Spirit of a Fighter – Chapter 227
उनकी आवाज़ टूट गई। उन्होंने मुट्ठी भींच ली, जैसे मिट्टी को अपने अंदर छिपा लेना चाहती हों।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भी टूट रही थी, "पापा ने वहाँ अपना नाम लिखा है। वो जानते थे कि मैं आऊँगा। वो मेरा इंतज़ार कर रहे थे।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों से पहला आँसू गिरा — धीरे से, जैसे बरसों की रुकी हुई बारिश।
"तो अब तेरा इंतज़ार खत्म," उन्होंने कहा, और उन्होंने मेरा सिर अपनी गोद में रख लिया। "अब तेरी बारी है।"
हम वहीं बैठे रहे। चूल्हा ठंडा था, आसमान में तारे थे, और मेरी जेब में वो काग़ज़ था जिस पर एक मरे हुए आदमी ने लिखा था — "वो समझ जाएगा।"
और मैं समझ गया था।
सुबह की पहली किरण आँगन में आई, तो मैंने पापा की धोती उठाई, और उसे पहनकर बाहर निकला। गुड़िया दौड़कर आई और मेरी कलाई पर फिर से लाल धागा बाँधने लगी — पिछला टूट गया था, नीचे से।
"आज का धागा खास है, भैया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो कभी नहीं हारती। "ये मैंने मंदिर से लाया है। बाबा ने खुद बाँधा है।"
"किस बात का?" मैंने पूछा।
"जीत का," उसने कहा, जैसे ये सबसे आसान सवाल हो।
माँ ने मेरे माथे पर हल्दी का तिलक लगाया, और मेरी तरफ़ देखकर बोलीं, "जा। और सुन — जब तू उतरे, तो सिर्फ़ भैरव को मत देखना। उस मिट्टी को देखना। वो तेरी है।"
मैंने सिर हिलाया और बाहर कदम रखा।
रास्ते में सुक्खी बुआ मिलीं, पान का बीड़ा हाथ में लिए, आँखें चमकीली।
"अरे वीर!" वो चिल्लाईं। "मैंने तो सुना है कि भैरव ने रात को अखाड़े में कुछ जलाया है! धुआँ सुबह तक उठ रहा था!"
मैं रुका।
"क्या जलाया?"
"पता नहीं, बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक धीमी हो गई, जैसे वो खुद अपनी बात से डर गई हों। "पर मैंने सुना है… कि भैरव ने अपनी अलमारी खाली कर दी है। सब काग़ज़ निकाल लिए हैं।"
मेरा खून ठंडा हो गया।
अगर भैरव ने अलमारी खाली कर दी, तो फिर सबूत कहाँ है?
मैं दौड़ा। धोती हवा में फड़फड़ा रही थी, और मेरे पीछे सुक्खी बुआ की आवाज़ आ रही थी, "वीर! रुक! मैंने तो सिर्फ़ सुना है! वीर!"
अखाड़े का गेट खुला था, और भीतर से धुएँ की काली लकीर आसमान की तरफ़ उठ रही थी।
॥
अखाड़े का गेट खुला था, और भीतर से धुएँ की काली लकीर आसमान की तरफ़ उठ रही थी। मैं दौड़ता हुआ अंदर घुसा, और मेरे पैरों के नीचे वो मिट्टी थी जो अब भी गरम थी — जैसे किसी ने राख को पानी से बुझाया हो और अंदर की आग बाकी हो।
मैदान के बीच में एक ढेर जल रहा था। काग़ज़, टूटी कुर्सियाँ, पुरानी तस्वीरों के फ्रेम — सब एक जगह रखकर आग लगाई गई थी। धुआँ सीधा ऊपर जा रहा था, जैसे कोई आसमान को भी सबूत नहीं देना चाहता।
कालू काका आग के पास खड़े थे, हाथ में बाल्टी लिए, पर पानी नहीं डाल रहे थे। उनका चेहरा राख जैसा था।
"देर हो गई, बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो टूटन थी जो बूढ़े आदमी के बोलने से पहले उसकी आँखों में आ जाती है। "सुबह से जल रहा है। मैंने पानी डालने की कोशिश की, पर भैरव के दो आदमी गेट पर खड़े थे। कह रहे थे — मालिक का हुक्म है।"
"अलमारी?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ फटी थी।
"खाली।"
मैं आग के पास गया। गरमी चेहरे पर लगी। अंदर कुछ काग़ज़ों के कोने अभी बचे थे, जल रहे थे, मुड़ रहे थे, काले हो रहे थे। मैंने एक लकड़ी से उन्हें खींचने की कोशिश की, पर वो हाथ लगते ही राख हो गए।
"वो सब जला दिया," कालू काका ने कहा। "बीस साल का हिसाब। आज सुबह पता चला कि हरनाम ने सब बोल दिया, तो भैरव ने देर नहीं की।"
मैं वहीं बैठ गया। घुटनों पर हाथ रखकर। आग मेरे सामने जल रही थी, और मुझे लगा जैसे मेरे सीने में भी कुछ जल रहा है।
टिंकू दौड़ता हुआ आया, हाँफते हुए। उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी थी — जो अब भी लेकर आया था, वो भूल नहीं पाया।
"भाई," उसने कहा, और फिर आग देखकर चुप हो गया।
मीरा पीछे आई। उसने आग देखी, फिर मेरी तरफ़ देखा, और उसका चेहरा सख़्त हो गया।
"सब?" उसने पूछा।
"सब," कालू काका ने कहा।
मीरा ने अपना बैग खोला। उसमें से कुछ निकाला — मुड़ा हुआ, पीला, जेब में दबा हुआ काग़ज़।
"पर एक बात है," उसने कहा। "जो चीज़ भैरव ने खुद अपने हाथ से लिखी है, वो हमारे पास है। वो चिट्ठी — जो लुट्टन लेकर आया था। जिसमें उसने तेरी माँ की दवा का ज़िक्र किया है।"
मैं उठा। "कहाँ?"
"मेरे पास।" उसने काग़ज़ जेब में रख लिया। "पर यहाँ नहीं। यहाँ दीवारों के भी कान हैं।"
हम अखाड़े से बाहर निकले। पीछे के रास्ते से, नीम के पेड़ के नीचे, जहाँ कभी कालू काका बैठते थे। टिंकू पहरा देने लगा — "तुम बात करो, मैं देखता हूँ कोई आ न जाए।" और वो वहीं खड़ा हो गया, हाथ में मिठाई की डिब्बी लिए, जैसे कोई पहरेदार तलवार की जगह लड्डू लेकर खड़ा हो।
मीरा ने काग़ज़ खोला।
"मैं पढ़कर सुनाती हूँ," उसने कहा। और उसकी आवाज़ वो आवाज़ नहीं थी जो कोर्ट में बहस करती है। धीमी थी, जैसे कोई आख़िरी इच्छा पढ़ रहा हो।
"बेटी को दवा रोज़ देनी है। सुबह उठते ही, खाली पेट। एक चम्मच। जितनी बार मना करे, उतनी बार समझाना — पापा की जान है।"
मीरा रुकी।
"ये पहला हिस्सा है," उसने कहा। "और ये भैरव की लिखाई में है।"
"आगे पढ़," मैंने कहा।
उसने काग़ज़ पलटा।
"और आख़िरी खुराक के बाद कुछ नहीं देना। न खाना, न पानी। बस कमरे में अकेला छोड़ देना, और दरवाज़ा बंद कर देना। सुबह तक सब खत्म।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"ये… ये दवा नहीं है," मैंने कहा।
"नहीं है," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में अब वो सख़्ती लौट आई थी जो सच के सामने आने पर आती है। "ये वही ज़हर है। बस इसकी आखिरी खुराक है। जो इसे पीता है, उसके शरीर में जो बचा है वो भी खत्म।"
"ये दवा कौन देता है?" मैंने पूछा।
मीरा ने मेरी आँखों में देखा।
"भैरव खुद," उसने कहा। "रोज़ सुबह। अपने हाथ से।"
मैं उठकर खड़ा हो गया।
मुझे याद आया — वो सुबह, जब मैं मीरा के दरवाज़े पर खड़ा था, दीवार के छेद से उसकी सिसकियाँ सुन रहा था। और भैरव अंदर था, हाथ में शीशी लिए। "बेटी, दवा ले आया हूँ।" कैसे कहा था उसने। जैसे कोई बाप कहे।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत।
"रुक," उसने कहा। "सबूत चाहिए। ये काग़ज़ काफ़ी नहीं। भैरव कहेगा — ये मैंने लिखा ही नहीं। या कहेगा — ये दवा थी, बीमारी थी। तेरे पास क्या है?"
"मेरे पास नाक है," मैंने कहा।
मीरा ने मेरा हाथ नहीं छोड़ा।
"वो कोर्ट में नहीं चलती," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो थकान थी जो बहुत पढ़े हुए लोगों की आवाज़ में होती है। "तेरी नाक गवाही नहीं दे सकती। जज के सामने तू क्या कहेगा — 'सर, मुझे गंध आई थी'? वो हँसेंगे।"
"तो क्या करूँ?" मेरी आवाज़ ऊँची हो गई, और मैं उसे ऊँची नहीं करना चाहता था। "मेरे दो पापा मरे। एक को उसने ज़हर दिया, दूसरे को कुएँ में गिराया। अब रणवीर सिंह की बारी है। मैं बैठकर देखूँ? तेरे पापा को वो रोज़ मार रहा है, और मैं काग़ज़ जोड़ता रहूँ?"
"गुस्से से पापा वापस नहीं आते," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ टूटी, पर वो रुकी नहीं। "मेरे पापा ज़िंदा हैं, वीर। और मैं उन्हें खो नहीं सकती। तुझे समझना होगा — जो भी करना है, ऐसा करना है कि वो सच साबित हो। और सच साबित करने के लिए सिर्फ़ नाक काफ़ी नहीं। गवाह चाहिए।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno