Spirit of a Fighter – Chapter 225
लुट्टन ने सिर नीचा किया। फिर उसने बहुत धीरे कहा, "मैं लेकर नहीं आया। मैंने रास्ते में सोचा — अगर ये दवा है, तो मैं खुद पहले पीकर देखूँगा।"
उसने अपनी कलाई दिखाई। उस पर एक छोटा-सा लाल निशान था, जला हुआ।
"एक बूँद ज़ुबान पर रखी," उसने कहा। "और मेरी ज़ुबान आज तक ऐसी कड़वी नहीं हुई थी। फिर मुझे तेरी बात याद आई — पसीने की कड़वाहट। और मैं ये लेकर सीधा यहाँ आ गया।"
हवा रुक गई थी। नीम की पत्तियाँ भी नहीं हिल रही थीं।
कालू काका ने लुट्टन के कंधे पर हाथ रखा। "बेटा," वो बोले, "आज तूने अपनी जान बचाई। और शायद मेरी भी।"
लुट्टन की आँखें भर आईं। वो कुछ बोलना चाहता था, पर मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, "बैठ। तेरी नाड़ी तेज़ चल रही है। तूने ज़हर चखा है, ज़्यादा नहीं, पर चखा है।"
वो कुएँ के पास पत्थर पर बैठ गया, और मीरा उसकी कलाई पकड़कर आँखें बंद करके बैठ गई — जैसे उसकी उँगलियों में कोई तीसरी आँख हो।
मैंने हरनाम का काग़ज़ खोला। कालू काका ने लालटेन पास की।
काग़ज़ पर काँपती लिखाई थी — जैसे किसी ने अंधेरे में, डरते-डरते, जल्दी में लिखा हो। ऊपर बस तीन शब्द थे — "तीसरी पर पत्थर।"
और नीचे एक छोटा-सा नक्शा। कुएँ की सीढ़ियाँ, गिनती में नौ। तीसरी सीढ़ी पर एक तीर, और तीर के नीचे लिखा था — "यहाँ से नीचे नहीं, बगल में।"
मैंने हरनाम की तरफ़ देखा। "ये तेरे बेटे ने लिखा?"
वो हाँ में सिर हिला रहा था, पर उसकी आँखें काग़ज़ पर नहीं, मेरे चेहरे पर थीं।
"मेरा बेटा मुन्ना," उसने कहा। "भैरव के कमरे में चाय पहुँचाता था। रात में जब भैरव बाहर होता, तो ये वो सब लिख लेता जो उसे गलत लगता। फिर एक रात भैरव ने उसे देख लिया।"
वो रुका। उसकी आवाज़ टूट गई।
"अगली सुबह मुन्ना कुएँ के पास मिला। कहा गया — गिर पड़ा। और मुझे उस दिन से ये काग़ज़ छिपाकर रखना पड़ा, जैसे कोई चोर अपनी जान छिपाता है।"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो पानी था जो अब तक नहीं आया था।
"हरनाम जी," मीरा ने कहा, "आपने ये इतने साल क्यों नहीं दिखाया?"
हरनाम ने अपनी हथेलियाँ खोलीं, जैसे कुछ नहीं बचा हो।
"किसे दिखाता, बेटी? भैरव के पास पुलिस थी, पंचायत थी, पैसा था। और मेरे पास बस एक बूढ़ी पत्नी थी, जो मुन्ना के गम में दो साल पहले चल बसी। मैं अकेला बचा था। और अकेले आदमी की गवाही कौन सुनता है?"
उसकी आवाज़ में वो ज़हर था जो सालों से जमा था — पर वो ज़हर भैरव के लिए था, मेरे लिए नहीं।
मैंने काग़ज़ मोड़ा और अपनी जेब में रखा।
"काका," मैंने कहा, "ये नक्शा कहता है कि तीसरी सीढ़ी से बगल में रास्ता है। पर भैरव ने सीढ़ियाँ तुड़वा दी हैं।"
कालू काका ने लालटेन उठाई और कुएँ के ढक्कन पर रख दी। फिर उन्होंने अपनी कमर से एक पुरानी रस्सी निकाली — मोटी, जगह-जगह गाँठें लगी हुई।
"सीढ़ियाँ तुड़ी हैं," वो बोले, "पर ज़मीन नहीं तुड़ी। मैं बीस साल से इस रस्सी को छिपाकर रखे हुए हूँ। जिस दिन ये काम आएगी, उस दिन मैं इसे बाहर लाऊँगा — यही सोचकर।"
उन्होंने रस्सी की एक गाँठ मेरे हाथ में पकड़ाई। उनकी उँगलियाँ सूखी लकड़ी जैसी थीं, पर पकड़ मज़बूत थी।
"पर एक बात सुन ले," वो बोले, और उनकी आवाज़ वो धीमी, किताबी आवाज़ हो गई जो पहली बार सुनाई थी। "नीचे जो मिलेगा, वो तेरे हाथ में नहीं लगेगा। तू बस देखेगा। समझा?"
"क्या मिलेगा, काका?"
उन्होंने जवाब नहीं दिया। बस रस्सी मेरे हाथ में दबाई और मुड़कर हरनाम से बोले, "तू ऊपर रुक। कोई आए तो दो बार खाँस देना।"
हरनाम ने सिर हिलाया और लालटेन लेकर कुएँ के पास खड़ा हो गया। मीरा उठी — पर कालू काका ने हाथ उठाकर रोका।
"तू भी रुक, बेटी।"
"मैं नहीं रुकूँगी।"
"तू रुकेगी," काका की आवाज़ में पहली बार कड़क आई। "नीचे जो है, उसे देखने वाला एक ही होता है। तू ऊपर रहकर रस्सी पकड़। अगर रस्सी ढीली पड़े, तो खींच लेना — समझी?"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो ज़ुबान से नहीं पूछ रही थी — तू अकेला ठीक है?
मैंने धीरे से सिर हिलाया।
वो रस्सी पकड़कर खड़ी हो गई। उसकी उँगलियाँ रस्सी पर सफ़ेद पड़ रही थीं, पर पकड़ कसी हुई थी।
मैं कुएँ में उतरा।
पहले तो सिर्फ़ अंधेरा था, और रस्सी की जगह-जगह गाँठें मेरी हथेली में गिनती की तरह आ रही थीं — एक, दो, तीन। तीसरी गाँठ पर कालू काका ने ऊपर से आवाज़ दी, "वहीं रुक।"
मैं रुका। मेरे पैर के नीचे कुछ था — पत्थर की सीढ़ी, टूटी हुई, बस आधी बची। और मेरे बाएँ, दीवार में एक दरार, जिसमें से ठंडी हवा आ रही थी। ठंडी और गीली — जैसे किसी पुराने तहखाने की साँस।
मैंने उँगलियाँ दरार में डालीं। पत्थर ढीला था। एक धक्के से वो हट गया, और मेरे सामने एक छोटा-सा मुँह खुल गया — आदमी के बैठने भर का। अंदर से मिट्टी की वो गंध आई जो मैंने पहले कभी नहीं सूँघी थी। ठंडी, नम, और उसमें एक मीठापन — बारिश के बाद ज़मीन से जो गंध उठती है, वैसा ही। पर इससे गहरा।
मैं अंदर घुसा। रस्सी मेरी कमर से बँधी हुई थी, और मैं रेंगकर आगे बढ़ा। दस हाथ चलने के बाद जगह खुली — और मैं उठकर खड़ा हो गया।
ये छोटी-सी कोठरी थी। दीवारें मिट्टी की, छत पत्थर की, और बीच में एक चबूतरा जिस पर कुछ रखा था।
कालू काका ऊपर से बोले, "देखा? रोशनी कर।"
मेरी जेब में माचिस थी। मैंने एक तीली जलाई, और कोठरी में पीली रोशनी फैल गई।
चबूतरे पर मिट्टी का एक छोटा-सा मटका था, ढका हुआ। और मटके के पास एक पत्थर की पटिया, जिस पर खुरचकर कुछ लिखा था। मैंने उँगली से धूल हटाई।
"जो यहाँ आया है, वो अब से कोई नहीं है। ये मिट्टी उसकी माँ है। — रघुवीर"
मेरे हाथ रुक गए।
तीली बुझ गई। अंधेरे में मैंने अपनी साँस सुनी — तेज़, बेकाबू।
"काका," मैंने ऊपर देखते हुए कहा, "ये पटिया पर पापा का नाम है।"
ऊपर से कोई जवाब नहीं आया। बस रस्सी थोड़ी खिंची — मीरा ने खींची थी, जैसे कहे, ज़िंदा है तो जवाब दे।
"मैं ठीक हूँ," मैंने ज़ोर से कहा। "पर यहाँ… यहाँ पापा की लिखाई है।"
फिर कालू काका की आवाज़ आई — बहुत धीमी, जैसे वो खुद से बोल रहे हों।
"तो वो सच था," वो बोले। "मैंने सोचा था कि रघुवीर ने बस मुझे बहलाया था।"
मैंने दूसरी तीली जलाई और मटके का ढक्कन उठाया।
अंदर मिट्टी थी। बस मिट्टी। पर जैसे ही मेरी उँगलियाँ उसमें गड़ीं, मुझे कुछ हुआ — मेरे हाथ की उँगलियाँ अपने आप बंद हो गईं, और मुझे लगा जैसे मेरे शरीर से कुछ खिंच रहा हो। जैसे बुखार में पसीना निकलता है, वैसे ही पूरी रात की थकान, डर, सब मेरे हाथों से मिट्टी में उतर रहा हो।
मैंने आँखें बंद कीं।
और तब मुझे वो दिखा — नहीं, दिखा नहीं, महसूस हुआ। मेरे सामने कोई बैठा था। सफ़ेद धोती, बड़ी मूँछें, और आँखों में वो हँसी जो मैंने कभी किसी में नहीं देखी। वो बोला, "बेटा, ये मिट्टी तुझे ताकत नहीं देगी। ये तेरा थका हुआ शरीर ले लेगी। ताकत तू खुद कमाएगा — पसीने से।"
मैंने आँखें खोलीं। आँखों में पानी था, और नाक में वो मिट्टी की गंध भर गई थी।
"मिल गया?" ऊपर से कालू काका ने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपनी नहीं लगी। "मिल गया।"
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