Spirit of a Fighter – Chapter 224
मीरा ने उसकी तरफ़ ऐसे देखा जैसे वो पागल हो गया हो।
"अगर मैं लौटा," वीर ने धीरे से कहा, "तो सुबह इसी खिड़की पर आऊँगा, और तू इसे छोड़ देगी। और अगर मैं नहीं लौटा—"
"तो?"
"तो इसे पकड़े रहना," वीर ने कहा। "किसी को मत पकड़ने देना। जब कभी तेरी उँगली में खिंचाव महसूस हो, समझ जाना कि मैं आ रहा हूँ।"
मीरा की आँखें भर आईं।
"तू बहुत बड़ा बेवकूफ है," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ में वो डाँट नहीं थी जो पहले थी।
फिर उसने अपनी छोटी उँगली धीरे से बढ़ाई, और उसे वीर की उँगली से लपेट दिया।
दोनों की उँगलियाँ जंगले की छड़ों के बीच फँसी थीं — ठंडी छड़ें, गरम उँगलियाँ, और बीच में मिट्टी की गंध।
"सुन," वीर ने कहा। "भैरव ने मुझसे कहा कि तीन दिन बाद लड़ाई में एक ही आदमी खड़ा होगा। और वो मैं नहीं होऊँगा।"
मीरा ने उसकी उँगली कसकर पकड़ ली।
"तो तू उस एक आदमी को बदल दे," उसने कहा। "जो खड़ा हो, वो तू हो।"
वीर मुस्कुराया — थका हुआ, पर मुस्कुराया।
"तूने माँ जैसी बात कह दी," उसने कहा।
मीरा ने उसका हाथ छोड़ दिया। "जा।" उसने कहा, और अपनी आँखें पोंछीं। "सूरज डूब चुका है।"
वीर ने एक कदम पीछे हटाया।
फिर रुक गया।
"मीरा," उसने कहा। "वो बोतल — उसका पानी मत छूना खुले हाथ से। कपड़े से पकड़ना। और जब भी उसे खोल, मुँह से दूर रखना।"
मीरा ने सिर हिलाया।
"और एक बात," वीर ने कहा। उसकी आवाज़ अचानक धीमी हो गई, जैसे वो कुछ ऐसा कह रहा हो जो वो कहना नहीं चाहता था। "वो जो तूने कहा — कि मैं अपनी माँ को नहीं बचा पाया — वो भैरव ने तुझसे कहा था?"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा। "कैसे जाना?"
"क्योंकि वो हर किसी की सबसे कमज़ोर जगह ढूँढता है," वीर ने कहा। "और वो मेरी जानता है।"
वो पलटा और गली की तरफ़ बढ़ा।
"वीर!"
वो रुका। पलटा।
मीरा खिड़की के जंगले से चिपकी खड़ी थी। पर्दे की आधी रोशनी में उसका चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे कोई पुरानी तस्वीर हो।
"अगर तू नहीं लौटा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में काँपन था, "तो मैं उस बोतल के सारे सबूत पूरे शहर को दिखा दूँगी। हर अखाड़े को, हर पहलवान को, हर अख़बार को। और भैरव को उसी उँगली से — जो अभी तेरी थी — कुएँ में गिरा दूँगी।"
वीर हँसा। पहली बार उस दिन में उसकी हँसी में कुछ गरमी आई।
"तू ऐसा ही करेगी," उसने कहा।
"करूँगी," मीरा ने कहा।
वीर चला गया। गली के मोड़ पर उसने एक बार पलटकर देखा — परदा गिर चुका था, बस एक पतली-सी लकीर खिड़की से आ रही थी।
और वीर ने जेब में हाथ डाला। पापा की लोहे की डिबिया वहीं थी — छोटी, ठंडी, और उसके हाथ में उसके पापा की आख़िरी निशानी।
उसने डिबिया को हाथ में लिया और बिना खोले सीने से लगा लिया।
अखाड़े की तरफ़ जाते हुए उसने देखा कि दूर, कुएँ की तरफ़, एक लालटेन जल रही थी। और लालटेन के साथ एक परछाई खड़ी थी — कुबड़ी, छोटी, और बहुत स्थिर। कालू काका।
वीर ने अपनी चाल तेज़ की।
पर पाँच कदम चला होगा कि उसे पीछे से किसी के आने की आहट सुनाई दी। धीमी, सँभली हुई, पर जल्दी में।
उसने पलटकर देखा।
मीरा दौड़ती हुई आ रही थी — कंधे पर बैग, हाथ में एक छोटी-सी शीशी, बाल हवा में उड़ते हुए। और वो रुकी उसके सामने, हाँफती हुई, और उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो पहली बार उसने अखाड़े में देखी थी।
"मैं तेरे साथ चलूँगी," उसने कहा।
वीर का मुँह खुला रह गया।
"तू—"
"बहस मत कर।" मीरा ने शीशी उसके हाथ में पकड़ा दी। "ये मेरी लैब की खाली शीशी है। उस बोतल का पानी इसमें भर लेंगे। और मैं साथ चलूँगी।"
"मीरा, वहाँ ख़तरा है—"
"मुझे पता है।" उसने उसकी आँखों में देखा। "और मुझे ये भी पता है कि अगर मैं यहाँ रुकी, तो सारी रात सोचती रहूँगी कि तू ज़िंदा है या नहीं। और मैं वो नहीं सह सकती।"
वीर ने उसकी तरफ़ देखा। उसके बाल हवा में उड़ रहे थे, और उसकी साँस अभी भी तेज़ थी, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो हार नहीं मानती।
"तू कभी नहीं मानती," वीर ने कहा।
"नहीं मानती," मीरा ने कहा।
वीर ने एक गहरी साँस ली। फिर उसने अपना सिर हिलाया — ना में नहीं, हाँ में। और वो शीशी अपनी जेब में रखी।
"तो चल," उसने कहा। "पर एक बात पक्की — जब मैं कहूँ रुक, तू रुकेगी। जब मैं कहूँ भाग, तू भागेगी। और जब मैं कहूँ चुप, तू चुप होगी।"
"ठीक है," मीरा ने कहा।
"झूठ मत बोल, तू ये नहीं करेगी।"
"मैं कोशिश करूँगी," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार उस शाम कुछ हल्का-सा आया — जैसे दूर किसी घर में दीया जल गया हो।
दोनों कुएँ की तरफ़ बढ़े। लालटेन की रोशनी पास आने लगी, और साथ में कालू काका की आवाज़ आई — धीमी, बुझी हुई, जैसे वो किसी से बहस कर रहे हों।
"नहीं," काका कह रहे थे। "तू नहीं।"
वीर रुका।
"काका?"
लालटेन की रोशनी में कालू काका खड़े थे — और उनके सामने, कुएँ के ढक्कन के पास, एक और आदमी खड़ा था। दुबला, झुका हुआ, हाथ में एक पुरानी कॉपी।
वीर ने आँखें सिकोड़ीं।
वो हरनाम था।
उसका चेहरा पीला पड़ा था, आँखें धँसी हुई थीं, और उसके होंठ काँप रहे थे। वो ऐसे खड़ा था जैसे बहुत देर से खड़ा हो और अब गिरने वाला हो।
"तू यहाँ क्यों है?" वीर ने पूछा।
हरनाम ने कॉपी उठाई। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"मैंने सुना कि तू आज रात कुएँ खोलने वाला है," उसने कहा। "मैं तुझे रोकने नहीं आया।"
वो रुका। उसकी आँखों में पानी था।
"मैं तुझे कुछ देने आया हूँ," उसने कहा। "वो चीज़ जो भैरव ने मुझसे छीन ली थी, और जो अब सिर्फ़ मेरे पास है।"
उसने कॉपी खोली, और उसमें से एक पुराना, मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला।
"ये मेरे बेटे की लिखाई है," उसने धीरे से कहा। "जो उसने भैरव के कमरे में नौकरी करते हुए चुपके से लिखा था। ये वो चीज़ है जो भैरव को सबसे ज़्यादा डराती है।"
वीर ने काग़ज़ लिया। उस पर काँपती लिखाई में कुछ लिखा था, और नीचे एक तारीख़ थी — बीस साल पुरानी।
और जैसे ही वीर ने उस काग़ज़ को पलटा, उसकी नाक में एक गंध आई — ताज़ी स्याही की गंध।
उसने सिर उठाया।
हरनाम के पीछे, अंधेरे में, कुछ हिला।
और वीर की साँस रुक गई।
॥
मैं पलटा।
अंधेरे में जो हिला था, वो धीरे से बाहर आया — लालटेन की पीली रोशनी में उसका चेहरा आधा दिखा, आधा छिपा। छोटी मूँछें, मोटा शरीर, अखाड़े की वर्दी। लुट्टन।
उसके हाथ में कुछ नहीं था। बस वो खड़ा था, और उसकी आँखें हरनाम की कॉपी पर टिकी थीं।
"तू यहाँ क्या कर रहा है?" मैंने पूछा।
लुट्टन ने हाथ ऊपर उठाए — जैसे कोई कहे, मैं लड़ने नहीं आया। पर उसका हाथ काँप रहा था।
"मैं तेरे पीछे आया था," उसने कहा। "जब से तूने मेरे सामने वो बात कही — कि मेरी साँस में ज़हर है — तब से मैं सो नहीं पाया।"
हरनाम ने काग़ज़ मेरी तरफ़ खिसका दिया, जैसे उससे छूना भी गुनाह हो।
"इसकी बात सुन," कालू काका ने धीरे से कहा। "ये भी उसी जाल में फँसा है।"
लुट्टन ने अपनी जेब से एक चिट्ठी निकाली — सिली हुई, मुड़ी हुई, ऊपर भैरव की मुहर।
"आज शाम मुझे ये दी," उसने कहा। "कहा — कल सुबह मुकाबले से पहले, वीर की माँ को ये पहुँचा दे। कह देना ये उसकी नई दवा है।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"और तू लेकर आया था?" मैंने पूछा, आवाज़ अपनी ही नहीं लग रही थी।
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