हैं। मैं… मैं तो बस एक मज़दूर हूँ जो मिट्टी सूंघता है। वो मेरी बात क्यों सुनेंगे?"
मीरा मेरे पास बैठ गई। दूर, पर पास। उसका कंधा मेरे कंधे से लगभग छू रहा था।
"क्योंकि तुमने वो किया जो कोई नहीं कर सका," उसने कहा। "तुमने उनके अखाड़े की मिट्टी पहचानी। तुमने उस मिट्टी में छिपी चीज़ ढूँढी। तुमने उनकी टूटी घड़ी उठाई और उसका राज़ खोला।" उसने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "मेरे पापा बीस साल से उस घड़ी को देखते आए हैं। वो जानते हैं कि उसमें क्या है। पर उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया। तुम पहले हो जिसने उसे खोला।"
"तुमने खोला था," मैंने कहा।
"तुमने मुझे हिम्मत दी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "अकेले मैं नहीं कर पाती।"
हम चुप बैठे रहे। पानी मिट्टी में समा गया था। टिंकू दूर खड़ा था, हमारी तरफ़ नहीं देख रहा था — जान-बूझकर, जैसे उसे पता हो कि कुछ पल ऐसे होते हैं जिनमें तीसरा आदमी नहीं होना चाहिए।
"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, "तेरे पापा… वो मुझे क्या समझेंगे? एक मज़दूर जो उनकी बेटी के साथ नीम के नीचे बैठा है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं देखा था — शर्म नहीं, झिझक नहीं। बस सीधी बात।
"मेरे पापा ने मुझे एक बात सिखाई थी," उसने कहा। "जब मैं छोटी थी, तब एक बार मैंने किसी को उसके कपड़ों के लिए ताना मारा था। पापा ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा — 'बेटी, आदमी कपड़ों से नहीं, उसके हाथों से पहचाना जाता है। देख, उसके हाथ में क्या है — छाले या अंगूठी?'"
वो मुस्कुराई।
"मैंने तेरे हाथ देखे हैं, वीर। जब तू मिट्टी गूंधता है, तो तेरी उँगलियाँ काँपती नहीं। मेरे पापा भी ऐसे ही गूंधते थे।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने तेज़ी से पलकें झपकीं, और मुँह फेर लिया, क्योंकि मैं रोना नहीं चाहता था — न उसके सामने, न किसी के सामने।
"तो… कब?" मैंने पूछा, आवाज़ सँभालकर।
"आज शाम।" मीरा उठी और अपने कपड़ों पर लगी मिट्टी झाड़ी। "मैं पापा से कह दूँगी कि तुम आना चाहते हो। तुम बस आ जाना। और वीर —"
"हाँ?"
"जो भी कहना, सीधा कहना। मेरे पापा को घुमा-फिराकर बोलना पसंद नहीं। अगर तुम नरम पड़ोगे, तो वो तुम्हें कमज़ोर समझेंगे। और अगर तुम बहुत अकड़ दिखाओगे, तो वो तुम्हें घमंडी।"
"फिर क्या करूँ?"
"जैसे अखाड़े में उतरते हो — वैसे ही बात करना।"
मैंने सिर हिलाया। और तभी पीछे से एक आवाज़ आई — नुकीली, चमकीली, जैसे किसी ने चूड़ियाँ बजाकर बात शुरू की हो।
"अरे मैंने तो सुना है — अखाड़े की बेटी और मज़दूर का क्या रिश्ता!"
मैं पलटा।
सुक्खी बुआ खड़ी थीं, पान का बीड़ा हाथ में, आँखें उतनी ही चमकीली जितनी सुबह थीं। पर उनके पीछे कोई और भी था।
लुट्टन।
वो दीवार से टेक लगाए खड़ा था, हाथ जेब में, मुँह पर वो आधी मुस्कान जो पीछे से आकर इंसान की रीढ़ के नीचे चुभती है।
"बुआ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो ठंडक आ गई जो ख़तरे के वक़्त खुद आ जाती है। "आप यहाँ कैसे?"
"मैं तो बस…" सुक्खी बुआ ने हाथ हिलाया, पर उनकी आँखें लुट्टन की तरफ़ झुक रही थीं, और मैं समझ गया कि वो अकेली नहीं आई थीं। "बाज़ार जा रही थी, तो सोचा देख लूँ…"
लुट्टन आगे आया। उसके जूते मिट्टी पर चटक रहे थे।
"मज़दूर और मालकिन की बेटी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो भैरव की आवाज़ से आती है। "अच्छी कहानी है। गाँव में मज़ा आ जाएगा।"
मीरा खड़ी हो गई। उसने अपना बैग कंधे पर टिकाया और सीधे लुट्टन के सामने आई।
"लुट्टन," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो सिर्फ़ उसके पास है, "तू जो कहना है, सीधा कह। पीछे से आकर बुआ को ढाल बनाना बंद कर।"
लुट्टन की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ी।
"मैं तो कुछ नहीं कह रहा, मैडम," उसने कहा। "मैं तो बस सुन रहा था। मालिक ने कहा था — देखना, वो दोनों कहाँ जाते हैं।"
"तो जाकर बता दे," मैंने कहा।
लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें सिकुड़ीं।
"बता दूँगा," उसने कहा। "पर एक बात, वीर सिंह — तू जो भी कर रहा है, उससे मालिक को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वो तो कहता है — 'छोटा आदमी बड़ी बात करे, तो मज़ा आता है।'"
मैंने उसकी तरफ़ एक कदम बढ़ाया, और वो एक कदम पीछे हटा — ये उसने खुद नहीं सोचा था, ये उसके शरीर ने किया।
"तो मालिक से कह देना," मैंने कहा, "कि छोटा आदमी आज शाम रणवीर सिंह से मिलने जा रहा है। और ये भी कह देना — अगर उसे रोकना है, तो खुद आए। आदमी भेजकर काम नहीं चलेगा।"
लुट्टन का चेहरा बदला। और उस चेहरे पर मैंने वो डर देखा जो उसने सुबह कुएँ के पास दिखाया था — वो डर जो अब उसके अंदर बैठ गया है, ज़हर की तरह।
वो कुछ नहीं बोला। बस मुड़ा और चला गया। सुक्खी बुआ उसके पीछे-पीछे भागीं, और उनकी आवाज़ आई, "अरे लुट्टन, रुक! मैंने तो सिर्फ़ सुना था! मैंने कुछ कहा ही नहीं!"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अब तो खेल खुल गया," उसने कहा।
"खुलना ही था," मैंने कहा। "अब देर नहीं करनी। शाम को मैं तेरे पापा से मिलूँगा।"
टिंकू दौड़ता हुआ आया, मिठाई की डिब्बी अब भी हाथ में।
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