Spirit of a Fighter – Chapter 229
"भाई," उसने कहा, "मैंने देखा, लुट्टन भागते-भागते भैरव के घर गया। और अंदर से आवाज़ आई — कुछ गिरने की।"
"क्या गिरा?"
"पता नहीं। पर भैरव चिल्लाया था — 'आज ही?' तो मुझे लगा बता दूँ।"
मैंने आसमान देखा। दोपहर ढल रही थी।
"टिंकू," मैंने कहा, "तेरे पास कुछ पहनने को है? अच्छा-सा?"
टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की।
"भाई, मैं तो दूल्हे के कपड़े भी जुगाड़ कर सकता हूँ," उसने कहा। "बस कहना।"
"मुझे तेरे कपड़े चाहिए," मैंने कहा। "अपने नहीं।"
टिंकू रुका। फिर वो समझा, और उसकी आँखें बड़ी हो गईं।
"तू रणवीर सिंह से मिलने जा रहा है," उसने धीरे से कहा, जैसे खुद को यकीन दिला रहा हो। "बड़े पहलवान से।"
"हाँ।"
"मैं साथ चलूँगा।"
"नहीं," मीरा ने कहा। "इस बार अकेले जाना होगा। पापा ऐसे मौकों पर अकेले में बात करते हैं।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।
"ठीक है," उसने कहा, और फिर उसकी आवाज़ भर आई। "पर सुन — जब तू अंदर हो, तो मैं बाहर गेट पर खड़ा रहूँगा। अगर तू बाहर नहीं आया… तो मैं अंदर आ जाऊँगा। चाहे जो हो।"
"तू पहलवान नहीं है, टिंकू," मैंने कहा।
"नहीं हूँ," उसने कहा, और उसकी टोपी थोड़ी तिरछी हो गई थी। "पर मैं तेरा दोस्त हूँ। ये कम है?"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। और कुछ नहीं कहा, क्योंकि शब्द कम पड़ जाते हैं।
घर पहुँचा तो दोपहर हो चुकी थी। आँगन में चूल्हा जल रहा था और माँ रोटी बना रही थीं। गुड़िया पास बैठी थी, कॉपी खुली थी, पर वो पढ़ नहीं रही थी — मेरी तरफ़ देख रही थी।
"भैया," वो उठकर भागी। "क्या हुआ? तेरा चेहरा…"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "अखाड़े में आग लगी थी।"
माँ के हाथ रुके। रोटी का बेलन हवा में रुक गया।
"क्या जला?" उन्होंने पूछा, बिना पलटे।
"भैरव की अलमारी।"
माँ ने बेलन रख दिया, और मेरी तरफ़ पलटीं। उनकी आँखों में न गुस्सा था, न डर। सिर्फ़ वो शांति थी जो बहुत कुछ सह चुकी होती है।
"तो अब जो काग़ज़ बचा है, वो हमारे पास है," उन्होंने कहा। यह सवाल नहीं था।
"हाँ," मैंने कहा। "एक चिट्ठी। रणवीर सिंह की दवा के बारे में।"
माँ ने आँच कम की, और चूल्हे के पास बैठ गईं।
"आज शाम मैं रणवीर सिंह से मिलने जा रहा हूँ," मैंने कहा।
गुड़िया की कॉपी हाथ से गिर गई।
"भैया, तू… तू उनसे डरता नहीं?"
"डरता हूँ," मैंने कहा, और यह सच था। "बहुत।"
माँ मुस्कुराईं। वो मुस्कान धीमी थी, पर उसमें कुछ था।
"अच्छा कर रहा है," उन्होंने कहा। "तेरे पापा भी ऐसे ही गए थे — डरकर, पर गए।"
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"उनसे क्या कहेगा?"
"सच," मैंने कहा। "सब सच।"
"तो सुन।" माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी हथेली खुरदरी थी, चक्की की मूठ से बनी। "जब तू वहाँ जाए, तो पहले उनकी आँखों में देखना। अगर वो तेरी बात सुनते वक़्त तेरी तरफ़ पूरा मुँह करके बैठें — तो समझना सुन रहे हैं। और अगर वो खिड़की की तरफ़ देखें या घड़ी की तरफ़ — तो चुप हो जाना। उस दिन कोई बात नहीं होगी।"
"और किस दिन होगी?"
"जिस दिन वो खुद तुझे बुलाएँ।"
मैंने सिर हिलाया। और फिर मैंने वो बात कही जो मुँह पर आई थी, बिना सोचे।
"माँ," मैंने कहा, "मीरा ने कहा कि वो मुझे अपने पापा से मिलाना चाहती है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर वो हँसीं — धीरे से, जैसे बरसों बाद हँसी हों।
"तो तू उससे शादी करने वाला है?"
"माँ!" मेरा चेहरा गरम हो गया। "मैंने ऐसा नहीं कहा।"
"कहा तो तेरी आँखों ने," उन्होंने कहा, और उठकर रोटी बेलने लगीं। "मेरी आँखें भी बीस साल से यही देख रही हैं, बेटा। जब कोई लड़का किसी लड़की का नाम ऐसे लेता है — जैसे वो हवा में लिख रहा हो — तो समझ लेना, दिल में घर कर गई है।"
गुड़िया खिलखिलाई।
"भैया की शादी होगी!" वो चिल्लाई। "मैं सबको मिठाई बाँटूँगी!"
"चुप कर," मैंने कहा, पर मेरी आवाज़ में गुस्सा नहीं था।
शाम को मैंने टिंकू के दिए कपड़े पहने। साफ़ धोती, सफ़ेद कुर्ता — उसने कहा था कि ये उसके पापा के थे, जो एक बार पंचायत में जज बने थे। मुँह पर मैंने पानी डाला। बाल सँभाले। और फिर मैंने पापा की धोती की तह में वो पीला काग़ज़ रखा — रघुवीर का, जिस पर लिखा था "वो समझ जाएगा।"
गुड़िया ने मेरी कलाई पर हाथ रखा।
"भैया, मैं भी चलूँगी।"
"नहीं।"
"मैं बाहर खड़ी रहूँगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो पहाड़ को भी हिला देती है। "तुम अंदर जाओ। मैं गेट पर। अगर तुम्हें ज़रूरत हो, तो चिल्लाना — मैं आ जाऊँगी।"
"तू बारह साल की है, गुड़िया।"
"तो क्या?" उसने कहा। "मैं तुम्हारी बहन हूँ। ये काफ़ी है।"
मैंने उसका सिर सहलाया। और मैंने कुछ कहा नहीं, क्योंकि मेरी आवाज़ भर आई थी।
रणवीर सिंह का घर अखाड़े से सटा हुआ था — पीछे की तरफ़, जहाँ नीम के पेड़ झुके हुए थे। सामने बड़ा दरवाज़ा, लोहे का, जिस पर पुराने पहलवानों की तस्वीरें उत्कीर्ण थीं। मैंने दरवाज़ा खटखटाया। एक नौकरानी ने खोला — बुढ़ी, झुकी हुई, आँखों में सवाल।
"मैं… वीर सिंह," मैंने कहा। "मीरा मैडम ने कहा था…"
"अंदर आओ," उसने कहा, और रास्ता दिया।
घर के अंदर एक लंबा बरामदा था, जिसके किनारे पुराने पहलवानों की तस्वीरें लगी थीं — मिट्टी में लिपटे, मूँछों वाले, गुर्दे फुलाए हुए। और आख़िर में एक चौड़ी कुर्सी पर बैठे थे रणवीर सिंह।
उनका शरीर इतना बड़ा था कि कुर्सी छोटी लग रही थी। सफ़ेद बाल, बड़ी मूँछें, कंधे अब भी चौड़े — पर पैर नीचे लटके हुए थे, जैसे किसी और के हों। उनकी आँखें मेरी तरफ़ उठीं, और मुझे लगा जैसे कोई पुराना पहलवान मुझे ऊपर से नीचे तक नाप रहा है।
"तू वो है," उन्होंने कहा। आवाज़ भारी थी, पर फूली हुई — जैसे साँस कम हो। "जो मिट्टी सूंघता है।"
मैं रुका। मेरी जीभ तालू से चिपक गई।
"जी… जी सर।"
"बैठ।"
मैं बैठ गया। सामने के तख़्त पर, कुर्सी के बिलकुल सामने — इतना पास कि मुझे उनके हाथों पर पुराने निशान दिख रहे थे, कुश्ती के, रस्सी के, मिट्टी के।
"मीरा ने कहा कि तुझे कुछ बताना है," उन्होंने कहा। "बता।"
मैंने एक लंबी साँस ली। और फिर मैंने वो किया जो माँ ने कहा था — सीधे उनकी आँखों में देखा।
"सर," मैंने कहा, "भैरव सिंह आपको रोज़ सुबह दवा देता है। एक चम्मच। खाली पेट।"
रणवीर सिंह का चेहरा नहीं बदला। पर उनकी उँगलियाँ — जो कुर्सी की बाँह पर टिकी थीं — थोड़ी सिकुड़ गईं।
"तो?"
"वो दवा नहीं है, सर," मैंने कहा। "वो ज़हर है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। बरामदे में हवा रुक गई। दूर कहीं कोई घंटी बजी, और फिर चुप।
रणवीर सिंह ने धीरे से साँस ली। और फिर उन्होंने वो किया जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी — वो हँसे।
न हँसी, न खुशी। एक खोखली आवाज़, जैसे किसी पुराने सूखे कुएँ में पत्थर गिरा हो।
"बीस साल," उन्होंने कहा। "बीस साल से मैं इस बात का इंतज़ार कर रहा था कि कोई आकर ये कहे।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में पानी था — पर वो गिर नहीं रहा था। "और आज एक मज़दूर का लड़का आकर कह रहा है।"
"सर —"
"तू जानता है मैंने क्यों नहीं कहा?" उन्होंने मेरी बात काटी। "क्योंकि मेरे पास सबूत नहीं था। और मेरी बेटी थी। मैं अकेला मर जाता, पर वो…" उनकी आवाज़ रुकी। "वो अकेली रह जाती।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno